Wednesday, April 9, 2014

मेघवाल समाज के गोत्र

मेघवंश जाती के प्रवर शाखा और प्रशाखा 
प्राचीन क्षत्रियो में चन्द्र वंश और सूर्य वंश ये दो वंश मुख्य मने जाते हैं !फिर ऋषि वंश और अग्नि वंश ये दो वंश और मने गए हैं ,इन्ही चार वंशो से समस्त हिन्दू जाती का प्रदुभाव हुआ हैं !
चन्द्र वंश -ब्रह्माजी के दस मानसी पुत्रो में अत्रीऋषि के समुन्द्र और समुन्द्र के सोम ,इनसे चन्द्र वंश चालू हुआ !इशी वंश में महाराज ययाति हुए ,इनके पुत्र यदु हुए ,जिनके वंशज यदु वंशी हुए और इशी वंश में भगवन कृष्ण का जन्म हुआ !चन्द्र वंश ने विशेष कयती प्राप्त की !इस्सी चन्द्र वंश में आगे चलकर दस शाखाओ का निर्माण हुआ जो जो निम्न हैं !
1 यादव २ गोड३ काबा ४ चन्देल ५ बहती ६ कंवरा ७ तंवर ८ सोरठा ९ कटारिया १० सुरसेन


सुर्यवंश -ब्रह्माजी के पुत्र मरीचि ,मरीचि के कश्यप और कश्यप के विवस्वान (सूर्य)हुए ,इनसे सूर्य वंश चालू हुआ !

इसी वंश में राजा इक्ष्वाकु अधिक प्रसिद्ध हुए हैं ,इन्ही इक्ष्वाकु की ५१ वि पीढ़ी बाद राजा दशरथ हुए थे ,जिनके पुत्र रामचंद्र ,लक्ष्मण ,भरत,शत्रुघ्न हुए !इसी सूर्य वंश में भी दस शाखाये हुए !

१ गहलोत २ सिकरवाल ३ बडगुजर ४ कछवाह ५ बनाकर ६ गहरवार ७ राठोर ८ बडेल ८ बुन्देला १० निकुम्भ !

ऋषि वंश - विवशवान सूर्य के पुत्र नाम श्राद्धदेव मनु था !इनके पुत्र नभग हुए जिनके कुल में रजा अम्बरीश थे ,जिन्होंने अपने व्रत के प्रभाव से दुर्वासा मुनि का मानमर्दन किया था !अम्बरीश के प्रपोत्र रथीतर की स्त्री मदयन्ति ने अंगीरा ऋषि से नियोग करके कई संताने उत्पन्न की ,जो ऋषि वंश नाम से प्रसिद्ध हुई !ये क्षत्रियो की अपेक्षा श्रेष्ठ मणि गई है !इसी ऋषि वंश क्षत्रिय समाज में १२ वंश प्रचलित हुए !
१ सेंगर २ गोतम ३ विसेन ४ चमार गौड़ ५ ब्राहमण ६ भटगोड ७ राजगोंड ८ दीक्षित ९ दिन दीक्षित १० बिलकेत ११ बलखेरिया १२ कनपुरिया !
अग्नि वंश --त्रेता और द्वापर की संधि के समय जब परशुरामजी ने २१ बार युद्ध करके पृथ्वी को नि :क्षत्रिय कर दीया तब परशुरामजी मह्रिषी वसिष्ठ आदि ऋषियों ने अर्बुगिरी (आबू पर्वत) पर एक वृहद् यज्ञ किया !उस यज्ञ कुंड से चार पुरुष प्रकट हुए !
१ चौहान २ पडिहार (प्रतिहार) ३ सोलंकी (चालुक्य) ४ पंवार (परमार) !
यज्ञ की अग्नि से प्रकट होने के कारण ये अग्नि वंशी (हुतासणी)कहलाये !बोद्ध धर्म के अंत के आरम्भ में ही इसी वंश का निर्माण हुआ था !
दोहा - दस रवि ,दस चन्द्र से ,द्वादस ऋषि प्रमाण !

चार वंश हुतासनी (अग्निवंश),ये छतीस बखान !!

इन छतीस वंशो से ही समस्त हिन्दू समाज का प्रदुभाव होता हैं !
इन छतीस वंशो से पूर्व १६ वंश ऋषियों के माने जाते हैं !

१ मरीचि २ अत्रि ३ अगस्त ४ आदरा ५ वसिष्ठ ६ अंगीरा ७ भारद्वाज ८ पाराशर ९ मातंग १० धानेश्वर ११ मह्चंद १२ जोगचंद १३ जोगपाल १४ मेघपाल १५ गरवा १६ जयपाल !

इन सोलह वंशो सहित कुल ५२ वंश होते हैं !

दोहा -आठ बीस ऋषि गोत्र हैं ,चार अग्नि प्रमाण !

दस रवि ,दस चन्द्र से ,पुरे बावन जाण!!

फिर इनकी शाखा प्रशाखाओ द्वारा समस्त हिन्दू समाज का विस्तार होता गया और बढ़ते -बढ़ते आज हजारो जातियों में विभक्त हो गया !
मेघवाल जाती के लिए लिखे गये लेख में उपरोक्त वंश - उपवंश किसी न किसी रूप में अधिकतर पाए जाते हैं !
क्षत्रियो की १८ जातीय मुख्य मणि जाती हैं !
१ गहलोत २ कचवाहा ३ राठौड़ ४ यादव ५ चौहान ६ पंवार (परमार) ७ सोलंकी ८ पडिहार (प्रतिहार) ९ चावड़ा १० तंवर ११ गौड़ १२ चन्देल १३ दहिया १४ मकवाना १५ जोहिया १६ बडगुजर १७ पड़वाडिया १८ टांक !


