Wednesday, April 9, 2014

मेघवंश

भूमिका 

नि:संदेह 'आर्योंका एक घुमन्तु कबीला थावह पशुपालन के लिए नए चरागाहों की खोज में घूमता रहता थाइसी सिलसिले में उन्हें भारत के सिंधुघाटी क्षेत्र की विकसित सभ्यता का पता चलासिंधु घाटी सभ्यता कृषि भूमि सम्पदा से भरपूर थीयहाँ पर राजऋषि मेघऋषि की एक कृषि प्रधान अत्यन्त विकसित सभ्यता थी.

सम्पूर्ण सप्तसिन्धु प्रदेश राजऋषि ‘वृत्र’ के अधिकार में थाजिस प्रकार महादेव को आर्य लोग पार्वती के रिश्ते से पहले महासुर (महा+असुरकहते थेउसी प्रकार ये ‘वृत्र’ को भी ‘वृत्रासुर’ नाम से पुकारते थेमहाभारत के आदि पर्व में भीष्म ने ‘वृत्र’ को अनेक गुणोंकीर्तिशौर्यधार्मिकता और ज्ञान-विज्ञान का स्वामी माना है.

इन्द्र ने जैसे ही छलकपट से रात्रि के अंधकार में मेघऋषि वृत्रासुर के महल में घुसकर उसकी हत्या की (ऋग्वेद् के अनुसारतो इन्द्र चारों ओर से पापों में घिर गयामेघऋषि की हत्या करने के कारण इन्द्र को पाँच पाप लगे थेजिनमें एक ‘ब्रह्म-हत्या’ का भी थामेघऋषि को उसकी विद्वत्ता और महान धार्मिकता के कारण ब्राह्मण कहा गया है और आर्यों ने उसकी हत्या को ‘ब्रह्म-हत्या’ के समान माना हैसम्भवतइसी कारण लोग वृत्र को ‘ब्राह्मण’ या ‘ब्रह्मा’ का पुत्र समझते हैंवह महा धर्मपरायण व्यक्तित्व का स्वामी थाब्रह्मपुराण तो इस बात को स्पष्ट करता है कि वृत्रासुर यानि राजऋषि महामेघ वृत्र ही सिन्धु घाटी की विस्मयकारी सभ्यता का जनक था और वह अनार्य (भारत के मूलनिवासीशासकों में सर्वाधिक बलवान धार्मिक राजा थायही वृत्र ‘मेघऋषि’ नाम से हमारे द्वारा जाना जाता है.

ऋग्वेद (शलोक 4-19-8, 2-11-15 और 2-20-7) के अनुसार सात नदियों (सुरसतीसतलुजव्यासरावीचिनाबजेहलम और सिन्धद्वारा सिंचित प्रदेश राजऋषि वृत्र (जिसे आर्य लोग अहिवृत्र या वृत्रासुर कहते थेके अधीन थाउसे (ऋग्वेद् 2-12-3 मेंअहि अथवा ‘नाग’ कुल का संस्थापक भी कहा गया हैविभिन्न इतिहासकारों द्वारा भी शोधों के आधार पर यह सिद्ध किया जा चुका है कि सम्पूर्ण भारत पर नागवंशियों का शासन था

नाग (असुरमूलतशिव उपासक बताए गए हैंलाल प्रद्युम्न सिंह ने ‘नागवंश का इतिहास’ में बताया है कि नागवंशियों को उनकी उत्तम योग्यताओंगुणवत्ताव्यवहार व कार्यशैली के कारण देवों का दर्जा दिया गया हैवे वास्तुकला आदि में निपुण थेनागवंशियों का सम्पूर्ण भारत पर राज्य थासिन्धु सभ्यता में मिली मोहरों पर पशु व सांप के चिह्न पाए गए हैंनागवंश के लिए सर्प की पूजा का प्रचलन थाये प्रागैतिहासिक समय में सम्पूर्ण भारत के शासक थेवंशावली बढ़ने से उनके अलग-अलग स्थानीय वंश हुए तथा बाद में अधिकतर ने वैष्णव धर्म अपना लिया एवं शिव को भी वैष्णव धर्म का देवता मान लिया गयाऋग्वेद् का यह कहना, ‘मेघों में प्रथम मेघ वृत्रमेघ थे,’ सिद्ध करता है कि ‘मेघवाल’ या ‘ऋषिपुत्र’ होने से ‘ऋषिया’ (रिखियाया ‘ऋषि’ (रिषीया ‘मेघवंशी’ कहते आए हैंजो एक दूसरे के पर्यायवाची शब्द हैंअलग-अलग जातियाँ नहीं हैं.

पुराणों के अनुसार ब्रह्मा को आदिपुरुष व सृष्टि का रचयिता माना गया हैब्रह्मा का पुत्र मरीची था और मरीची का पुत्र कश्यप थादक्ष के अदिती तथा दिती दो जुड़वा पुत्रियाँ हुईंइनकी एक अन्य बहन थी –सतिसति की शादी शिव से हुई तथा दिती व अदिती की शादी कश्यप से हुईअदिती से पैदा हुई सतानें अदैत्य-सुर (Aryans) कहलाईं तथा दिती की संतानें दैत्य-असुर (Dasyu/ Anaryanas) कहलाईंकश्यप की अन्य पत्नी कंद्रु से नाग तथा दानु से दानव पैदा हुएइस प्रकार सुर-असुरदानवनाग सभी कश्यप की संतानें थींलेकिन उनके धार्मिक मत भिन्न-भिन्न थेअदैत्य (सुरविष्णु को अवतार मानते थे और कर्मकाण्ड में विश्वास रखते थेजबिक दैत्य (असुरविष्णु को अवतार नहीं मानकर आडंबरों का मज़ाक उड़ाते थे और समानता में विश्वास करते थे.

अनेक विद्वान सुर तथा असुर को एक ही पिता की संतान होने की बात स्वीकार नहीं करतेप्रह्लाद का पिता असुर (अनार्यवंश का राजा हिरण्यकश्यप सुरों (आर्योंका सैद्धान्तिक विरोधी थाउसके छोटे भाई हिरणाक्ष के जनता में बढ़ते प्रताप से कुपित होकर विष्णु ने वराह का अवतार बनकर हिरणाक्ष को माराइस बात से हिरण्यकश्यप विष्णु से नाराज़ थाउसे विष्णु ने नरसिंह अवतार बनकर माराहिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद ने वैष्णव विचारधारा को अपनायाउसका पुत्र वीरोचन थावीरोचन का पुत्र राजा महाबली दैत्य (असुर-अनार्यवंशावली का शासक थाउसका असली नाम इन्द्रसेन थाकेरल राज्य में ट्रिक्करा –(Trikkara) उसकी राजधानी थीउसने अपने राज्य को जनपदों में बांटकर उनका प्रशासन राजकुमारों (गवर्नरोंको दे रखा थाउसका पुत्र बाणासुर असम क्षेत्र का गर्वनर थाराजा महाबली बड़ा धार्मिक राजा थाउसके राज्य में कोई भी ऊँच-नीच नहीं थावह सभी का सम्मान करता थाअपने दादा प्रह्लाद की भांति वह भी विष्णु का भक्त थालेकिन उसे अपने पूर्वजों के साथ आर्यों द्वारा किए गए कपट का ज्ञान थाउसने आर्यों की राजधानी अमरावती पर आक्रमण कर दिया तथा अपने पराक्रम से सम्पूर्ण सिन्धु क्षेत्र पर अधिकार करके सौ अश्वमेघ यज्ञ किए (सौ लड़ाइयाँ जीतीं). आर्यों ने हार कर उसकी शरण लीउसने दयाभाव से आर्यों को शरण दे दीशरण लेने के बावजूद उसके दैत्य (असुरहोने के कारण आर्य (सुरउससे मन ही मन घृणा करते थेविष्णु ने एक ‘वामन’ नामक ब्राह्मण के रूप में उनको वचनबद्ध कर बिना किसी रक्त क्रान्ति के उसका सम्पूर्ण राज्य दान में ले लियाअपने पिता के साथ हुए धोखे से व्यथित होकर बाणासुर ने आर्यों से लड़ाई करने की ठानी लेकिन शिव ने उसका वध कर दियाउसी मेघवंशीय असुर महाराजा महाबली के कुल के इन मेघवालों को ‘बलाई’ भी कहा जाता हैबलाई लोग ‘अला बला जाएबलि का राज आए’ कहकर अपने सम्मान व सत्ता की वापसी की कामना करते हैं.

विजेता लोग प्रायअपने विरोधियों के साहित्य को जलाकर या डुबोकर एवं शिलालेखों को तोड़-फोड़ कर नष्ट कर दिया करते थे और यह भी प्रयास करते थे कि सत्ता में हारे हुए लोग पुनसिर उठाने की हिम्मत न करें. ‘मेघवंश’ के इतिहास को भी इसी प्रकार नष्ट कर दिया गयाइतिहास चेतनाइतिहासकारों की प्रतिबद्धता एवं पुरातात्विक सामग्री के पूर्ण विश्लेषण के अभाव में आधुनिक राजवंश भारतीय इतिहास में उचित स्थान नहीं पा सके.

श्री नवल वियोगी की पुस्तक ‘सिन्धु घाटी के सृजनकर्ता-शूद्र और वणिक’ में जिस सिन्धु घाटी क्षेत्र का वर्णन हैउसमें समूचा पश्चिमोत्तर अविभाजित भारतजिसमें सम्पूर्ण पाकिस्तानपंजाबहरियाणाहिमाचल प्रदेशराजस्थानगुजरात और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का भू-भाग आता हैयही क्षेत्र मेघऋषि का क्षेत्र थाक्योंकि इसी क्षेत्र में मेघमेघवालमेघवंशी इत्यादि पर्यायवाची नाम से जानी जानेवाली ‘मेघऋषि’ की जातियों का बाहुल्य रहा है.

असुर शब्द ‘इशु’ (असुसे बना हैजिसका अर्थ है ‘ईश्वर’ऋग्वेद में असुर इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है. ‘असुप्राणो विद्यते यस्मिन् स असुर:’ अर्थात् जिसमें प्राणबल अथवा सामर्थ्य होवह असुर है. ‘असुर’ सुर का विलोम शब्द हैजिसका अर्थ हुआ, ‘सुर-विरोधी’कुछ विद्वानों के अनुसार ‘दानव’ का अर्थ ‘दानी’ और ‘दमनशील,’ ‘राक्षस’ का अर्थ ‘रक्षक’ और ‘पालक,’ ‘निशाचर’ का अर्थ ‘रात का पहरेदार,’ ‘रात में चोर-लुटेरों से समाज की रक्षा करने वाला’ तथा ‘असुर’ का अर्थ ‘अमछयी’ या ‘मदिरा न पीने’ वाला होता हैदेव-असुर संघर्ष (देवासुर संग्राम अर्थात् आर्यों और मूलनिवासियों का प्रथम युद्धके बाद देवों ने असुर का अर्थ बदल दियाभागवत पुराण में अनार्यों को यज्ञों में विध्न डालने वाला बताया गया है अर्थात् जो यज्ञों में विश्वास नहीं करते थेउन्हें असुर कहा जाने लगावैदिक काल (1500-500 .पूमें असुरों को कर्म विरोधीदेवों के प्रति उदासीनअद्भुत आदेशों के पालने वाले (अन्यव्रतके रूप में कहा गया हैइस देश के मूलनिवासी धर्मात्मा और सत्यनिष्ठ राजाओं को आर्यों ने अपनी पुस्तकों में असुरदैत्यदानव व राक्षस आदि नामों से उल्लेख करके उन्हें अविचारीअनाचारीअधार्मिक और अत्याचारी सिद्ध करके उनके प्रति जनता में घृणा उत्पन्न की और अपने आर्य राजाओं की प्रंशसा कर उन्हें अवतार ही नहीं बल्कि परमेश्वर से भी अधिक महापुरुष सिद्ध करके जनता में उनकी भक्ति व भजन करने के लिए वेदों का प्रचार किया.