१ मरीचि ऋषि (सुर्यवंश)गहलोत की शाखा प्रशाखा से २२ गोत्र 

१ गहलोत (गहलोत्या) २ ओस्तिवाल ३ गोदा ४ देवागान्वा ५ खिंवासरा ६ कंसड ७ करसंड ८ कलसड ९

करसिन्धु १० खारड़िया ११ ख्याली १२ खांड १३ खलेरी १४ गहलोत्रा १५ शिसोदिया १६ चूहड़ा १७ बिकुंधा १८

गोंरा १९ खांडपा २० धोधावत २१ राणवा २२ तालपा !


२ मरीचि ऋषि सूर्य वंश कछवाहां से ७ गॉत्र 

१ कछवाहां २ सिंगला ३ छेडवाल ३ खोहवाल ४ कंसुबा ५ कन्हड़ ६ मीणा 


३ मरीचि ऋषि सूर्य वंश राठोड से ८ गोत्र --


१ राठोड (राठोडया) २ सोनगरा ३ लोयमा ४ म्हायच ५ बांदर ६ जोधा ७ बागडा ८ अजेर्या !


४ अत्रि ऋषि चन्द्र वंश यादव में ४६ गोत्र ----

१ यादव (यादवा) २ भाटी (भाटिया) ३ कडेला ४ किलान्या५ कलिरावण ६ कलेचा ७ कालवा ८ कडवासरा ९

कालेरा १० काहनीवाल११ कोहली १२ खामिवास १३ खुडिवाल १४ जाम १५ खोबडा १६ गरडवा१७ जनागल १८

दावा १९ देवाला २० देहरावरिया २१ देपन २२ पटीर २३ पाटोधा २४ बरवड २५ बलायच २६ बरडोयिय २७

बारुपाल २८ बाजडा २९ भाल्याण ३० बेगड ३१ महरडा ३२ लालर ३३ साऊं ३४ निलड ३५ पुनड ३६ कांवल्या

३७ सिंहमार ३८ खामिवाल ३९ झाटीवाल ४० खोखर ४१ पलास्या ४२ बुडिया ४३ आयच ४४ अंणख्या

(इणखिया )४५ खुन्वारा ४६ खत्री


५ अत्री ऋषि चंदर वंश (तोमर)से १६ गोत्र --

१ तंवर २ बुडगाँवा ३ मोलोधा ४ लहकारा ५ जावाल्या ६ गोठण ७ गोठणवाल ८ सलोर्या ९ गोठिया १०

गोरावत ११ गोयल (गुहिल)१२ गोरख्या १३ ढल १४ केलवाल १५ ढाइवाल १६ गोरवा (गुरवा) !



६ ,विश्वामित्र ,ऋषि वशिषठ आदि अग्नि वंश चौहान से ३३ गोत्र --


१ चौहान (चुहान्या ,चुंडा)२ इडिवाल ३ गोठवाल ४ मोमत्या ५ कंकेडिया ६ नारनोल्या ७ भटान्या ८ जेवर्या ९

सोगण १० काला ११ पटीर १२ खती १३ जिलोया १४ जिणवाल १५ निमडया १६ बरोला १७ नरवाण १८

सोलेरा १९ निजरान्या २० निरवाल २१ निरवाणि २२ खिची २३ खारडधा २४ नाल्या २५ चाहिल २६ भालोत

२७ सांचोर्या २८ सामर्या २९ भदोर्या ३० नाडोल्या ३१ चाहिल्या ३२ शिंदर्या ३३ पटीर !

७ अग्नि वंश पंवार से २४ गोत्र ----

१ पंवार २ मोरोड्या ३ दायपन्नु ४ जाटावत ५ बडला ६ लोजडीवाल ७ सुवटवाल ८ लाडणा ९ महरान्या १०

टिकावत ११ बोच्या १२ सिला १३ भंवरेटा (भुरटिया) १४ कथ्नोरिया १५ सांखला १६ चणिया १७ सोडा १८

सरावता १९ गुणपाल २० सेजु २१ खान्भ २२ जाटीवाल २३ सियाल २४ सुवाल 



8 अग्नि वंश पंवार से २४ गोत्र ----

१ पंवार २ मोरोड्या ३ दायपन्नु ४ जाटावत ५ बडला ६ लोजडीवाल ७ सुवटवाल ८ लाडणा ९ महरान्या १०

टिकावत ११ बोच्या १२ सिला १३ भंवरेटा (भुरटिया) १४ कथ्नोरिया १५ सांखला १६ चणिया १७ सोडा १८

सरावता १९ गुणपाल २० सेजु २१ खान्भ २२ जाटीवाल २३ सियाल २४ सुवाल 


८ अग्नि वंश सोलंकी से ४ गोत्र ----

१ असोलंकी २ स्यालवा ३ सुंवालिया ४ बावल्या !


९ अग्नि वंश पडिहार से १५ गोत्र --


१ पड़ीहार २ कदणोच्या ३ कलशी ४ कडवासरा ५ कावडया ६ किराड़ ७ करडीवाल ८ किकरालिया ९ कडेचा

१० कडेलिया ११ कुलरिया १२ गुराहिया १३ गुजरान्या १४ जेठान्या १५ नाथड़ीवाल !


१० गौड़ राजपूतो से ५ गोत्र ---

१ गौड़ २ गंडेर ३ गंडे ४ गँवा ५ गंढीर !

११ पराशर ऋषि चंदेल राजपूतो से ४ गोत्र ---

१ चांदेल २ पावटवाल ३ चंदेला ४ चंडेला !

१२ मकवाना राजपूतो से २ गोत्र ---

१ मकवाना २ मकाना !