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
700 से 300 .पूतक उत्तरी भारत छोटे-छोटे 16 महाजनपदों में बँट गया थाइनमें कुछ जनपदों में अनार्य (असुरराजाओं का शासन थाये 16 महाजनपद थेकम्बोज (Kamboja), गांधार (Gandhar), कुरु (Kuru), पांचाल ( Panchal), कौशल (Koshala), सूरसेन (Sursena), मत्स्य (Matsya), वत्स (Vatsa) या वंश (Vansa), चेदी (Chedi) या चेती (Cheti), अवन्ती (Avanti), माला (Mala), काशी (Kashi), वज्जी (Vajji) या वृजि (Vriji), मगध (Magadha), अंग (Anga), अशाका (Assaka). मगध महाजनपद इनमें सबसे शक्तिशाली थाइन महाजनपदों में से वत्सचेदीमत्स्य इत्यादि महाजनपदों में अनार्य (असुरराजाओं का राज्य थाइसी प्रयास में असुर राजाओं ने चेदी महाजनपद बनाया तथा बुंदेलखंड को राजधानी बनाया.

प्रसिद्ध इतिहासकार के.पीजायसवाल ने मेघवंश राजाओं को चेदीवंश का माना हैभारत अंधकार युगीन इतिहास (सन् 150 से 350 तकमें वे लिखते हैं, ‘ये लोग मेघ कहलाते थेये लोग उड़ीसा तथा कलिंग के उन्हीं चेदियों के वंशज थेजो खारवेल के वंशधर थे और अपने साम्राज्य काल में ‘महामेघ’ कहलाते थे.

भारत के पूर्व में जैन धर्म फैलाने का श्रेय खारवेल को जाता हैमहाभारत के सभा पर्व (xiv 13) में महामेघवाहन व चेदीवंश का जिक्र हैकलिंग के मेघवंशीय राजा श्रुतायु ने महाभारत युद्ध में कौरवों का साथ दिया था.

चूंकि कलिंग राजा जैन धर्म के अनुयायी थेउनका वैष्णव धर्म से विरोध निश्चित थाअतवैष्णव धर्म का पालन करने वाले अशोक ने उस पर आक्रमण कियाआक्रमण का दूसरा कारण थाकलिंग राज्य का समुद्र तट के किनारे होने के कारण समुद्री मार्ग पर कब्जाकलिंग के महामेघवंश के राजा खारवेल का मौर्य शासक अशोक से युद्ध हुआ जो ‘कलिंग युद्ध’ के नाम से जाना जाता हैकलिंग युद्ध में एक लाख से अधिक लोग मारे जाने व उससे भी अधिक घायल हो जाने से व्यथित होने के कारण अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया और अहिंसा पर जोर देकर बौद्ध धर्म को अन्य देशों तक फैलाया.

आर्यों का भारत में आगमन लगभग 1500 .पूहुआवे मध्य एशिया से आए थेआर्यों ने भारत के शान्ति-प्रेमीमूलनिवासीसिंधु सभ्यता के शासकों को हराकर उनके द्वारा बसाए नगरों एवं किलों को ध्वस्त करके उन्हें बेघर कर दियाआर्य घुमन्तु जीवन छोड़कर वहाँ पर स्थिर हो गएबसने के बाद आर्यों के सामने मुख्य रूप से यह समस्या आई कि वे अन्य घुमन्तु कबीलों से अपनी रक्षा कैसे करेंउन बिखरे हुए परास्त लोगों के सामने सुरक्षा और शरणस्थल की समस्या थीइन समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए दोनों ने आपस में समझौता कियाजिसके अनुसार इन बिखरे हुए परास्त लोगों ने एक जगह स्थिर रूप से बसे हुए कबीलों अथवा जातियों की सुरक्षा व चाकरी करना स्वीकार कर लियाइसलिए निर्णय लिया गया कि वे लोग गाँव के बाहर गाँव की सीमा पर रहें ताकि वे आक्रमणकारियों का मुकाबला कर सकें.

उसके बाद उनके लिए शिक्षा के द्वार ही बन्द नहीं किएबल्कि उनकी आध्यात्मिकसांस्कृतिकआर्थिक और सामाजिक उन्नति को अवरुद्ध करइन्हें पराधीनता की जंजीरों में जकड़ दिया गयाउनका सारा साहित्य और इतिहास नष्ट कर दिया गयाआर्यों ने मूलनिवासियों के गौरवपूर्ण इतिहास को बदलकर अपने अनुकूल बनाकरअपने मतलब की बातें थोंप दीं

जो बौद्ध सम्पन्न थेवे देश छोड़कर भाग गए और उन्होंने विदेशों में बौद्ध धर्म फैलायाजो बौद्ध गरीब थे और अपनी विपन्नता के कारण भाग नहीं सकेउन्होंने हिन्दू धर्म स्वीकार कर लियाजो जीत गया वह शासक बन गया और जो हार गया वह बना उसका सेवकबाहुबलियों ने संगठन के बल पर कमजोर पर शासन किया है.

इस प्रकार भारत की कई प्राचीन वीर और जुझारू राजवंशीय जातियों का इतिहास लोप हो गयाकइयों को कमीणकारू जातियों में परिणत कर दिया गया और कइयों की ऐसी हालत बना दी गई जिससे उनका अस्तित्व ही समाप्त प्रायहो गयायदि दुनिया की प्रत्येक जाति यह कहे कि उनके पूर्वज भी कभी शासक थे तो इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता

आर्यों ने उन मूलनिवासियों को विभिन्न धर्मोंकर्मकाण्डों और आस्थाओं में फंसाकर उनके स्वाभिमान और स्वावलम्बी स्वरूप को छिन्न-भिन्न कर दियाअनुलोमप्रतिलोम और वर्णसंकर जातियों के सिलसिले में मूलनिवासियों (वंचितों/दलितोंकी एकता समाप्त हो गई और वे अनेक बन्धनों में पड़ गएइसी विभाजन की रस्साकशी में ‘मेघवंश’ भी अनेक टुकड़ों में बँट गया और इसके अनेक विभिन्न स्थानीय नाम हो गएएक ही जाति एवं वंश के लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर चले जाने के कारण स्थानीय वातावरण व रीति रिवाजों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके तथा भिन्न-भिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न नामों से पहचाने जाने लगेउनके साथ अनेक सामाजिक अन्याय होने लगे और उनकी स्थिति सबसे अधिक त्रासदीदायक और शोचनीय हो गई.



2. मध्यकालीन भक्ति आंदोलन और वंचित जातियाँ

मध्ययुग का भक्ति आन्दोलन एक धार्मिक एवं सामाजिक क्रांति कहा जाता हैभक्ति अति है और कट्टरता पैदा करती हैकट्टरताशांति और सहिष्णुता की शत्रु हैइसका प्रभाव आज भी चर्मोत्कर्ष पर हैभक्ति आन्दोलन ने देश में मूर्ति-पूजा को बढ़ा दियादेवी-देवताओं की संख्या में बढ़ोत्तरी की एवं जगह-जगह महात्मागुरुआध्यात्मिक पंथ आदि पैदा कर दिए.

महाराष्ट्र में नामदेव ने भक्ति मार्ग को बहुत लोकप्रिय बनायामहाराष्ट्र में ही एकनाथतुकारामचोखामेला और सोहयाबाई भी उसी कड़ी में जुडेंभक्ति आन्दोलन के संतों में उत्तर प्रदेश के कबीर तथा रविदास (.1398-1540) प्रमुख हैंउस समय तक छुआछूत तथा जातिवादी भावना का जोर थाउन्होंने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सद्भावना का प्रचार किया तथा जाति-पांतिछुआछूत और ऊँच-नीच के भेद का विरोध किया व धर्म के बाह्य आडम्बरों की खिलाफत कीसत्गुरु रविदास ऐसे प्रथम व्यक्ति थेजिन्होंने भारत में समाजवाद का नारा बुलन्द कियाआज भी यह समझने की ज़रूरत है कि ईसामोहम्मद आदि पैगम्बर जो विशाल धर्मों के प्रवर्तक हैंसभी ने एक निराकार प्रभु की बात की हैजो वर्ण-भेदजाति-भेद तथा देश-भेद से परे हैहमारे महापुरुषों ने भी निराकार प्रभु की बात की है.

पंजाब के गुरु नानकदेव निर्गुण विचारधारा के प्रमुख सन्त थेउनका जन्म 1469 में ननकाना (पाकिस्तानमें हुआ थाकबीर की भांति उनका मुख्य उद्देश्य हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करना थागुरु नानकदेव एक समाज सुधारक थेवे वेदों और पुराणों को नहीं मानते थे

भक्तिकाल में रूढ़िवादिता पर चोट के कारण एक ओर दलितों में अधिकार चेतना जागृत हुई तो दूसरी ओर उनके व रूढ़िवादियों के बीच जातीय कटुता को बढ़ावा मिलाहिन्दू आडम्बरों की पोल खोलने वाले संतोंसाधों तथा नाथों की सच्ची व कटु आलोचना से कुढ़कर रूढ़िवादियों ने ‘चमार’ शब्द को विभिन्न शब्द-कोषों में घृणित जाति के रूप में पेश किया.


3. चमार शब्द और घृणा का भाव

कुछ लोग समझते हैं कि ‘चमार’ शब्द चमड़े का काम करने वाली जातियों से जुड़ा है और चमड़े का काम करने के कारण ही इस नाम से इतनी घृणा पैदा हुई हैयह तर्क सही प्रतीत नहीं होताक्योंकि पेशे को घृणित नहीं कहा जा सकताआज बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों में यह कार्य हो रहा है और सवर्ण लोग भी कर रहे हैंइस तरह चमार जाति अपनी पृथक् पंचायत प्रणाली से बँधी थी और अपने प्रत्येक झगड़े-टंटे या किसी अन्य समस्या का फैसला अपने स्तर पर ही कर लेते थे.

कुछ विद्वानों का मत है कि ‘चंवर’ से ‘चमार’ शब्द की उत्पत्ति हुई हैसंभवत: ‘चंवर’ शब्द का विकास ‘चार्वाक’ से हुआ हैइसका तात्पर्य कि जो ‘चार्वाक धर्म’ को मानते हैंवे ‘चंवर’ हैं. ‘चार्वाक धर्म’ नास्तिक धर्म हैयह वैष्णव धर्म में विश्वास नहीं करतायह समानता का पाठ पढ़ाता है तथा झूठे आडम्बरों की पोल खोलता हैचंवरचामुण्डरायहिरण्यकश्यपमहाबलिकपिलासुरजालंधरविषुविदुवर्तन आदि भी ‘चार्वाक धर्म’ को मानने वाले शासक हुए हैंचार्वाक शब्द ‘चारू (मीठा)’ एंव ‘वाक्’ (बोलने वाला)’ की संधि से बना हैजिसका अर्थ है –‘मीठा बोलने वाला’लेकिन वैष्णव मतावलंबियों ने इस धर्म के अनुयायियों को ‘हमेशा चरने वाले’ अर्थात् ‘अधिक खाने वाले’ तथा ‘चबर-चबर’ करने वाले अर्थात् ‘अधिक बोलने वाले’ घोषित कर दियायह भी प्रचार किया गया है कि ‘चार्वाक धर्म’ का ध्येय केवल खाना-पीना और मौज उड़ाना हैकर्ज लेकर घी पीना हैअतइसी धार्मिक विरोध के कारण ही ये घृणा उपजी थी और इस घृणा का आधार ‘चार्वाक धर्म’ के प्रति घृणा ही थीवैष्णव मतावलंबियों ने ‘चार्वाक धर्म’ का साहित्य जला डालाजहाँ भी ‘चार्वाक धर्म’ का व्यक्ति दिखाई देउसे मारने तक के आदेश दिए गए थे.