१३ दधिची ऋषि सुर्यवंश राठौड़ खांप दहिया से ३ गोत्र ----

१ दहिया (दीया) २ अडान्या ३ भुन्गरिया !

१४ अग्नि वंश चौहान खांप जोहिया से २ गोत्र --

१ जोहिया २ घरट !

१५ सुर्यवंश बडगुजर से १ गोत्र ---

१ बडगुजर

१६ पड़वाड़ीया १ गोत 

१७ नाग वंशी टांक से २ गोत्र ----

१ नागवा २ टांक

साभार ----मेघवंश इतिहास (ऋषि पुराण)

लेखक -

स्वामी गोकुलदासजी महाराज

अलख स्थान ड़ूमाँडा
जिला अजमेर

प्रकाशक -सेवादास ऋषि

अलख स्थान ड़ूमाँडा

जिला अजमेर

धर्माराम मेघवाल- हमारे अग्रणी


धर्माजी मेघ का जन्म एक साधारण मेघवाल परिवार में हुआ था। आपकी माताजी का नाम नैनी बाई और पिताजी का नाम मदाजी था। मदाजी के चार पुत्र और एक पुत्री थी। धर्माजी चौथी संतान थे।

मदाजी के पुरखे ऊँटों पर वर्तमान पाकिस्तान से सामान लाकर जैसलमेर और जोधपुर के इलाकों में बेचते थे। साथ ही गायें-भैसे और भेड़-बकरी पालते थे। वर्षा के दिनों में खेती-बाड़ी के कामों में संलग्न हो जाते थे। औरतें खेती-बाड़ी के कामों से फारिग होने पर कताई-बुनाई का काम करती थीं। उस समय मारवाड़ में सामंतशाही का जोर था और  व्यापक स्तर पर मेघवालों ने और विशेषकर मदाजी  के परिवार वालों ने इसके विरुद्ध आन्दोलन छेड़ रखा था।  इसलिए उनके परिवार को कई बार एक गाँव से दूसरे गाँव भटकना पड़ा। वे मारवाड़ के पिलवा, जूडिया, हापाँ और केतु आदि गाँवों में रहे। उनके कुटुंब के कई लोग सामंतशाही और अकाल के कारन मारवाड़ छोड़कर पाकिस्तान के सिंध हैदराबाद और मीरपुर खास में जा बसे थे। कुछ लोग सौराष्ट्र की मिलों में काम करने चले गए।  उस समय पाकिस्तान और भारत में लोग आते-जाते रहते थे। धर्माजी भी अपने पिताजी के साथ वहाँ कई बार आये और गए।  मदाजी की पहली पत्नी का दो पुत्र और एक पुत्री को  जन्म देने के बाद देहांत हो गया। घर बार को संभालने के लिए मदाजी ने सेतरावा निवासी मेघवाल घमाजी की पुत्री नैनी बाई से विवाह कर लिया। नैनी बाई और मदाजी के दो संतान पैदा हुई। जिसमें धर्माजी बड़े थे।

सन 1925 के अकाल में मदाजी के कुटुम्ब के कई लोग जोधपुर आ गए और और जीवन यापन करने लगे। वर्षा के दिनों में गाँवों में जाकर खेती बाड़ी करते। धर्माजी उस समय बहुत छोटे थे। जोधपुर में रहते हुए वे सरकार की सेवा में आ गए और जब दुनिया का दूसरा प्रसिद्ध जंग छिड़ा तो जोधपुर में अंग्रेजों की सेना में 1942 को भर्ती हो गए। वहाँ से वे कलकत्ता गए, और कलकत्ता से उन्हें जर्मनी और जापान के विरुद्ध बर्मा बॉर्डर पर लड़े जा रहे युद्ध मैदान में भेज दिया।

द्वितीय विश्व युद्ध 1939-1945 के बीच लड़ा गया था, जिसमें वर्तमान राजस्थान के भूभाग से कई मेघ लोग सेना में थे। 01 सितम्बर 1939 से लेकर 02 सितम्बर 1945 तक ब्रिटिश भारतीय सेना बरमा बोर्डेर पर जापान और जर्मनी की हिटलर सेना के विरुद्ध युद्ध रत रही। इस युद्ध में धर्माजी वल्द मदाजी मेघ इसी ब्रिटिश इंडिया आर्मी सेना में सार्जेंट थे। जब बरमा बोर्डेर पर युद्ध तेज हुआ तो उनकी रेजिमेंट के मेजर हुआ करते थे- करिय्प्पा। जो बाद में फील्ड मार्शल जनरल बने। इस सीमा पर 36000 भारत के सैनिक शहीद हुए, 34354 सैनिक घायल हुए और तक़रीबन 67340 युद्ध बंदी बनाये गए। 

धर्माजी युद्ध क्षेत्र में बहादुरी से लड़े। युद्ध की गोलियों को बहादुरी से उन्होंने सहा। उनके एक पैर में कुछ गोलियाँ घुस गयी थीं फिर भी वे डटे रहे। बाद में उनकी जांघ में भी गोलियाँ लगीं। जब करियप्पा साहब को ये सब जानकारी हुई तो उन्होंने धर्मा जी को संभवतः डिब्रूगढ़ मिलिट्री हॉस्पिटल में भर्ती कराया वहाँ गोलियाँ निकल नहीं सकीं। अतः धर्माजी को दीमापुर ले जाया गया। जहाँ उनकी जांघ से मांस काटकर गोलियाँ निकाली गयीं। वहां लम्बे समय तक उनका इलाज चला। धर्माजी को पुरस्कृत किया गया। वे बरमा स्टार और पेसिफिक क्लास्प्स से भी नवाजे गए थे। उन्हें कामैग्न अवार्ड भी मिला। (यह मुझे उन्होंने बताया था, उनके कुछ मैडल मेरे पास हैं; जिनमें से कुछ के फोटो नीचे पोस्ट किये गए हैं).