प्रतिबन्धों के बावजूद ‘चंवर’ अर्थात् ‘चमार समाज’ ने अपनी योग्यता के बल पर वैष्णव मतावलंबियों को परेशान कर रखा थाउनके ऐशो-आराम में बाधा पड़ रही थीउनके द्वारा रचे जा रही ढपोरशंखी धार्मिक मान्यताओं को चलाने में परेशानी हो रही थीसमाज को बेवफूक बनाकर उल्लू सीधा करने वाले आडंबरों के विरुद्ध ‘चमार समाज’ की ज्ञान व तर्क करने की महान क्षमताश्रम के बल पर सदैव विश्वास करके जीवन जीने की महान कलापरहित में जीवन होम कर देने की सद्-इच्छा वैष्णव मतावलंबियों के आड़े आती रहीइसलिए उन्होंने अपना उल्लू सीधा करने के लिए ‘चंवरों’ पर अनेक प्रतिबंध थोंप दिए.

प्रतिबंधों के कारण चाहे ‘चमार-समाज’ अकेला पड़ गयाफिर भी वह अपनी शासन व्यवस्था के लिए किसी का मोहताज नहीं रहा और न ही किसी को अपने ऊपर हावी होने दियाइस समाज का अध्ययन एवं सर्वे करने से पता चलता है कि इसने ब्राह्मणों की मनुस्मृति के कानून-विधान की परवाह नहीं कीवह इन अमानवीय विधानों की धज्जियाँ उड़ाता रहाचाहे उसे कितनी ही मुसीबतों का सामना क्यों न करना पड़ा होब्राह्मण वर्ग ने जैसे ‘सवर्ण समाज’ की रचना कीवैसे ही चमार वर्ग ने भी ‘चमार आत्मनिर्भर समाज’ गठित किया.

चूँकि चमार जाति अपनी पृथक पंचायत प्रणाली से बंधी थी और अपने प्रत्येक झगड़े-टंटे या किसी अन्य समस्या का फैसला अपने स्तर पर ही कर लेती थी अतः इस समाज की न्याय प्रणाली एवं इसकी आजीविका को पसंद करके कई अन्य जातियाँ इसमें सम्मिलित हो गईं थीं.

चमार’ जाति को अत्यंत अस्पृश्य व नीच बनाने का श्रेय शब्द-कोषकारों को भी जाता हैजातिवाचक शब्दों पर ‘हंस’ अगस्त 1998, पूर्णांक 144, वर्ष 13 अंक 1, में श्री भवदेय पाण्डेय का लेख ‘सवर्ण मानसिकता और पुरुषवादी कुण्ठा’ लेख छपा थाइस आलेख में कहा गया है,- ‘इतिहास  साक्षी है कि संस्कृत और हिन्दी के ब्राह्मणवादी पोंगापंथियों की तरह हिन्दी शब्द-कोषकारों ने भी ‘चमार’ वाचक शब्दों के साथ भारी छल किया हैसंस्कृत के शब्द-कोष ग्रथों में ‘चमार’ को नीच जाति नहीं कहा गया थाजातीय कुण्ठा की चरम अभिव्यक्ति हिन्दी शब्द-कोष ग्रंथों में हुई है.

इस देश में झगड़ा केवल आर्य और अनार्य का हैरूढ़िवादी कहते हैं कि मनुष्य जन्म से छोटा-बड़ा होता हैये यहाँ के मूलनिवासियों को अपने से छोटा समझते हैंजबकि हमारे महापुरुषों ने समय-समय पर इस गलत फहमी को दूर किया है और माना है कि सब मानव बराबर हैंकोई छोटा या बड़ा नहीं हैइस बात को संसार के सभी महापुरुष मान चुके हैं कि आदमी जन्म से नहींअपने कर्म से छोटा या बड़ा बनता हैसिंधु निवासी आडंबरों व अंधविश्वासों में भरोसा नहीं करते थेउन्हें आर्यों ने माराबौद्ध धर्म ने जाति-प्रथा को तोड़कर समानता सिखाई तो बौद्धों को मारा गयाबौद्ध धर्म के पतन के बाद हिन्दू धर्म में सवर्णों व शूद्रों में असमानता का व्यवहार इतना गहरा हो गया कि शूद्रों द्वारा अपने अधिकारों की माँग किए जाने पर उनको इतना प्रताड़ित किया जाने लगा कि पुनवे अपना सिर नहीं उठा सकें तथा उनकी हालत देखकर दूसरे शूद्र लोग भी भय के कारण अपना मुँह नहीं खोल सकेंभारत में बाहर से आए विदेशी आक्रमणकारियों की जीत के बाद उन्हें सवर्णों द्वारा स्वीकार कर लिया जाता रहा है तथा उनसे छुआछूत की भावना भी नहीं रखी जाती रही हैलेकिन बड़े आश्चर्य की बात है कि रूढ़िवादी सवर्ण लोगों द्वारा हिन्दू धर्म में होते हुए भी यहाँ के मूलनिवासियों (शूद्र-दलितोंको अभी तक शूद्रअछूतअग्राह्य व अनावश्यक समझा जाता हैपरंतु वे इन्हें छोड़ना भी नहीं चाहतेक्योंकि ये उनकी आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन के मूल स्तम्भ हैं.

अंग्रेज़ों के आगमन के बाद

भारत में इस्लाम शासन ने जनता का आर्थिक शोषण तो किया हीउसे पिछड़ेपन की ओर भी धकेल दियाअंग्रेजों ने यहाँ फैले अंधविश्वासों और कुप्रथाओं का अंत करना शुरू कियाउन्होंने अरबी व फारसी और अंग्रेजी व एंग्लोवर्नेकुलर (उर्दू-हिन्दीके स्कूल खोलेशहरों में बड़े-बड़े कारखाने खोले गएइससे दलितों को पढ़ने व रोजगार का अवसर मिलाजिससे उनकी सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ.

1920 में एम.जीडब्ल्यू ब्रिंग्स द्वारा लिखित ‘दि चमार्स’ नामक पुस्तक में मेघवंशीय 1156 जातियों के ‘चमार’ होने का उल्लेख किया थालेकिन शीघ्र ही इस नाम से घोर नफ़रत की जाने लगी थीसुधारवादी आन्दोलनों में यह निर्णय लिया गया कि ‘चमार’ शब्द से समाज को पग-पग पर अपमान झेलना पड़ता हैइसलिए ‘चमार’ जैसे अपमानजनक जाति सूचक शब्द से छुटकारा दिलाया जाए तथा उन लोगों से भी यह काम छुड़वाया जावे जो दलितों की आबादी के पाँच प्रतिशत से भी कम हैंइसलिए अस्मिता जागरण काल में चमार नाम के पुछल्ले से पीछा छुड़ाने के लिए विभिन्न क्षेत्रीय आन्दोलनों में एक ही जाति अनेक नामों में परिवर्तित हो गईये अनेक टुकड़े अपने को एक दूसरे से अलग समझने लगे तथा एक दूसरे से ऊँचा बनने की होड़ में अपनी संगठन शक्ति खो बैठेयदि ये सब उपजातियाँ ‘केवल एक’ जाति के रूप में संगठित हो जाएँ तो वे अपने जीवन में एक बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकती हैंसफलता की सबसे पहली शर्त स्वाभिमान तथा आत्मविश्वास ही होती है.
 
महर्षि दयानन्द ने आर्य समाज की स्थापना कीआर्य समाज का जब खूब प्रचार-प्रसार हुआ तो बहुत से लोगों ने ‘आर्य’ लगाकर जाति नाम बदलाआजकल लोगों द्वारा अपने नाम के पीछे ‘भारती’ लगाने का रिवाज-सा चल पड़ा है.

पंजाब में बाबू मंगूराम मुगोवालिया ने ‘आदिधर्म’ आन्दोलन शुरू कियाउन्होंने सन् 1925 में ‘आदिधर्म मण्डल’ की स्थापना कीपंजाब में आज मूल आदिधर्म जाति में चमारजटियाचामड़चामड़ियारैहगररायगररामदासीरविदासीजुलाहाकबीरपंथीमेघभगतकोली,कोरीपासीमेघवाल आदि चंवर जाति की ही उपजातियाँ हैंसन् 1928 में जब साईमन कमीशन भारत आया तो लाहौर में साईमन कमीशन के सामने मंगूराम मुगोवालिया ने लाखों आदिधर्मियों का नेतृत्व करके जबरदस्त प्रदर्शन कियासर ज्योकरे जब 12 अक्टूबर, 1929 को जालन्धर (पंजाबमें आए तो आदिधर्म मण्डल के प्रतिनिधि उसे मिले और अपने अलग धर्म के विषय में बातचीत कीपंजाब तथा भारत सरकार ने तत्काल ‘आदिधर्म’ को मान्यता प्रदान कर दी जिसके परिणामस्वरूप 1931 में सभी आदिधर्मियों ने अपना धर्म ‘आदिधर्म’ लिखाकर अपने संगठन का परिचय दिया.

आन्ध्र में ‘आदिआन्ध्रा,’ कर्नाटक में ‘आदिकर्नाटका,’ तथा तमिलनाडु’ में ‘आदिद्रविड़’ आन्दोलन शुरू हुआआदिधर्म द्वारा यह प्रचार किया गया कि हम इस देश के आदिनिवासी (मूलनिवासीहैं.

राजस्थान और गुजरात में स्वामी गोकुलदास जी ‘मेघवंश’ नाम से समाज को एक सूत्र में संगठित कर रहे थेवे डूमाड़ा (अजमेरके रहने वाले थेइन्होंने 1935 में दौराई ग्राम में 290 गाँवों की आम सभा बुलाई तथा ‘राजस्थान मेघवंश महासभा’ का गठन कियामहासभा का एक अधिवेशन 1935 में अहमदाबाद में हुआइन्होंने समाज को एक नाम देने के लिए सन् 1935 में ‘मेघवंश इतिहास’ नामक पुस्तक लिखीजिसका संशोधित संस्करण 1960 में प्रकाशित हुआ.

राजस्थान और दिल्ली में आचार्य स्वामी गरीबदास जीजो भोजपुरा (जयपुरके बलाई थेने मेघवालबलाईभांबी आदि मूलतकपड़े बनाने का कार्य करने वाली जाति को ‘सूत्रकार’ नाम से संगठित कियाउन्होंने ‘अखिल भारतीय सूत्रकार महासभा’ का गठन कर समाज को बेगार मुक्त करने का एक पुरजोर आन्दोलन छेड़ दियापहले सूत्रकार आन्दोलन से मेघवाल समाज का सामाजिक स्तर बढ़ा.

दलितों के गौरवमयी अतीत को लौटाने के लिए भारत रत्न बाबा साहब डाभीमराव अम्बेडर ने प्रकाश स्तम्भ का कार्य कियाउन्होंने सभी दलित जातियों को एक झण्डे के नीचे इकट्ठा होने का आह्वान कियाइसलिए उन्होंने प्राचीन धर्म ‘बौद्ध धर्म’ को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया और भारत में उसे नया जीवननई शक्ति और नई दिशा दीउन्होंने भारत की हजारों अस्पृश्य जातियों में बंटे दलितों को मात्र एक ‘अनुसूचित जाति’ मेंसैकड़ों जनजातियों को एक ‘अनुसूचित जनजाति’ में तथा अनेक पिछड़ी जातियों को एक ओ.बी.सी. (अन्य पिछड़ी जातिमें संगठित कर दिया.