जापान ने 22 जनवरी 1942 में बर्मा पर आक्रमण किया। भारत की फ़ौज की तादाद बहुत कम थी। एक बार तो ऐसा लगा की भारत की सेनाएँ हार जाएँगी। रसद पानी भी ख़त्म था। परन्तु धर्माजी मेघ जैसे जाबांज़ इस हार को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने कहा कि युद्ध में बंदी बनाये जाने से तो अच्छा है कि युद्ध करते करते मर जाएँ। सैनिकों के इस जज्बे का प्रभाव उनके कमांडरों पर पड़ा। भारत से और थलसेना बुलाई गयी। इम्फाल और कोहिमा में जम कर युद्ध हुआ। जापान पीछे हटने को तैयार नहीं था। जापान ने रंगून पर भी अधिकार कर लिया था। परन्तु धर्माजी जैसे वीर सैनिकों की बदौलत पासा पलट गया और रंगून को भारतीय सैनिकों ने जीत लिया। उधर अमेरिका ने जापान पर बमबारी कर दी। मुझे धर्माजी ने बताया था कि उनके पास युद्ध के पूरे साजो सामान भी नहीं थे। अपने आत्मविश्वास और हौसले से तथा अमेरिकी कार्रवाई की मदद से वे जीत सके थे।

इसी समय धर्माजी मेघ बर्मा और जापान के सैनिकों के संपर्क में आये थे और बौद्ध धर्म की उन्हें जानकारी हुई। जिसे वे हमें यदाकदा बताया करते थे। अमेरिकी सैनिकों के प्रति उनका बड़ा आदर भाव था क्योंकि उनके साथ अमेरिकन सैनिक भी थे जिन्होंने रसद ख़त्म होने पर उन्हें थोड़ा-बहुत डिब्बा बंद रसद दिया था।

सन 1942 में धर्माजी जर्मन-जापान के विरुद्ध 'मिड वे' युद्ध मैदान में थे। यूनाइटेड स्टेट्स द्वारा जापान पर अणुबम गिराने के बाद जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया। जर्मनी पहले ही घुटने टेक चुका था। धर्माजी 1942 से लेकर 1945 तक युद्ध भूमि में रहे। दुश्मनों से लड़ते रहे। कई दिनों तक भूखे प्यासे युद्ध करते रहे। उन्होंने बताया कि प्यास बुझाने के लिए पेट्रोल की घूँट भी सैनिकों ने लिए। ब्रिटिश भारत आर्मी का रसद भी ख़त्म था। अमेरिकन सेना के रसद ने उनकी मदद की। 

युद्ध 6 वर्ष से ज्यादा चला। धर्माजी 1942 से 1945 तक युद्ध के मिड वे में डटे रहे। इतनी लम्बी अवधि तक युद्ध मैदान में धर्माजी जैसे शूरवीर ही टिक सके। बात साफ है कि बहादुरी किसी कौम विशेष की बपौती नहीं है। मेघों की बहादुरी ने समय-समय पर वो परवान चढ़ाये हैं जो बहुत कम वीरों को प्राप्त होते हैं।

संभवतः 1946-47 में धर्माजी अंग्रेजी सेना से वापस मारवाड़ में आ गये। देश आजाद हुआ तो उसके बाद पाकिस्तान से 1947-48 में कश्मीर को लेकर युद्ध हुआ। सेना की भर्ती हुई। बहादुर धर्माजी घर बैठे नहीं रह सकते थे। वे दुबारा आर्मी सर्विसेज कोर्प्स (atillery) में 17 जुलाई 1948 को भर्ती हो गए। उनके नम्बर थे- 6437956 और कश्मीर के पाकिस्तान बॉर्डर पर युद्धरत रहे। युद्ध विराम के बाद सेवा निवृत्त हो वे फिर मारवाड़ आ गये। द्वितीय विश्व युद्ध के समय उनका आइ डी नम्बर था-557879. 

अंग्रेजों की सेना में भर्ती होने से पहले धर्माजी जोधपुर रियासत में बतौर सवार थे। रियासत के समय सैनिक/सिपाही को सवार कहा जाता था। द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने पर विभिन्न रियासतों या प्रेसिडेंसी से सैनिक इकट्ठे कर अंग्रेजों ने इम्पीरिअल रेजिमेंट बनायीं थी। जिसमे धर्माजी मेघ भी एक सैनिक थे। उन्हें सार्जेंट कहा जाता था। इस प्रकार से रियासत के मार्फ़त ही वे अंग्रेज सेना के अंग बने थे। 
धर्माजी मेघ ने सेतरावा गाँव में 1979में बड़े पैमाने पर आंबेडकर जयंती का आयोजन किया।a group photo. Dharmaji Megh is in-between group. Me sitting-1979