हम एक होते हुए भी जाति उपजाति के मानसिक बंधनों में बंधे हुए हैंलेकिन जब अच्छा रिश्ता मिलता है तो हम अपने बच्चों की शादी समाज की इन्हीं फांकों (खापोंमें अपनी सुविधानुसार कहीं भी कर लेते हैंफिर भी अपनी ही उपजाति के नाम का राग अलापते रहते हैंअब समय आ गया कि समाज की इन सन्तरे की सी फांकों (खापोंको जोड़ा जाए ताकि एक सार्थक परिणाम सामने आए.

समाज के भिन्न-भिन्न नामों की जगह एक सम्मानजनक नाम देकर समाज को सुदृढ़ बनाने तथा इन मानसिक दायरों को तोड़ने की एक सोच उभरी तो इसके क्रियान्वयन के लिए अनेक शुभचिंतकों व गुरुओं ने समाज को केवल एक ‘मेघवाल’ नाम देकर संगठित करने का प्रयास कियाजिसके सार्थक परिणाम सामने आए हैंतीन दशक पहले राजस्थान के हाड़ोती और झालावाड़ जिले में समाज के लोगों ने अपने को केवल ‘मेघवाल’ घोषित कर दिया और अपने भू-राजस्व रिकार्ड ठीक करा लिए. 12 सितम्बर, 2004 को झुंझुनू में एक सम्मेलन में शेखावटीखेतड़ीझुंझुनूफतेहपुर आदि के स्वजातीय भाईयों ने घोषणा कर दी कि ‘गर्व से कहो हम मेघवालहैं’यहाँ भी ‘मेघवाल’ जाति के प्रमाण-पत्र बनवाकर भू-राजस्व रिकार्ड ठीक करा लिएइसी के साथ अलवर जिले में भी मुहिम चली तथा वहाँ भी समाज बंधुओं ने ‘मेघवाल’ नाम से जाति प्रमाण-पत्र बनवा लिए तथा भू-राजस्व रिकार्ड ठीक करा लिएहरियाणा की ‘चमार महासभा’ की नारनौल इकाई ने भी अपने को ‘मेघवाल’ घोषित कर दिया हैकुरुक्षेत्ररेवाड़ी व दिल्ली में भी ‘मेघवाल’ घोषित कर दिया हैदिसम्बर, 2006 में संसद द्वारा प्रस्ताव पास कर ‘मेघवाल’ शब्द को हरियाणा की अनुसूचित जातियों की सूची में भी डाल दिया गया है.

रूढ़िवादी हिन्दुओं की घृणादमनशोषण एवं अत्याचारों से बचने के लिए दलित लोग समय-समय पर ‘जाति’ व ‘धर्म’ बदलते रहे हैंवे आर्य समाजी बनेपर वहाँ भी ‘महाशय जी’ की नई पहचान बनकर रह गएवे सिख बनेवहाँ भी ‘रामदासिया’ और ‘मज़हबी’ नाम से उनकी अलग पहचान रखी गईवे ईसाई बनेवहाँ भी उनके नाम के साथ ‘मसीह’ जोड़ कर उनकी पिछली पहचान बरकरार रखी गईवे मुसलमान बनेवहाँ पर भी उन्हें हिन्दुओं की तरह चौथे दर्जे में ‘अंसारी,’ 'मोची', 'सक्का', 'लालबेगी’ बनाकर अलग रखा गयाये नास्तिक बनेनिरंकारी बनेवैरागी बनेजैन बनेआदिधर्मी बनेअधर्मी बनेशाक्य बनेऋषि बनेआचार्य बने और इन्होंने हजारों रूप बदलेपरन्तु रूढ़िवादियों ने इन्हें ‘चमार’ ही कहाइस ‘चमार’ नाम के पुछल्ले से बचने के लिए इन्होंने अनगिनत प्रयास किएपर पुछल्ला लगा ही रहा और उनसे बैर और घृणा का बर्ताव किया जाता रहा.

संगठन बल और सत्ताबल से सभी भय खाते हैंआज जो जाति एकजुट हुई हैवही सफल रही हैअतः आज समय आ गया है कि इस वर्ग की सभी जातियाँ अपनी उपजातियाँआपस के वर्ग भेद को मिटाकर पुनअपने मूल ‘मेघवाल’ नाम को स्वीकारें और अपनी ‘जाति पहचान’ को संगठितसुदृढ़ और अखण्ड बनाए रखने के लिए अब ‘मेघवाल’ नाम के नीचे एक हो जाएँ.

मेघवालों में आपस में यदि कोई समाजबंधु विभेद पूछना भी चाहे तो कह सकते हैंमैं ‘जाटव मेघवाल’ हूँमैं ‘बैरवा मेघवाल’ हूँमैं ‘बुनकर मेघवाल’ हूँ मैं ‘बलाई मेघवाल’ हूँइत्यादि. ‘मेघवाल’ शब्द से एक बार शुरूआत तो होइसके बाद साल-महीनों में यह विभेद भी समाप्त हो जाएगाआपसी भेदभाव भुलाकर रोटी-बेटी का व्यवहार शुरू करेंजब अन्य जातियों के लोग मेघवालों के शिक्षित बच्चों के साथ अपने बच्चों की शादी बिना किसी हिचकिचाहट के कर रहे हैं तो हम छोटी-छोटी उपजातियों में भेदभाव नहीं रखें तो अपनी एकता बनी रहेगीमिथ्या भ्रम व भेदभाव की निद्रा से जागें और एकता का परिचय देकर अपने संवैधानिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए एवं पाखंडों का पर्दाफाश करने के लिए अग्रसर होवेंइसलिए पहली जरूरत यही है कि हम सभी हीनताबोध से मुक्त हों.

मेघवंशीय समाज की कई उपनामित जातियों की स्थानीय समितियाँसंस्थाएँसंगठनपरिषद्ट्रस्ट इत्यादि बने हुए हैंइन इकाइयों के पदाधिकारीगण अपने प्रभुत्व व पहचान कायम रखने के लिए सभी को एक नाम ‘मेघवाल’ के नीचे लाने के लिए शायद थोड़ी अनिच्छा प्रकट करेंइसके लिए सुझाव है कि ‘विश्व मेघवाल परिषद्’ या ‘अन्तर्राष्ट्रीय मेघवाल परिषद्’ नाम की एक प्रतिनिधि संस्था गठित की जाएउसमें सभी उपनामित ‘मेघवंशीय’ जातियों को एक मानकर जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाए व रोस्टर के आधार पर लाटरी से प्रत्येक वर्ष अध्यक्ष का चयन किया जाएभारत देश की सभी मेघवंशीय उपजातियाँ छोटे-बड़े का भेद भुलाकर आपसी सहयोग का एक समझौता कर सकती हैंइसी प्रकार सभी अनुसूचित जातियाँ भी यदि मेघवाल नाम के साथ जुड़ जाएं तो विश्व की कोई भी ताकत उनकी एकता को चुनौती नहीं दे सकती

नाम बदलने के साथ-साथ हमें इन बुराइयों सेरूढ़ियों से भी निजात पानी होगीउदाहरण के तौर पर हम मृत्यु-भोज पर हजारों रुपए खर्च कर डालते हैंजो पाप हैमाता-पिता के जिंदा रहते उनकी सेवा करने से समस्त प्रकार का सुख प्राप्त होता हैअतअनेक देवी-देवताओं के मंदिरों में माथा टेकने से अच्छा है कि घर पर माँ-बाप की सेवा करेंमाँ-बाप से बड़ा भगवान् इस दुनिया में कोई नहीं हैहमें धोखे में रखकरभटकाकरकर्मकांडों के चक्रों में फँसाया गया हैनिकलो इन कर्मकांडों सेइस धर्मभीरूता को त्यागकर नए सवेरे की ओर बढ़ोआज विज्ञान का युग हैहमारे लिए अच्छा है कि हम विज्ञान सम्मत ‘चावार्क धर्म’ अपनाएंगूंगे-बहरे न बन कर वाक्शक्ति संपन्न बने!

हमें सुनिश्चित करना है कि हम आर्थिक रूप से सम्पन्न होंआर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने का तरीका है कि हम केवल नौकरी की तलाश में न रहकरव्यापार (बिज़नेसकी ओर भी ध्यान देंजनसंख्या बढ़ोतरी के अनुपात में आजकल नौकरियाँ बहुत कम रह गई हैंइसलिए हमें नौकरियों के भरोसे नहीं रहकर दूसरे धंधों की ओर ध्यान देना चाहिएयह शाश्वत सत्य है कि जिसने भी समय के साथ स्थान परिवर्तन कियाबाहर जाकर खाने-कमाने की कोशिश कीवे सम्पन्न हो गएहम लोग कुँए के मेंढ़क की तरह गाँव को ही अपना संसार समझकर गाँव की अर्थव्यवस्था के चलते दबे और पिछड़े रहे हैंहम केवल गाँव में ही धंधे की क्यों सोचेंशहरों में जाकर भी धंधा कर सकते हैंमन में शंका तो ज़रूर होगी कि क्या हम व्यापार में कामयाब को पाएँगेआज का समय चुनौतियों से घबराकर भागने या इसके समक्ष समर्मण करने का नहींबल्कि उनका डटकर मुकाबला करने का हैहिम्मत करने वालों को सफलता अवश्य मिलती हैदृढ़ इच्छा शक्ति के साथ हम कुछ भी हासिल कर सकते हैं


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विशेष नोट :-

कश्मीर में शंकर वर्या (वर्मा-वर्मनगोपाल वर्यासंघटबारत वर्मनसुगन्ध वर्मनगोपालरानी सुगन्धाचक्रवर्तीबरछतभारतसूर्य वर्मनशंकर वर्मनचक्रवर्ती द्वितीयअनमीतआदित्य वर्मन इत्यादि मेघवंशीय राजाओं के शासन का उल्लेख मिलता है। कश्मीर के इन शासकों के पूर्वज चर्मकार थे। उस समय चमड़े के काम को अपवित्र नहीं माना जाता थाक्योंकि सामान्य दिनचर्या में चमड़े का भरपूर उपयोग किया जाता था।  
 
(सौजन्य से -चहार गुलषन-मुकद्दमा-साहिबजादा षौकत अली खाँ) 
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संदर्भित पुस्तकें

People of India - An Anthropology of India
गुलामगीरी - ज्योतिराव गोविंदराव फुले
अछूत कौन और कैसे - डॉ. भीमराव अंबेडकर
प्राचीन भारत का इतिहास - विजेंद्र नारायण झा एवं कृष्ण मोहन श्रीमाली
आदिम जाति चमार - डॉ. सोहनपाल सुमनाक्षर
मेघवंश इतिहास - स्वामी गोकुलदास
मेघवंश : इतिहास एवं संस्कृति - ताराराम
Meghs of India - Sh. R.L. Gottra
मेघऋषि कौन/मेघवाल कैसे - आचार्य श्री गुरुप्रसाद के.पी.  