जुझारू धर्माराम जी-

सम्मान और स्वाभिमान का जीवन-
सन 1950 में धर्मरामजी आर्मी सप्लाई कोर्प्स(आर्टिलरी) की सेवा से वापस आये। उस समय राजस्थान में बेगारी व छुआछूत उन्मूलन तथा सामंतशाही के विरुद्ध मेघवालों का आन्दोलन पूरे जोर और जोश में था। मारवाड़ में मेघवालों ने सब जगह अपनी पञ्चायतों के माध्यम से  इसे सख्ती से लागू करवाया था। मेघवालों में जो बाम्भ (बेगारी) करते थे और जो गंदे धंधे करते थे, उन पर मेघवालों की पंचायतों के कठोर रवैये  के कारण राजस्थान में 1952 में पूर्ण प्रतिबन्ध लग गया। इसमें पश्चिमी राजस्थान में तिन्वरी के मेघवाल उम्मेदारामजी कटारिया की सक्रिय भूमिका थी। वे मेघवालों के 84 खेड़ों के सर्वमान्य नेता थे।  सामाजिक सुधार के इन आंदोलनों में अलग अलग पट्टियों में अलग अलग नेता उभरे थे। मेघवालों में जन जागरण को लेकर कई युवा और समाज सेवी घर घर जाकर प्रचार करने लगे। इस समाज सुधार के आन्दोलन को सफल बनाने हेतु उस समय कई लोग उस समय राजनीती में भी आये और कई साधु-सन्यासी भी बने। अजमेर के गोकुलदास जी, सेतरावा के पिपाराम जी आदि इस समय उभरे प्रमुख लोग थे। धर्माजी भी इस आन्दोलन में पूरी तरह से शरीक हो गए और घर-घर एवं ढ़ाणी-ढाणी जाकर बेगारी एवं गंदे धंधों के प्रतिकार करने की चेतना का संचार करने लगे। वे इस प्रतिकार आन्दोलन में कुछ वर्षो तक सक्रिय रूप से जुटे रहे। उधर मारवाड़ में लगातार अकाल पड़ रहे थे। इन परिस्थितियों ने धर्मारामजी को दुबारा कोई जीविका ढूंढने हेतु मजबूर किया। स्वाभिमानी धर्मारामजी कोई भी ऐसा-वैसा धंधा नहीं कर सकते थे। वे कोई उपयुक्त सम्मानजनक रोजगार ढूंढ़ने लगे। उनके भाईयों ने जोधपुर में पत्थर की खदानों को लीज पर लिया और पत्थर का व्यवसाय करने लगे। 
  
उस समय मारवाड़ में अकाल के समय टिड्डियों का भयंकर प्रकोप होता था। जब भी टिड्डियों की महामारी आती, उससे निपटने के कोई साधन नहीं होते थे। अकाल में लोग टिड्डियों को भून कर खाते भी थे। अंग्रेजों ने 1939 के आस-पास इसकी रोकथाम हेतु जोधपुर में एक टिड्डी महकमा लगभग खोल रखा था। एक तरह से यह टिड्डी नियंत्रण और टिड्डी चेतावनी का दफ्तर था। राजस्थान और गुजरात इसकी निगरानी का क्षेत्र था। धर्मारामजी इस दफ्तर में असिस्टेंट ड्राईवर के रूप में भर्ती हो गए। टिड्डी उन्मूलन और उसकी रोकथाम हेतु जोधपुर से ट्रकों में सामान भरकर राजस्थान के जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर, नागोर, पाली और गुजरात के प्रभावित क्षेत्रों में सामान सप्लाई किया जाता था। धर्मरामजी की ड्यूटी अधिकांशतः जैसलमेर के रूट पर होती थी। उनकी ट्रक का ड्राइवर उसी इलाके का एक राजपूत था। इलाके में भयंकर छुआछात थी। ड्राइवर भी भेदभाव व छुआछात करता था। इसकी शिकायत की, पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। ड्राइवर के पास में ही असिस्टेंट ड्राइवर बैठा करता था। अर्थात धर्मारामजी ड्राइवर के पास ही बैठते थे। छुआछूत के कारण ड्राइवर को यह अच्छा नहीं लगता था। दूसरा, उस समय परिवहन के साधन बहुत कम थे। लोग लम्बी दूरी का सफ़र भी पैदल ही चलकर तय करते थे। रास्ते में कोई राहगीर मिल जाता तो उसे ट्रक में बिठा लेते थे। ज्यादातर समय ड्राइवर ही गाड़ी चलाता था। कभी-कभी धर्मरामजी भी गाड़ी चलाते थे। ड्राइवर को लालच आ गया। वह कभी-कभी जब कोई राहगीर मिलता तो धर्माजी को पीछे बैठने को कहता। पहले-पहल तो धर्माजी ने ऐसा कर लिया परन्तु जब उनको मालूम पड़ा कि ड्राइवर राहगीर को ट्रक की आगे की सीट पर बैठाता है और उससे पैसे लेता है तो इसका विरोध करना शुरू कर दिया। महकमे में भी शिकायत  की गई। कोई विशेष कार्यवाही नहीं हुई।

एक बार वे जोधपुर से जैसलमेर जा रहे थे। सवारी मिलने पर ड्राइवर ने धर्माजी को पीछे बैठने का कहा। आपस में कहा-सुनी हुई। तकरार झगड़े में बदल गयी। धर्माजी ने ड्राइवर को पीट दिया। ऐसा एक दो बार हुआ। महकमे में शिकायत की गयी परन्तु कोई हल नहीं निकला तो आखिर धर्मारामजी ने वह नौकरी भी छोड़ दी।
                  