मेघवंश की गोत्र प्रथा

गोत्र व्यवस्था और मेघवंश : ताराराम
  
(यह आलेख माननीय ताराराम गौतम जी की पुस्तक 'मेघवंश- इतिहास और संस्कृति-2' का एक अंश है)

हिंदू समाज विभिन्न जातियों का एक ऐसा जाल हैजिसे समझना एवं भेदना बड़ा मुशिकल है। इन जातियों की पूर्वगामी व्यवस्था को 'वर्ण-व्यवस्थाके रूप में प्रकट किया जाता है एवं उसे धर्म प्रणीत ठहराया जाता है। सामाजिक व्यवस्था के धर्मप्रणीत आधार को सुव्यवस्थित तरीके से जितनी चतुराई से व्यावहारिक जामा हमारे देश में पहनाया गयाउतना अन्य किसी भी देश में देखने और सुनने को भी नहीं मिलता। कदाचित भारत देश को धर्म प्रधान देश कहना उचित लगता हैजब उसकी प्रत्येक सामाजिकआर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में हम धर्म का गहरा आधार पाते हैं। परंतु गहराई में जाने पर ऐसा मालूम पड़ता है कि यह प्रचार का एक साधन भी है। हम इस नाम से उन समस्त तत्त्वों का प्रचार करते हैंजो वर्ण प्रभुत्व (वर्ण-प्रभुत्वके पोषक हैं। वर्ण-व्यवस्था,जाति-व्यवस्था या गोत्र-व्यवस्था की उत्पत्ति का जो भी आधार रहा हो वह आज इतना महत्वपूर्ण नहीं हैपरंतु सामाजिक और ऐतिहासिक रूप से वर्गप्रभुत्व के दृष्टिकोण से आज भी ये धर्मप्रणीत आधारभूत है। अतइस दृष्टि से मेघवंश के संदर्भ में इस पर विचार करना चाहिए।
 हिंदू समाज में जाति अपने आप में न केवल एक सामाजिक घटक बन चुका हैअपितु राजनीतिक और सांस्कृतिक घटक भी बन चुका है। सामाजिक और सांस्कृतिक घटक रूप में प्रत्येक जाति अपने प्रभुत्व के लिए गोत्र की सहायता लेती है। जातिवादी व्यवस्था में वर्ग प्रभुत्व को स्थायी बनाए रखने में गोत्र-व्यवस्था ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। भारतीय समाज किंवा हिंदू समाज में गोत्र का विचार विभिन्न सामाजिक रस्मों-रिवाज एवं सामाजिक सरोकारों में किया जाता हैयह रूढ़ि मेघ समाज में भी वर्तमान है। मेघ समाज में गोत्र की प्रथा अन्य समाजों में व्याप्त इस प्रथा की देखा-देखी से आयी है। जब चारों ओर गोत्र की परंपरा का बोलबाला हो गयातो मेघों ने भी अपने को ब्राह्मणवादी व्यवस्था में मिलाते हुए इस व्यवस्था को प्रश्रय देना प्रारंभ कर दिया। यह गोत्र-परंपरा मेघों की अपनी सामाजिक या सांस्कृति परंपरा नहीं हैबल्कि ब्राह्मणी परंपरा से ली गई प्रथा है।
 ब्राह्मणवादी व्यवस्था में प्रत्येक जाति अपनी उत्पति किसी न किसी ऋषि या नायक (शूरवीरसे जोड़कर अपनी जाति के वर्ग प्रभुत्व की व्याख्या करती है। अपनी जाति की श्रेष्ठता को स्थापित करने में गोत्र व्यवस्था को महत्वपूर्ण आधार के रूप में देखा जाता है। ये सब 'गोत्रव्यवस्था को परंपरागत रूप से मिली दृढ़ मान्यता के सूचक हैं। ब्राह्मणवादी व्यवस्था के पोषक ऋषियों ने देखा कि जब तक व्यक्ति या समाज के जीवन में जात्याभिमान या वंश अभिमान की सृष्टि नहीं की जाएगीतब तक वर्ग प्रभुत्व की कल्पना साकार रूप नहीं ले सकती है। इसीलिए उन्होंने इसे व्यावहारिक रूप देने के लिए गोत्र प्रथा का सृजन किया। प्रारंभ में इने-गिने ऋषि थेजिन्होंने इस व्यवस्था को चलाया। परंतु बाद में यह संख्या बढ़ती गयी। कई ऋषियों के नाम वेदोंब्राह्मणों और उपनिषदों में आते हैंपरंतु वे किसी गोत्रकर्ता अर्थात गोत्र-व्यवस्था को चलाने वाले नहीं बताए गए। वेदों में उल्लेखित बहुत से ऋषि मन्त्र दृष्टा बताए गए हैंपरंतु वे सभी भी गोत्र-कर्ता नहीं हैं। स्पष्टतइस व्यवस्था को लेकर भी ऋषियों में मतभेद थे। भारत की विभिन्न परंपराओं में इसका कभी-भी एक-सा स्वरूप व स्वीकृति नहीं रही है।
 भारत की ब्राह्मणवादी परंपरा में गोत्र-भेद की पृष्ठभूमि भेद-भाव और ऊँच-नीच की वर्णवादी व्यवस्था को स्थायी और सनातन बनाने के लिए ही रची गई है और इसे चालू रखकर प्रथा एवं परंपरा का रूप इसलिए दिया गया,क्योंकि यह वर्ण व्यवस्था या जाति-व्यवस्था को मजबूत बनाती है। वस्तुतयह मनुष्यों को विभक्त करने की एक अन्य सोची-समझी भेदकारी व्यवस्था हैजो जन-जीवन में रूढ़ होकर परंपरा के रूप में चली आ रही है। वैदिक व्यवस्था या ब्राह्मणवादी व्यवस्था में इससे किसी व्यक्ति या समुदाय विशेष की आंशिक इतिहास की छानबीन करने में भी सहायता मिलती है। वैदिक परंपरा में यह उस समय की देन हैजब मानव-समुदाय अनेक भागों में विभक्त होने लगा था और उसे अपने पूर्वजों और संबंधियों का ज्ञान कराने के लिए संकेत की आवश्यकता प्रतीत होने लगी। क्रमशजैसे-जैसे मानव-समाज अनेक भागों में विभक्त होने लगा व वर्ण-व्यवस्था प्रभावी होने लगी,वैसे-वैसे इस गोत्र-व्यवस्था या गोत्र नाम के प्रति मनुष्यों में मोह भी बढ़ता गया। भारत की जिन परंपराओं में इसका कुछ भी स्थान नहीं थावहां भी यह धीरे-धीरे फैल गई। इस प्रकार से विवाह-संबंध और सामाजिक रीति-रिवाजों में उसका विचार किया जाने लगा एवं किसी न किसी रूप में सभी ने इसको स्वीकृति प्रदान कर दी। वर्तमान मेघवाल समाज भी इससे बच नहीं सका। प्रारंभ में जिन आठ ऋषियों को गोत्रकर्ता माना जाता हैउन्हें गोत्र-प्रवर में इस प्रकार से उल्लेखित किया गया है-
जमदग्निभरद्वाजो विश्वामित्रात्रिगौतमा:
वशिष्ठकश्यपोSगस्त्यो मुनयो गोत्रकारिण:।।
 अर्थात जमदग्निभरद्वाज विश्वामित्रअत्रिगौतमवशिष्ठकश्यप और अगस्त्य ये गोत्रकर्ता मुनि हैं। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि जगदग्नि आदि इन आठ ऋषियों के समय भृगु और अंगिरा आदि भी अनेक ऋषि थेपरंतु उस समय उनके नाम के गोत्र का प्रचलन नहीं हुआ था। ये अन्य ऋषि भी मंत्रदृष्टा थेपरंतु इनके नाम से गोत्र नहीं बनें अर्थात ये गोत्रकर्ता नहीं बन पाए। ऐतिहासिक रूप से यह विचारणीय है कि ऐसा क्यों हुआ। एक ही जाति में अलग-अलग गोत्र भी सुने जाते हैं और अलग-अलग जातियों का एक ही गोत्र या समान नाम के गोत्र भी सुने जाते है। इन सबके विश्लेषण से एक बात स्पष्ट होती है कि हक़ीकत में इन ऋषियों या शूरवीरों का एक-दूसरे ऋषि या शूरवीर से कुछ भी लेना-देना नहीं हैतभी तो कई जातियां एक ही नामधारी ऋषि से अपनी उत्पत्ति बताती हैं। परंतु वास्तव में उन जातियों का आपस में कुछ भी लेना-देना नहीं होता है। साधारणतया ब्राह्मण परंपरा में गोत्र प्रथा को रक्त-परंपरा की पर्यायवाची माना गया है। अत: यह परंपरा यह स्वीकार करती है कि ब्राह्मण सदा-सर्वदा ब्राह्मण ही बना रहता है। जिसका ब्राह्मण जाति में जन्म हुआ हैवह अन्य जाति वाला कभी नहीं हो सकता है। ब्राह्मणवादी परंपरा में प्रारंभ से ही सदाचार की अपेक्षा रक्त परंपरा को अधिक महत्व दिया गया है। जब इस परंपरा में रक्त-शुद्धता का सिद्धांत अस्वीकृत होने लगा या डंबोडोल होने लगातो रक्त की शुद्धता के सिद्धांत को सामाजिक व्यवस्था की शुद्धता के सिद्धांत पर ला खड़ा किया गया। यही गोत्र परंपरा का गंभीर भेद है। अन्य देशों में रंगभेद या नस्लभेद तो हैपरंतु गोत्र-भेद नहीं है। ब्राह्मणवादी परंपरा में जाति की इस जटिल व्यवस्था को गोत्र-प्रवर की व्यवस्था ने न केवल भेदकारी बनायाअपितु उसे कारगर व स्थायी बनाने में भी संस्थागत आधार प्रदान किया।
 भारत की गैर ब्राह्मणवादी परंपराओं में गोत्र व्यवस्था का ऐसा कोई भेदकारी स्वरूप नहीं था। वर्ण-व्यवस्था या जाति-व्यवस्था की शुद्धता के आधारभूत रूप में गैर ब्राह्मणवादी परंपराओं यथा बौद्ध-जैनों में गोत्र का ऐसा कोई विधान कभी भी स्वीकृत नहीं हुआ। वैदिक लोगों की गोत्र की व्यवस्था उन-उन ब्राह्मणों को उन-उन ऋषियों का वंशज प्रकट करती है। ब्राह्मणवादी गोत्र-व्यवस्थाजो पहले उच्चवर्ण तक ही थीवह धीरे-धीरे सभी वर्णों व जातियों में से गोत्रों की जो व्यवस्था ब्राह्मणों तक सीमित थीवह क्षत्रियों और वैश्यों तक जाने या अनजाने रूप में आ गईपरंतु ब्राह्मणों के अलावा अन्य वर्णों में गोत्र का कोई महत्व नहीं था।
 वर्णों में गोत्र का कोई महत्व नहीं था और शूद्र एवं गैर वैदिक लोगों में तो इसका वैसे ही कोई महत्व नहीं रखा गया था यहाँ तक कि क्षत्रियों में भी इसका कोई महत्व नहीं थामेघ समाज का गठन पूर्ण रूपेण गैर ब्राह्मणवादी परंपरा से हुआ थाअतवे इससे अनभिज्ञ से बने रहेधीरे-धीरे मेघ समाज अब एक जाति के रूप में पुकारा जाने लगा और अभिहीत किया जाने लगा तो वर्णवादी व्यवस्था के अन्य पोषक तत्त्वों का भी इस समाज मेंप्रश्रय मिलाना शुरू हुआ। इसी के परिणाम स्वरूप वे खाप को ही अपना गोत्र कह देते हैं।
 मेघ समाज संपूर्ण भारत में मेघ जाति से ही पहचाना जाता है। यह अपने आप में एक परंपरागत सांस्कृतिक घटक हैजिसकी अपनी एक विशिष्ट पहचान है। मेघों का अपना वंश है। वे वंश के नाम से ही जाने जाते हैं,इसके अलावा इनका कोई गोत्र नहीं है। वंश या बंस ही उनका कुल या गोत्र हैअन्य दूसरा कोई गोत्र नहीं है। अपनी विशिष्ट सामाजिक और राजनीतिक सोच एवं सांस्कृतिक व धार्मिक परंपरा से उनके वंश का गठन हुआ है। इस वंश या बंस को कई समाज सुधारकों ने गोत्रकर्ता ऋषियों से जोड़कर देखने की चेष्टा की। उनका प्रयास हिंदू व्यवस्था में इस जाति के मान को बढ़ाने हेतु थापरंतु वास्तव में ऐसे प्रयास इस जाति की हीनता को ही स्थायी बनाने वाले सिद्ध हुए हैं। अतमेघों को अपने कुल या बंस को ही पुनप्रतिष्ठित करना होगा। जिसे ब्राह्मणवादी व्यवस्था में सम्मिलित होने के प्रयासों में वे भूल गए हैं। सन 2001 की भारत देश की जनगणना में मेघ जाति सबसे ज्यादा राजस्थान में निवास करती हैजहाँ बहुधा वे मेघवाल नाम से जाने जाते हैं। राजस्थान की समस्त अधिसूचित अनुसूचित जातियों की जनसंख्या में इनकी जनसंख्या 21.23% है। जो चमारों की जनसंख्या से थोड़ी सी कम है। जम्मू-कश्मीर की समस्त अधिसूचित अनुसूचित जातियों की जनसंख्या में मेघों की जनसंख्या39.00% से ज्यादा है। इस प्रकार से यहां पर मेघ लोग सघन रूप से निवास करते हैं। इन मेघों की कुछ खापें एक-सी हैं अर्थात मिलती हैं एवं कुछ खापें ऐसी हैजो नहीं मिलतीं। यहां पर उसकी विवेचना अपेक्षित नहीं है। परंतु इससे एक बात स्पष्ट है कि कुछ खापें तो भौगोलिक प्रभाव से बनी हैकुछ राजनीतिक कारणों से व अन्य कारणों से उत्पन्न हुई हैं। उनमें गोत्र प्रवर की कोई मान्यता ऐतिहासिक रूप से कभी भी नहीं रही है। इस बात को स्पष्ट करने के लिए राजस्थान की मेघ जाति की कुछ खापों का उल्लेख करना समीचीन हैजिससे मेघ जाति इस गोत्र के बारे में पनप रही मिथ्या धारणा को समझ सके एवं पुनएक सांस्कृतिक और राजनीतिक वजूद रखने वाला प्रभुत्वकारी घटक बन सके।
 राजस्थान के मेघवालों में गोत्रकर्ता के नाम का कोई भी गोत्र प्रचलित नहीं है। वे अपने सामाजिक रीति-रिवाजों में अपनी खाप को ही गोत्र का नाम दे देते हैं। इस प्रकार से खाप की अभिव्यक्ति उनके ब्राह्मणवादी गोत्र की कमी को पूरा कर देती है। ये खापें भी राजस्थान में बहुधा राजपूतों की उपजातियों से मिलती हैं। यह ध्यान देने योग्य है कि राजपूतों की ये उपजातियां भी उनका कोई गोत्र या प्रवर नहीं है। वस्तुतराजपूतजाट और मेघ आदि जातियों का परिघटन एक ही आधार पर हुआ हैपरंतु परंपरा व प्रभुत्व भेद से उनमें ऊँच-नीच की दीवारें खड़ी हो गई अन्यथा ये सभी एक ही घटक दल व घटनाक्रम की उपज हैं।
 मेघ समाज एक जाति के रूप में ज्ञात होने से पहले एक संगठित व अभिज्ञात राजनीतिक और सांस्कृतिक दल था जिसकी राजनीतिक सत्ता का केन्द्र वत्स जनपद था। वहां पर मेघ राजा वसिष्ठीपुत्र भीमसेन के शौर्य एवं बल से उनको एक विशेष पहचान मिली। की पीढ़ियों तक शासन करने के बाद जब ये सत्ताविहीन हुए तो विस्थापित हुआ यह समाज भारत के विभिन्न भागों में जा बसाजहां पर ये कई जगहों पर शासक या गवर्नरों के रूप में ख्यात नाम हुए। चूंकि मेघों की परंपरा वर्णजाति और गोत्र आदि परंपरा से भिन्न थीअतउनकी पहचान वशिष्टी के नाम से ही की जाती रही अर्थात मेघ जाति बनने से पूर्व ये अपने को वशिष्टी या वशिष्ठा नाम से ही अपना परिचय देते थे जो उनके गौरव और शौर्य का इतिहास बयान करता था। अतसारे भारत में मेघ वाशिष्ठी,वशिष्टा या वासिका नाम से संज्ञान हुए। कई भू-भागों में यह वशिष्टा नाम धीरे-धीरे लुप्तप्राय हो गया और भू-भाग विशेष में निवास करने के कारण उस भू-भाग का नाम उनके साथ जुड़ गया यथा मारू-मेवाड़ा आदि,ऐतिहासिक रूप से मेघों के प्रतिबोध हेतु ऐसे कई अन्यान्य शब्दों का भी प्रयोग होने लगा। परंतु ये न तो उनके गोत्र थे और न ही उन्होंने इन्हें गोत्र के रूप में धारण किया था। उस समय तक वे गोत्र-व्यवस्था को अभिसात नहीं कर पाए थेक्योंकि अभी तक ब्राह्मणवादी व्यवस्था में उनका विलीनीकरण नहीं हुआ था।
 राजस्थान में राजपूतों के उत्कर्ष के समय और उसके बाद भी उनमें गोत्र-प्रवर की ललक कहीं पर भी दृष्टिगोचर नहीं होती है। इसके कई कारण थेपरंतु सबसे बड़ा कारण यह था कि प्रभुत्वकारी रूप में उभरे राजपूत भी गोत्र-व्यवस्था के प्रति उदासीन ही थे। यह तो राजपूतों का जब हिंदूकरण हुआतो उनमें हिंदू वर्ण व्यवस्था में उच्च स्थान प्राप्ति के उत्साहस्वरूप गोत्र के प्रति उनका रुझान बढ़ा। ब्राह्मणवादी व्यवस्था के पुरोधे गैर ब्राह्मणवादी परंपराओं को अपने में मिलाने के लिए उनको कृत्रिम नाम और उत्पति की कथा-किंवदतियों से उनका उत्साहवर्धन कर रहे थे। इस युग में एक ही घटक दल के विभिन्न मानव समूह विभिन्न जातियों में विभक्त कर दिए गए। जिनका राजनीतिक वजूद स्थिर हो चुका थावे राजपूत नाम से ब्राह्मणवादी व्यवस्था में उच्चवर्ण में मिला दिए गए व खेती-बाड़ीशिल्पकारी या अन्य पेशों में संलग्न लोगों कोजो ब्राह्मणी परंपरा के नहीं थेउन्हें निम्नस्तर पर खपाया जाने लगा। सत्ता प्राप्त लोगों का अतिउत्साह से पुरानी परंपरा में मेल कराने का कार्य उनके इतिहासकारों ने बखूबी किया बाकी आमजन को उनका आश्रित बनाकर उनकी अभिज्ञात जाति का नाम धारण करने का लोभ देकर उनको भी इस चक्रव्यूह में पीसा गया। यह जनता जनार्दन कहीं से भी न तो ब्राह्मण थी और न ही शूद्रवैश्य या अन्य वर्णवादी व्यवस्था का अंग। परंतु जब उनके बड़े-बड़े लोगों को मिला दियातो उनके अन्य स्वजनों को भी इस घेरे में लेना आवश्यक था। इसी पर पूरा सामाजिक और राजनीतिक वजूद टिका था। अतएक शासक कौम मेघ काजिसका कोई अभिज्ञात गोत्र नहीं थाउसे इस व्यवस्था ने अपने में खपाने में सफलता प्राप्त की। उनके लिए इतना भर अभीष्ट था कि वे फलां-फलां राजपूत वर्ग या जाति से हैंचूंकि वे अब शासक वर्ग से नहीं हैअतउनकी स्थिति निम्न है। खेती-बाड़ी उनका मुख्य पेशा था। वर्षा के मौसम के अलावा वे कपड़े बुनने का कार्य व अन्य शिल्पकार्यों में संलग्न हो गए। कपड़े-बुनने व अन्य शिल्प व दस्तकारी ब्राह्मणवादी व्यवस्था में शूद्र की श्रेणी में ही गिने जाते थे। अतधीरे-धीरे हिंदू व्यवस्था में वे हीन अवस्था को प्राप्त होते गए।
 प्रभुत्कारी जातियों के नाम का उपयोग उनकी जाति नहीं भीबल्कि वह उनका नख कहलाता था। नख का वास्तविक अर्थ यही है कि जो-जो जिस-जिस नख को धारण करता हैवह-वह उस-उस शासक के अधीन है। राजस्थान में मेघों में विभिन्न खापों के नाम यथा परिहारपँवारचौहानसोलंकीराठौड़भाटी आदि प्रचलित हैं,वे भी उनके गोत्र नहीं हैं। बल्कि स्पष्टतः उनसे वही अद्यबोध होता है कि फलां-फलां सत्तासंपन्न वर्गों से ही इनका संबंध है। ये खापें मेघों के गोत्र कदापि नहीं रहे हैं व न ये गोत्र हैं। ये जो खापें हैं वे भौगोलिक और राजनीतिक कारणों से बनी हैंइसके अलावा इसमें गोत्रप्रवर आदि का कोई आधार भी नहीं है। इसे स्पष्ट करने के लिए हमें इन राजपूतों के गोत्रों के बारे में जानना आवश्यक है।
 ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह सुविदित है कि ब्राह्मणों के गौतमभरद्वाजअत्रि आदि अनेक गोत्र मिलते हैंजो उन ब्राह्मणों का उन-उन ऋषियों का वंशज होना माना जाता है। परंतु राजपूतों के गोत्र उनके वंशकर्ता के सूचक नहीं हैंक्योंकि प्रारंभ में गोत्र व्यवस्था ब्राह्मणों तक ही सीमित थी। यह विशुद्ध रूप से वर्ण व्यवस्था को टिकाऊ बनाने की एक कारगर युक्ति थी जिसके प्रति जितने कायल ब्राह्मण थेअन्य कोई वर्ग उतना उत्सुक नहीं था। परंतु धार्मिक व राजनीतिक क्षेत्र में ब्राह्मणों की पूरी पैठ थीअतइसे पुरोहित के माध्यम से क्षत्रियों तक विस्तारित किया गया। जो-जो पुरोहित जिन-जिन क्षत्रियों के याजक होते थेउन-उन क्षत्रियों को भी उस गोत्र का माना जाने लगा। यह सिर्फ धार्मिक पूजा-पाठ-यज्ञ-याज्ञ आदि तक सीमित था। भगवान बुद्ध एवं श्रमणवादी परंपरा ने वर्ण व्यवस्था को स्थायी करने वाली इस संकल्पना को कभी भी स्वीकार नहीं किया। अतबौद्धमय भारत में हमें क्षत्रियों के गोत्रों का कहीं पर भी कोई सायाश उल्लेख नहीं मिलता है। बौद्ध धर्म के अपकर्ष के बाद एवं हिंदू धर्म के उत्थान के समय गोत्र की संकल्पना ने फिर दृढ़ होना शुरू किया और राजपूतों के उदय के साथ उनके हिंदू धर्म में मिल जाने पर उनके भी गोत्रों पर विचार किया जाने लगा। जिस-जिस राजपूत राजे के जो-जो पुरोहित होते थेवे उस-उस गोत्र में अभिज्ञात किए जाने लगे। यह सरल युक्ति राजपूतों व अन्य घटक दलों को ब्राह्मणवादी व्यवस्था में अंतर्भूत करने में संजीवनी का काम करने लगी और इस प्रकार से उन-उन गोत्रों से जुड़े प्राचीन क्षत्रियों से इन राजपूतों ने बड़े उत्साह से अपना संबंध जोड़कर इतिहास की रिक्तता को पूरा करने में कामयाबी हासिल की। परंतु निम्नस्तर पर जीवन यापन करने वाले वर्ग को इससे न तो कोई सरोकार था और न गौरव और न ही ब्राह्मणी व्यवस्था उन्हें गोत्र या प्रवर की परिधि में लाने की इच्छुक थीक्योंकि गोत्र की संकल्पना जात्यायिमान और वर्णवाद से जुड़ी थीजिसे ब्राह्मणवादी व्यवस्था खंडित या कलुषित नहीं करना चाहती थी। अतनिम्नस्तर पर जीवनयापन करने वाला वर्ग कभी भी इसके प्रति कायल नहीं रहा।
 जहां तक परिहारपंवारभाटी आदि नामों का संबंध है। ये न तो उनके गोत्र हैं और न राजपूतों की एक-एक खाप में अलग-अलग गोत्रों की अभिव्यक्ति ही इस बात का संकेत करती है कि जातीयता के दायरे में लिए जाते वक्त इन राजे-लोगों को कहां-कहांक्या-क्या मेल-जोल करना पड़ा। कुछ विद्वान यह अवश्य कहते हैं कि राजपूतों के गोत्र भी वास्तव में उनके मूल पुरुषों के सूचक हैंपुरोहितों के नहीं और पहले क्षत्रिय लोग ऐसा ही मानते थे अर्थात भिन्न-भिन्न क्षत्रिय वास्तव में उन ब्राह्मणों की संतान हैंजिनके गोत्र वे धारण करते हैं। इसी युक्ति को मेघ समाज में भी फैलाने का कार्य अज्ञानतावश कुछ लोग करने लगे हैंजिसका आशय यह है कि मेघों की फलां-फलां खाप फलां-फलां राजपूत से उत्पन्न है। यह विचार मेघों को हिंदू समाज में निम्नतर स्थिति को जायज ठहराने का कुत्सित प्रयास है। इस कूटनीति व छलपूर्ण बात को प्राचीन काल के मेघ लोग बखूबी जानते थेअत:उन्होंने उसे कभी भी अपना गोत्र नहीं माना। अपना गोत्र तो वे मेघ ही बताते व मानते थे। जो इस जाति या वंश का मूल पुरुष था। उनका मूलपुरुष ही सदैव उनका गोत्र माना जाता था। आंख मूंदकर देखा-देखी करने की बजाय मेघों को अपने वंश को ही गोत्र के रूप में पुनप्रतिष्ठित करना चाहिए।
 जहां तक पुरोहित या गुरु के गोत्र की युक्ति का प्रश्न हैजिससे राजपूतों आदि के गोत्रों का संज्ञान किया जाता हैवह भी मेघों के समाज पर उपयुक्त नहीं बैठती हैक्योंकि आदिकाल से ही मेघ लोग अपने मूलपुरुष के रूप में मेघ नामधारी महापुरुष को ही मानते आए हैं। कई जगहों पर भाषा-भेद या प्रचलन में भेद होने से भले ही उसे मेघऋषिमेघ सिरीमेघरिखमेघ कुमार या धारूमेघ आदि कुछ भी कहा जाता होपरंतु व्यक्तिवाचक मेघ शब्द उन सब में समान रूप से स्वीकार्य है। यह मूल पुरुष ही उनका गोत्रकर्ता (वंशकर्ताहै। इसी बात को मेघों को ध्यान में रखना चाहिए और मानते रहना चाहिए। कुछ लोगों ने वशिष्ठ आदि गोत्रकर्ता ऋषियों का अभिज्ञान होने से व मेघों द्वारा भी प्राचीन काल में अपने को वशिष्ठी या वसीका कहने के आधार पर मेघों का गोत्र वाशिष्ठी बताने की सायास चेष्टा की है। परंतु यह स्पष्ट है कि मेघ लोगों का वासिष्ठी नाम वशिष्ठी ऋषि के कारण प्रचलन में नहीं आया थाबल्कि उनकी मातृशक्ति के बहुमान से प्रचलन में आया था और स्वीकार्य हुआ था। अत:मेघों को पुनअपने प्राचीन गोत्र जिसे मेघवंश कहा गया हैउसे ही मान्यता देनी चाहिए। अन्य जो खापें हैंउन्हें गोत्र के रूप में मान्यता नहीं देनी चाहिएक्योंकि ये खापे किसी भी आधार पर उनके गोत्र नहीं है और न ही उन राजपूत जातियों केजिनसे ये अपना निकास मानते हैं।