आजादी के बाद मिलिट्री की नौकरी छोड़ने के बाद धर्मारामजी जोधपुर पुलिस में भी सिपाही के रूप में नौकरी करने लगे। कुछ समय जोधपुर पदस्थापन के बाद उनकी पोस्टिंग ग्रामीण इलाके के फलोदी क़स्बे के थाने में हो गयी। वहां पर भयंकर भेदभाव और छुआछुत व्याप्त थी। मेघवालों सहित सभी निम्न कही जाने वाली जातियां इस बुराई से पीड़ित थी। बेगारी और गंदे धंधे करने या न करने का निर्णय पूर्णतयः आदमी के ऊपर निर्भर करता था। मेघवालों ने इन सब का जबरदस्त निषेध कर रखा था। वे कोई ऐसा काम नहीं करते थे फिर भी उनके साथ सार्वजनिक स्थानों, होटलों और कुओं आदि पर भेदभाव पूर्ण दुर्व्यवहार और छुआछूत बरती जाती थी। वे कुँए पर जहाँ सवर्ण पानी भरते थे, वहां पानी नहीं भर सकते थे बल्कि जहाँ जानवर आदि पानी पीते थे , वहां खैली में पानी भरते थे। उन्होंने थाने से जाकर जायजा लिया और खुद ने जहाँ से सवर्ण जातियां पानी भरती थी, वहां से पानी भरना  शुरू किया। धर्माजी ने मेघवालों आदि को समझाया कि यह बराबरी के  हक़ की बात है। बेगारी और गंदे  धन्धे छोड़ना बहुत कुछ आपके वश में था पर छुआछूत और भेदभाव मिटाना बहुत कुछ आप पर नहीं निर्भर करत्ता है।  इसलिए जो लोग भेदभाव करते हैं, उनके दिमागों को ठीक करना जरूरी है। यह बीमारी भेदभाव करने वालों के दिमाग में है। कुछ दिन तो ठीक-ठाक रहा पर ब्राह्मण आदि सवर्ण जातियों  में सुगबुगाहट शुरू हो गयी और उनमें रोष पैदा हो गया।

क़स्बे में हलचल मच गयी। कई लोग पक्ष में और कई लोग विरोध में हो गए। धर्मा रामजी ने वहाँ के मेघवालों और दलित लोंगों को उत्साहित किया। एक दिन  धर्मरामजी और उनके सहयोगी बराबरी से पानी भर रहे थे। सवर्ण लोग लामबद्ध होकर आये और धर्माजी पर हमला कर दिया।

धर्माजी मल्ल-युद्ध और लाठी चलाने में पारंगत थे। पकड़ पकड़ कर कईयों को मारा। बर्तन-भांडे फूट गए। अचानक किसी ने उनके ऊपर लाठी से वार कर दिया। हाथ से वार को रोका, तब तक उनके ललाट में लग गई। खून निकलता देख लोग तितर-बितर हो गए.

धर्माजी थाने आये और केस दर्ज किया काफी समय तक केस चला। कुछ लोग पक्ष द्रोही (hostile) हो गए । फिर भी  वे वहां पर छुआछूत उन्मूलन हेतु लोगों को प्रेरित करते रहे और खुद भी लगे रहे। ऐसी हालात में कुछ महीनों के बाद नौकरी से इस्तीफा देकर घर आ गए।
          
धर्मरामजी के पिताजी श्री मदारामजी के देहावसान के बाद सभी भाई-बहिनों की शादी होने के बाद उनकी शादी पाली देवी से हुई। अक्सर उसे पालु कहते थे। शादी के समय उनके बड़े भाई ने अपने हाथ से बहु के लिए वरी का सालू और पवरी बुनी, जिसमें चांदी के तार बुने गए थे। वे उस समय सेतरावा अपने ननिहाल में थे। नई नई शादी के बाद पालि देवी औरतों के साथ गांव के कुंए पर पानी भरने गई। वह नया पीला पोमचा (ओढना) ओढ कर  नख शिख तक गहने पहन कर गयी थी। एक ही कुंए पर सभी जाति के लोग अलग अलग पानी भरते थे।

जब राजपूत औरतों ने सजी धजी नई नवेली दुल्हन को नए कपड़ों और पीले ओढ़ने में देखा तो उनका गुस्सा सातवें आसमान चढ़ गया। वे मेघवाल औरतों को भला-बुरा कहने लगी। उनके पूछने पर  बताया  कि  यह  नैनी बाई के बेटे धर्माजी की बहु है। धर्माजी के सभी भाई बलिष्ठ और साहसी थे। धर्माजी के अक्खड़ और स्वाभिमानी स्वाभाव के चर्चे गाँव में पहले ही बहुत हो चुके थे।  धर्माजी और उनके  परिवार से कोई सीधे-सीधे पंगा भी  नहीं लेना चाहता था। फिर भी सवर्ण औरतों ने चेतावनी के लहजे में कहा-- 'अगर एक मेघवाल औरत पीला ओढ़ना और गहने पहन कर आयेगी तो हम क्या पहनेगी? मेघवालों में और हमारे में फर्क ही क्या रह जायेगा?'

सभी मेघवाल औरतें सहम गयीं। कुंए से पानी भर कर मटके अपने-अपने घर रख कर धर्माजी के घर इकट्ठी हुई और कुंए पर हुई कहासुनी का वृतांत सुनाया और बोली की बिनणी  की वजह से बेरे (कुंए) पर झगडा हो गया। अब उन्हें पानी भरने  जाने में भी डर लागता है। धर्माजी ने उन औरतों का हौसला बंधाया और कहा कि कोई  किसी को गहने और ओढ़ने से नहीं रोक सकता और कोई किसी को पानी भरने से भी नहीं रोक सकता। मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ। ऐसा कहते हुए खुद घड़ा लेकर पाली देवी और कुछ औरतों को साथ लेकर कुंए पर पानी भरने गए।