Tararam - ताराराम

द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) में पराधीन भारत में ब्रिटिश भारतीय सेना में बतौर एक सैनिक के रूप में बर्मा कैम्पेन में भाग लेकर राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र के श्री धर्माजी मेघ 23 अप्रैल 1947 को सेवा निवृत होकर वापस आये और पाली देवी से विवाह किया। उनके घर में चौथी संतान के रूप में श्री ताराराम जी का जन्म हुआ। धर्माजी के परिवार के लोग सामंतशाही और बेगारी के विरुद्ध संघर्षरत रहे। धर्माजी का शिक्षा के प्रति बहुत लगाव था। अतः उन्होंने अपनी संतान को पढाने का संकल्प लिया और पुत्र ताराराम को उच्च शिक्षा दिलाई।
श्री ताराराम जी की स्कूली शिक्षा ग्रामीण क्षेत्र में हुई। वे बचपन से ही होनहार और प्रतिभाशाली थे। अपनी कक्षा में हमेशा अव्वल रहते। सह शैक्षिक गतिविधियों में भी आपका योगदान उल्लेखनीय रहा। विद्यार्थी जीवन में स्काउट गाइड और एनसीसी के प्रतिभागी रहे। हाई स्कूल में वे तहसील स्तर पर प्रथम रहे। उन्हें जिलाधीश कार्यालय द्वारा 500/ रुपये का नकद पुरस्कार दिया गया। एक सैनिक का पुत्र होने के नाते सरकार से उन्हें सैनिक छात्रवृति भी मिलती रही। तत्कालीन जोधपुर विश्वविद्यालय में स्नातक की पढाई हेतु1975-76 में प्रवेश लिया। जहाँ संस्कृतदर्शनशास्त्रइतिहासराजनीतिशास्त्र,समाजशास्त्र और मनोविज्ञान आदि का अध्ययन किया। स्नातक प्रथम वर्ष में ही विश्व विद्यालय में 73% अंक प्राप्त कर प्रथम स्थान प्राप्त किया। कुलपति ने उन्हें होस्टल में आकर बधाई दी और प्रशस्ति पत्र दिया। विविके इतिहास में किसी भी दलित छात्र का यह प्रथम कीर्तिमान था। पढाई के साथ वे छात्र राजनीती से भी जुड़े रहे और कई आन्दोलनों में सक्रिय व अग्रणी भूमिका निभाई। आपातकाल में वी.सीकी एडवाइजरी कमिटी के भी सदस्य रहे और विभिन्न छात्र संगठनों में अहम पदों पर रहकर साथी छात्रों का मार्ग दर्शन किया।
जोधपुर विश्वविद्यालय जोधपुर (सम्प्रतिजयनारायण विश्वविद्यालयसे मनोविज्ञान में बीए (ऑनर्सकी उपाधि विश्वविद्यालय की वरीयता सूची (Merit) में द्वितीय स्थान के साथ प्राप्त की। अधिस्नातक(एम..) की डिग्री भी उसी विश्वविद्यालय से प्राप्त की। वे सदैव प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होने वाले विद्यार्थी रहे। प्रोफ़ेसर एमसीजोशी के मार्ग निर्देशन में "मानसिक स्वास्थ्यपर पीएचडी हेतु कार्य किया। कुछ वर्षों तक विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान विभाग में एसिस्टेंट प्रोफ़ेसर के रूप में अध्यापन भी किया। एन.सी..आर.टीमें भी बतौर कांउसलर चयनित हुए। आप लम्बे समय से ट्रेड यूनियन आन्दोलन से भी जुड़े हुए हैं। लेबर लॉज़लेबर वेलफेयर और पर्सनल मेनेजमेंट में डिप्लोमा प्राप्त ताराराम जी ने विभागीय कार्यवाहियों में बीस से अधिक कर्मचारियों का सफल बचाव किया है। बैकिंग क्षेत्र में अनुसूचित जाति और जनजाति के कर्मचारियों का संगठन खड़ा किया।
विश्वविद्यालय में अनुसूचित जाति और जन जाति के विद्यार्थियों के साथ होने वाले गैर बराबरी और भेदभाव पूर्ण रवैये के विरुद्ध संघर्ष किया और कई आन्दोलनों में अग्रणी भूमिका निभाई। अनुसूचित जाति के छात्रों की छात्रवृति वृद्धि हेतु 1977-78 में राजस्थान विधान सभा के घेराव की रणनीति बनाने और अंजाम देने में अग्रणी रहे। राजस्थान में इंजीनियरिंगमेडिकल और एमबीए आदि में जनसंख्या के अनुपात में छात्रों का प्रवेश नहीं होता था। उस हेतु संघर्ष किया और कुछ मामलों में हाईकोर्ट में वाद दायर कर जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण सुनिश्चित कराया। राजस्थान के सभी विश्वविद्यालयों में आरक्षण लागू करवाने हेतु संघर्ष किया और उसे हाईकोर्ट द्वारा सुनिश्चित करवाया। इसके अलावा छात्र हित और अनुसूचित जाति/जनजाति के कई सामाजिक आंदोलनों में महत्वपूर्ण कार्य किया।
राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में डॉ अंबेडकर जयंती मनाने की शुरुआत 1976 से की। सन 1977 में जोधपुर में बौद्ध धर्म परिवर्तन कार्यक्रम को सफल बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। पश्चिमी राजस्थान में डॉ अंबेडकर और बौद्ध धर्म प्रचार में 1976 से लेकर आज तक सनद श्री ताराराम जी जोधपुर में अंबेडकर जयंती और आन्दोलन के एक अग्रणी व्यक्तित्व माने जाते है। राजस्थान के प्रसिद्ध अम्बेडकरी और बौद्ध पुनर्जागरण के अग्रणी श्री एच आर जोधा के संपर्क में आने के बाद पूर्णतः बौद्ध और अम्बेडकरी आन्दोलन से जुड़ गए। सन 1977 में प्रसिद्ध अम्बेडकरी एल आर बाली के व डी आर जाटव आदि के संपर्क में आये। उसी समय अंबेडकर भवनदिल्ली आना जाना हुआजहाँ सोहन लाल शास्त्रीभगवान दासएच सी जोशी,जगन्नाथ उपाध्यायस्वरुप चंद और शांति स्वरुप बौद्ध आदि से संपर्क हुआ। जिनसे वे अंबेडकर व बौद्ध आन्दोलन के प्रति और अधिक गंभीर हो गए।

श्री ताराराम जी अपने विद्यार्थी जीवन से ही कई सामाजिक सुधार आन्दोलनों की संस्थाओं से जुड़े रहे। जिसमे शेडूल्ड कास्ट अपलिफ्ट यूनियनभारतीय बौद्ध महासभाबौद्ध परिषद्अंबेडकर सेवा समिति,अंबेडकर नवयुवक संघआल इंडिया समता सैनिक दलस्टूडेंट फेडरेशनप्रगतिशील युवा महासंघ,विद्याथी-अभिभावक संघ आदि प्रमुख है। इन विभिन्न संस्थाओं के विभिन्न दायित्वों व पदों पर रहते हुए अंबेडकर-विचारधारा और बौद्ध धर्म का निरंतर प्रचार किया।
कई दशकों तक जोधपुर व उसके आस-पास के क्षेत्रों में डॉअंबेडकर जयंतियों का सफल आयोजन और सञ्चालन किया। अंबेडकर जन्म शताब्दी वर्ष में सूर्य नगरी विचार मंच का गठन कर साल भर चलने वाली अंबेडकर व्याख्यान माला का आयोजन कियाजिसमें अनु.जाति/जनजाति शिक्षक संघ और भारतीय दलित साहित्य अकादमी को भी जोड़ा और अंबेडकर मिशन का प्रचार किया। अंबेडकर जन्म शताब्दी समारोह का गठन कर वृहद् स्तर पर कार्यक्रम आयोजित करवाए। पाली और जोधपुर में डॉअंबेडकर की प्रथम मूर्ति लगवाने हेतु आन्दोलन कियाजिसके प्रतिफल वहां मूर्तियाँ लग सकी।
विभिन्न संस्थाओं द्वारा आपको सम्मानित किया गया। समाज सेवा हेतु राजस्थान सरकार द्वारा जोधपुर जिले सेबौद्ध साहित्य में योगदान हेतु जैन-बौद्ध विभागकाशी हिन्दू विश्व विद्यालयबनारस ने तथा जन चेतना और अंबेडकर विचारधारा के प्रचारप्रसार हेतु जय नारायण विश्वविद्यालयजोधपुर जन चेतना और प्रजातान्त्रिक मूल्यों के संवर्धन हेतु जीवाजी विश्वविद्यालयग्वालियर आदि द्वारा सम्मनित किया गया। बुद्ध विहार प्रबंधन समिति द्वारा त्रिरतन सम्मानबुद्धा मिशन ऑफ इंडिया द्वारा करुणा मैत्री पुरस्कारजाई बाई चौधरी ज्ञान पीठनागपुर द्वारा नालंदा भीम रतन प्रेस्टिजियस अवार्डभारतीय दलित साहित्य द्वारा अंबेडकर फैलोशिप अवार्डराहुल सांकृत्यायन अवार्ड तथा अन्य कई संस्थाओं द्वारा सम्मानप्रशस्ति पत्र और पुरस्कार नवाजे गए।
श्री ताराराम, एक सम्मान समारोह के दौरान
बहुमुखी प्रतिभा के धनी ताराराम जी का विभिन्न क्षेत्रों में सदैव महत्वपूर्ण योगदान रहा। यूजीसी और विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा आयोजित सेमिनारों व संगोष्ठियों में बौद्ध धर्म-दर्शनअंबेडकर विचाधारा और दलित चेतना पर दर्जन से अधिक शोध-पत्र पढ़े गए। शोधार्थियों की सहायता और मार्ग दर्शन हेतु बौद्ध अध्ययन और अनुसन्धान केंद्र की स्थापना की। 'धम्म पद गाथा और कथा' सहित आपकी अभी तक बौद्ध धर्म-दर्शनमनोविज्ञान और अम्बेडकर विचारधारा पर 18 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है।
Tararam

मेघवाल समाज का इतिहास

भारतवर्ष के सभ्यता इतिहास में पुरातन सभ्यताऐं सिन्धु घाटी, मोहनजोदडो जैसी सम्पन्न सभ्यताओं के पुरातन प्राप्त अवशेषों एवं भारत के कई प्राचीन ऋषि ग्रंथों में मेघवाल समाज की उत्पत्ति एवं उन्नति की जानकारीयां मिली हैं. साथ ही समाज के प्रात: स्मरणीय स्वामी गोकुलदास जी द्वारा सदग्रंथों से प्राप्त जानकारी के आधार पर भी समाज के सृजनहार ऋषि मेघ का विवरण ज्ञात हुआ है. मेघवाल इतिहास गौरवशाली ऋषि परम्पराओं वाला तथा शासकीय स्वरूप वाला रहा है. मेघऋषि का इतिहास भारत के उत्तर-पश्चिमी भूभाग की सरसब्ज सिन्धुघाटी सभ्यता के शासक एवं धर्म संस्थापक के रूप में रहा है जो प्राचीनकाल में वस्त्र उद्दोग, कांस्यकला तथा स्थापत्यकला का विकसित केन्द्र रहा था. संसार में सभ्यता के सूत्रधार स्वरूप वस्त्र निर्माण की शुरू आत भगवान मेघ की प्रेरणा से स्वयं भगवान शिव द्वारा ऋषि मेघ के जरिये कपास का बिजारोपण करवाकर कपास की खेती विकसित करवाई गयी थी. जो समस्त विश्व की सभ्यताओं के विकास का आधार बना. समस्त उत्तर-पश्चिमी भूभाग पर मेघऋषि के अनुयायियों एवं वंशजों का साम्राज्य था. जिसमें लोगों का प्रजातांत्रिक तरीके से विकास हुआ था जहां पर मानवमात्र एकसमान था. लेकिन भारत में कई विदेशी कबीले आये जिनमें आर्य भी एक थे, उन्होंने अपनी चतुराई एवं बाहुबल से इन बसे हुये लोगों को खंडित कर दिया तथा उन लोगों को | सम्पूर्ण भारत में बिखर जाने लिये विवस कर दिया. चूंकि आर्य समुदाय शासक के रूप में एवं सभी संसाधनों के स्वामी के रूप में यहां स्थापित हो चुके थे उन्होंने अपने वर्णाश्रम एवं ब्राह्मणी संस्कृति को यहां थोप दिया था. ऐसी हालत में उनसे हारे हुये मेघऋषि के वंशजों को आर्यों‌ द्वारा नीचा दर्जा दिया गया. जिसमें आज के वर्तमान के सभी आदिवासी, दलित एवं पिछडे लोग शामिल थेभारत में स्थापित आर्य सभ्यता वालों ने यहां पर अपने अनुकुल धर्म, परमपरायें एवं नियम, रिवाज आदि कायम कर दिये थे जिनमें श्रम सम्बन्धि कठिन काम पूर्व में बसे हुये लोगों पर थोपकर उनसे निम्नता का व्यवहार किया जाना शुरू कर दिया था तथा उन्हें पुराने काल के राक्षस, नाग, असुर, अनार्य, दैत्य आदि कहकर उनकी छवि को खराब किया गया. इन समूहों के राजाओं के धर्म को अधर्म कहा गया था. इस प्रकार इतिहास के अंशों को देखकर मेघऋषि के वंशजों को अपना गौरवशाली अतीत पर गौरवान्वित होना चाहिये तथा वर्तमान व्यवस्था में ब्राह्मणवादी संस्कृति के थोपी हुई मान्यताओं को नकारते हुये कलियुग में भगवान रामदेव एवं बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर के बताये आदर्शों पर अमल करते हुये अपने अधिकार प्राप्त करने चाहिये. समाज में मेघवंश को सबल बनाने के लिये स्वामी गोकुलदासजी महाराज, गरीबदास जी महाराज जैसे संत हुये हैं जिन्होंने मेघवाल समाज के गौरव को भारत के प्राचीन ग्रंथों से समाज की उत्पत्ति एवं विकास का स्वरूप उजागर कर हमें हमारा गौरवशाली अतीत बताया है. तथा हमें निम्नता एवं कुरीतियों का त्याग कर सत कर्मों की ओर बड़ने का मार्ग दिखाया है.

मेघवंश इतिहास

मेघजाति की उत्पत्ति एवं निकास की खोज स्वामी गोकुलदासजी महाराज डूमाडा (अजमेर) ने अपनी खोज एवं लेखन के जरिये मेघवाल समाज की सेवा में प्रस्तुत की है जो इस प्रकार है; सृष्टि के आदि में श्रीनारायण के नाभिकमल से ब्रह्मा, ब्रह्मा ने सृष्टि रचाने की इच्छा से सनक, सनन्दन, सनातन, सन्तकुमार इन चार ऋषियों को उत्पन्न किया लेकिन ये चारों नैष्टिक ब्रह्मचारी रहे फिर ब्रह्मा ने दस मानसी पुत्रों को उत्पन्न किया. मरीचि, अत्रि अंगिरा, पुलस्त्व, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ट, दक्ष, और नारद. ब्रह्मा ने अपने शरीर के दो खण्ड करके दाहिने भाग से स्वायम्भुव मनु (पुरूष) और बाम भाग से स्तरूपा (स्त्री) को उत्पन्न करके मैथुनी सृष्टि आरम्भ की. स्वायम्भु मनु स्तरुपा से 2 पुत्र - उत्तानपाद और प्रियव्रत तथा 3 कन्याऐं आकुति, प्रसूति, देवहूति उत्पन्न हुई. स्वायम्भु मनु की पुत्री आकुति का विवाह रूचिनाम ऋषि से, प्रसूति का दक्ष प्रजापति से और देवहुति का कर्दम ऋषि से कर दिया. कर्दम ऋषि के कपिल मुनि पैदा हुये जिन्होंने सांख्य शास्त्र बनाया. कर्दम ऋषि के 9 कन्याऐं हुई जिनका विवाह: कला का मरीचि से, अनुसूया का अत्रि से, श्रद्धा का अंगिरा ऋषि से, हवि का पुलस्त्य ऋषि से, गति का पुलह से, योग का क्रतु से, ख्याति का भृगु से, अरुन्धति का वशिष्ट से और शांति का अर्थवन से कर दिया. ब्रह्माजी के पुत्र वशिष्ट ऋषि की अरुन्धति नामक स्त्री से मेघ, शक्ति आदि 100 पुत्र उत्पन्न हुये. इस प्रकार ब्रह्माजी के पौत्र मेघ ऋषि से मेघवंश चला. वशिष्ट ऋषि का वंश सूर्यवंश माना जाता है. ब्रह्माजी के जिन दस मानसी पुत्रों का वर्णन पीछे किया गया है उन ऋषियों से उन्हीं के नामानुसार गौत्र चालू हुये जो अब तक चले आ रहे हैं. ब्रह्माजी के ये पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र ही गुण कर्मानुसार चारों वर्णों में विभाजित हुये| श्रीमदभागवत में एक कथा आती है कि मान्धाता के वंश में त्रिशंकु नामक एक राजा हुये, वह सदेह स्वर्ग जाने के लिये यज्ञ की इच्छा करके महर्षि वशिष्ट के पास गये और इस प्रकार यज्ञ करने के लिये कहा. वशिष्ट‌जी ने यह कहकर इन्कार कर दिया कि मुझे ऐसा यज्ञ कराना नहीं आता. यह सुनकर वह वशिष्ट‌जी के 100 पुत्रों के पास जाकर उनसे यज्ञ करने को कहा. तब उन्होंने उस राजा त्रिशंकु को श्राप दिया कि तू हमारे गुरू का वचन झूंठा समझकर हमारे पास आया है इसलिये तू चांडाल हो जायेगा, वह चांडाल हो गया. फिर वह ऋषि विश्वामित्र के पास गया, विश्वामित्र ने उसकी चांडाल हालत देखकर कहा कि हे राजा तेरी यह दशा कैसे हुई. त्रिशंक ने अपना सारा वृतान्त कह सुनाया. विश्वामित्र उसका यह वृतान्त सुनकर अत्यन्त क्रोधित हुये और उसका वह यज्ञ कराने की स्वीकृति दे दी विश्वामित्र ने राजा त्रिशंकु के यज्ञ में समस्त ब्राह्मणों को आमंत्रण किया मगर वशिष्ट ऋषि और उनके 100 पुत्र यज्ञ में सम्मिलित नहीं हुये. इस पर विश्वामित्र ने उनको श्राप दिया कि तुम शूद्रत्व को प्राप्त हो जावो. उनके श्राप से वशिष्ट ऋषि की सन्तान मेघ आदि 100 पुत्र शूद्रत्व को प्राप्त हो गये|

हमारे उद्देश्य, मेघवाल समाज

मेघवाल समाज को सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक,सान्स्कृतिक, एवम् मानसिक रूप से समृध्द बनाना, प्रगति मे बाधक कार्य जैसे मृत्यु भोज, शराब सेवन, बाल विवाह, बहु विवाह, दहेज एवम् छुआछूत आदि कुप्रथाओ से छुटकारा दिलाने के प्रयास करना, राष्ट्रीयता की भावना जगाना, चरित्र निर्माण एवम् देशव सामाज मे स्वच्छ वातावरण बनाये रखने के प्रयास करना।समाज एवम् सामाजिक कार्यकर्ताओ पर होने वाले विजातिय शोषण, अत्याचारो एवम् अपराधो को रोकना
मेघवाल समुदाय समृद्ध सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, मानसिक और सांस्कृतिक और समाज के कमजोर लोगों का समर्थन की तरह प्रगति में बाधा कार्यों से छुटकारा पाना