धर्माजी की बहादुरी और योगदान चिरस्मरणीय है।

मेघ लोग एक बहादुर कौम रही है। महाराजा गुलाब सिंह के समय के कश्मीर और पंजाब के मेघों का भी मैंने प्रमाण सहित उद्धरण दिया था कि किस तरह से मेघों की सैनिक बहादुरी से महाराजा युद्धों में जीते थे और उन्होंने अपनी सेना में मेघों की नफ़री बढ़ायी थी। यह 1857 और प्रथम विश्वयुद्ध की कई डिस्चपैच में उल्लेखित है। मेरा निवेदन उन सभी से है जो इस समाज से जुड़े हैं कि वे उस इतिहास को उजागर करें और उन वीर पुरुषों पर फ़ख़्र करें। यह काम बहुत ही पेचीदा और कठिन है। 'जम्मू एंड कश्मीर टेरिटरी: ज्योग्राफिकल अकाउंट' नामक पुस्तक फ्रेडेरिक ड्रियू ने 1875 में लन्दन से प्रकाशित की। 'द पंजाब, नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस एंड कश्मीर' नामक पुस्तक 1916 में सर James Douie ने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित की। इन दोनों पुस्तकों में मेघ सैनिकों का जिक्र है और उनकी बहादुरी की प्रशंसा है। ये महत्वपूर्ण पुस्तकें 1857 के गदर में और प्रथम विश्वयुद्ध में मेघों की बहादुरी पर गौरवपूर्ण टिप्पणियाँ अंकित करती हैं। जो लोग मेघों के जज्बात और बहादुरी पर टीका टिपण्णी करते हैं, उन्हें इनको देखना चाहिए और अपने मतिभ्रम को दूर करना चाहिए। It is only conversation to Hinduism, which degraded Meghs, none else. Hope new generation will think about it seriously.

(Countributed by Sh. Tararam s/o Sh. Dharmaram Megh)

(रामसा कडेला मेघवंशी द्वारा विशेष नोट:
ताराराम जी धर्माराम जी के बेटे हैं। जहाँ धर्माराम जी ने देश व समाज की अस्मिता की रक्षा करके अपने जीवन को प्रेरणादायी बना दिया वहीं श्री ताराराम जी ने भी मेघों का इतिहास- "मेघवंश इतिहास और संस्कृति" लिख कर अपने समुदाय पर उपकार किया है। इनके परिवार को हमारा नमन और साधुवाद. जय मेघवीर धर्माराम जी और सभी मेघ वीरों की। जय मेघ)

मेघ इतिहास की एक बूँद

(Frederic Drew की पुस्तक के पृष्ठ 55-57 तक का अनुवाद)

अंत में वे जातियाँ आती हैं जिन्हें हम अंग्रेज़ सामान्यतः हिंदुओं की 'निम्न जातियाँ' कहते हैं लेकिन ऐसा किसी हिंदू के मुँह से नहीं सुना जाताउन्हें हिंदू के तौर पर कोई मान्यता नहीं दी जातीउन्हें हिंदुओं में नीचा स्थान भी प्राप्त नहीं हैउनके नाम हैं मेघ और डूम और मेरा विचार है कि इनमें धियार नामक लोगों को भी शामिल करना चाहिए जिनका पेशा लोहा पिघलाना है और जिन्हें आमतौर पर उनके साथ ही वर्गीकृत किया जाता है.

ये कबीले आर्यों से पहले आने वाले कबीलों के वंशज हैं जो पहाड़ों पर रहने वाले थे जो हिंदुओं और आर्यों द्वारा देश पर कब्ज़ा करने के बाद दास बना लिए गए थेआवश्यक नहीं था कि वे किसी एक व्यक्ति के ही दास होंवे समुदाय के लिए निम्न (कमीनऔर गंदगी का कार्य करते थेउनकी स्थिति आज भी वैसी हैवे शहरों और गाँवों में सफाई का कार्य करते हैं*. (* मेरा विचार है कि धियारों का रोज़गार ऐसा कम है कि वे जातीय रूप से मेघों और डूमों से जुड़े हैं.) डूमों और मेघों की संख्या जम्मू में अधिक है और वे पूरे देशजो निचली पहाड़ियों और उससे आगे की ऊँची पहाड़ियोंमें बिखरे हैंवे ईँट बनानेंचारकोल बर्निंग और झाड़ू-पोंछा जैसे रोज़गार से थोड़ी कमाई कर लेते हैंइन्हें प्राधिकारियों द्वारा किसी भी समय ऐसे कार्य के लिए बुलाया जा सकता है जिसमें कोई अन्य हाथ नहीं लगाता.

केवल उनके द्वारा किए जाने वाले ऐसे श्रम की श्रेणी के कारण ही ऐसा है कि उन्हें एकदम अस्वच्छ गिना जाता हैवे जिस चीज़ को छूते हैं वह गंदी प्रदूषित हो जाती हैकोई हिंदू सपने में भी नहीं सोच सकता कि वह उनके द्वारा लाए गए ऐसे बर्तन से पानी पीएगा जिस बर्तन को एक सोंटी के किनारे पर लटका कर ही क्यों न लाया गया होजिस गलीचे पर अन्य बैठै हों वहाँ इन्हें कभी आने नहीं दिया जाता हैयदि संयोग से उन्हें कोई कागज़ देना हो तो हिंदू उस कागज़ को ज़मीन पर गिरा देगा और वहाँ से वह उसे ख़ुद ही उठाएगावह उन्हें उनके हाथ से नहीं लेगा.

मेघों और डूमों के शारीरिक गुण भी हैं जो उन्हें अन्य जातियों से अलग करते हैंउनका रंग सामान्यतः अधिक साँवला होता है जबकि इन क्षेत्रों में उनका रंग हल्का गेहुँआ होता हैइनका रंग कभी इतना साँवला भी हो सकता है जितना दिल्ली से नीचे के भारतवासियों में हैमेरा विचार है कि आम तौर पर इनके अंग छोटे होते हैं और कद भी तनिक छोटा होता हैअन्य जातियों की अपेक्षा इनके चेहरे पर कम दाढ़ी होती है और डोगरों के मुकाबले इनका चेहरा-मोहरा काफी निम्न प्रकार का है,हालाँकि इसके अपवाद हैं जिसका कारण निस्संदेह रक्तमिश्रण हैक्योंकि दिलचस्प है कि अन्य के साधारण दैनिक जीवन से इनका अलगाव उस कभी-कभार के अंतर्संबंधों को नहीं रोकता जो अन्य जातियों को आत्मसात करता है.

डूमों के मुकाबले मेघों की स्थिति कुछ वैसी है जैसे हिंदुओं में ब्राह्मणों कीउन्हें न केवल थोड़ा ऊँचा माना जाता है बल्कि उन्हें कुछ विशेष आदर के साथ देखा जाता है.

जम्मू-कश्मीर के महाराजा (गुलाब सिंहने इन निम्न जातियों की स्थिति में सुधार के लिए कुछ कार्य किया और कुछ सौ लोगों को सिपाही के तौर पर खुदाई और खनन कार्य के लिए भर्ती कियाइन्होंने कुछ नाम कमाया हैवास्तव में युद्ध के समय ऐसा व्यवहार किया है कि उन्हें सम्मान मिला हैउच्चतर जातियों के समान ही अपने साहस का परिचय दिया है और सहनशक्ति में तो उनसे आगे निकले हैं.

इस प्रकार हम देखते हैं कि डूगर के अधिसंख्य लोग हिंदू हैं जिनमें पुराने कबीलों के भी लोग हैं. वे किस धर्म से संबंधित हैं यह नहीं कहा जा सकता........

राजाराम मेघवाल

विशाल जोधपुर किले की नींव में दलितों की बलि की दास्तान
राजस्थान में राजा रजवाड़ों के जमाने से तालाबोंकिलोंमंदिरों व यज्ञों में ज्योतिषियों की सलाहपर शूद्रों को जीवित गाड़कर या जलाकर बलि देने की परम्परा थी। अमर शहीद राजा राम मेघवाल भी उनमें से एक है। जोधपुर के राजा राव जोधा के शासन काल में जोधपुर की पहाड़ियों पर विशाल मेहरानगढ़ किले का निर्माण हुआ था। इसी गगनचुम्बी भव्य किले की नींव में ज्योतिषी गणपतदत्त की सलाह पर 15मई 1459 को दलित राजाराम मेघवाल उसकी माता केसर व पिता मोहणसी को नींव में चुना गया। राजपूत राजाओं में यह अंधविश्वास चला आ रहा था कि यदि किसी किले की नींव में कोई जीवित पुरूष की बलि दी जाय तो वह किला हमेशा राजा के अधिकार में रहेगाहमेशा विजयी होगा और राजा का खजाना हमेशा भरा रहेगा। उस काल में सामाजिक व धार्मिक व्यवस्था के अनुसार अछूत की छाया तक से घृणा की जाती थी लेकिन जब नर बलि की बात आती थी तो हमेशा अछूतों को पकड़ कर जिंदा गाड़ा जाता था। शूरवीर कहलाने वाले न क्षत्रिय आगे आते थेन विद्वान कहलाने वाले पंडित और न ही राजा का गुणगान करने वाले चाटुकार अपनी नरबलि के लिए तैयार होते थे।
राजाराम के इस महान बलिदान को जातिवादी मानसिकता के इतिहासकारों ने सिर्फ डेढ़ लाइन में समेट लिया। जहां राजाराम की बलि दी गई थी उस स्थान के ऊपर विशाल किले का खजाना व नक्कारखाने वाला भाग स्थित है। किले में रोजाना हजारों देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं लेकिन उन्हें उस लोमहर्षक घटना के बारे में कुछ भी नहीं बताया जाता है। एक दीवार पर एक छोटा-सा पत्थर जरूर चिपकाया गया है जो किसी पर्यटक को नजर ही नहीं आता है उस पत्थर पर धुंधले अक्षरों में राजाराम की शहादत की तारीख खुदी हुई है। राजाराम मेघवंशी की शहादत जैसी घटनाओं की अनगिनत कहानियां राजस्थान के हर कोने में बिखरी पड़ी हैं। महाराणा प्रताप की सेना में लड़ने वाले दलित आदिवासियों का महान योगदान रहा है। विदेशी आक्रमणकारियों की गुलामी से देश को आजाद कराने में न जाने कितने दलितों आदिवासियों ने कुर्बानी दी लेकिन इतिहास में उनका कहीं भी नामोनिशान नहीं है। दलित चिंतकोंसंतोंक्रांतिकारियों व बलिदानियों को इतिहास में पूरी तरह से हाशिए पर रखा। अब दलितों द्वारा अपना गौरवषाली इतिहास लिखा जा रहा है। इसी कड़ी में ''अमर शहीद राजाराम मेघवाल'' नामक पुस्तक उस लोमहर्षक घटना की सच्चाई को सामने लाने वाली है जिसमें राव भाटों की बहियोंशिलालेखों व कई ऐतिहासिक दस्तावेजों को शामिल किया गया है। डाएल.एलपरिहार द्वारा लिखित पुस्तक जहां एक ओर दलितों में वैचारिक जागृति पैदा करती है वहीं दूसरी ओर राजाशासकअमीर या आम व्यक्ति को यह सीख देती है कि धार्मिक कुप्रथाओंअंधविश्विसों व अमानवीय परम्पराओं के आगे नतमस्तक न हों व अपने विवेकतर्क व बुद्धि का प्रयोग कर वैज्ञानिक सोच के साथ मानव कल्याण की राह चलें। महा मानव बुद्ध की राह चलें। करुणा,दयाप्रेममैत्री व शील का पालन करें। अंधविश्वासोंपाखण्डोंकर्मकांडों व कुप्रथाओं से समाज व देश का भारी नुकसान हुआ है। जिसका सबसे अधिक खामियाजा दलित वंचित वर्ग को भुगतना पड़ा है। इतिहास की यह लघु पुस्तक आवश्यक चित्रों के कारण काफी पठनीय व रोचक बन गई है। मूल्य मात्र 60 रूपये रखा ताकि मजदूर भी खरीदकर पढ़ सके।