छत्रसाल जयंती 31 मई पर विशेष : महराजा छत्रसाल जी का अध्यात्मिक अनुशीलन
छत्रसाल अपने समय से प्रखर राज नेता, प्रचण्ड यौद्धा, प्रगटमान साहित्यकार, महान संगठक एवं भक्त थे। वे समस्त मानवता के अग्रणी निर्माता तथा संयुक्त हिन्दू चेतना के अंशुमाली थे। इतिहास में बहुअयामी विधाओं से ओतप्रोत दूसरा कोई नाम ढूढे नही मिलता। केवल पंजाब में एक सम्मानीय एवं अग्रणी नाम गुरू गोविन्द सिंह जी का है। हिन्दू-पातशाही के प्रथम सम्राट महराज शिवाजी से छत्रसाल जी की मुलाकात उस हुई जब वे वीर भूमि बुन्देलखण्ड को संगठित करने में लगे हुए थे। उसी समय उनके मन में किसी समर्थ गुरू की आंकाक्षा प्रबल हो उठी थी। छत्रसाल में बचपन से ही होनहार वीरवान के होतचिकनेपात की तरह गुणों के अंकुर प्रस्फुटित होने लगे थे यही कारण था कि बाल्य अवस्था में ही माॅं विन्ध्यवासिनी मंदिर को ध्वस्त करने आ रहे मुगल सैनिकों को अकेले ही धूल चटा दी थी। पूरे जीवन काल में छत्रसाल ने कभी पराजय का मुंह नही देखा। शेरअफगन, मिट्ठू पीरजादा, पुरदल खान, रोहिल्ला, मोहम्मद बंगस आदि छत्रसाल की प्रलयंकारी तलवार के वार नही झेल पाए और पराजित होकर भाग गए। ओरछा, दतिया, कोंच, कालपी, कलिंजर के अभियान में अनेक राजाओं को प्रेम क्रपाण से राष्ट्र की महान विराट धारा में जोडने का कार्य किया। इनता ही नही जेसलमेर की राजकुमारी की आर्त गुहार सुनकर उसकी रक्षा की तथा ओरंग की कलंकित क्रूर कालिमा को ध्वस्त कर दिया।
साहित्य के क्षेत्र में छत्रसाल की रचनाओं में धर्मनीति, राजनीति, कुलरीत का सटीक मार्गदर्शन मिलता है। वही दूसरी ओर रामकृष्ण, हनुमान पर उनकी भक्ति रचनाएं भी कम नही हैं। जब युद्ध के नगाडे बजते थे तो वीर बजरंगबली अंकित परचम पवनपुत्र की तरह लहराने लगता था। रैयत सब राजी रहे उनके राज्य का लक्ष्य था। सेना तथा सतर्क रहे, सीमा पर निरंतर चैकसी का सिद्ध सिद्धांत रहा है। इसलिए उनके राज्य में प्रत्येक युवक प्रशिक्षित एवं निष्ठावान था। सैनिक पत्नी का कथन -
घर घोडा पिया सूरमा मेढे पै को वास। नित उठ होत लराईया का चुडियान की आस।
छत्रसाल के राज्य में प्रत्येक युवती को अपने पति के सूरमा होने में गौरव का अनुभव होता था वे बडे हर्ष के साथ पति को युद्ध पर जाने के पूर्व उनका वीरोचित श्रृंगार कर अक्षत कुमकुम का तिलक लगाकर बिदा करती और कहती -
पीया तुम्हारी राह में सब कंटक हो फूल। पीठ तनक न दिखाईयो शत्रु करो निर्मूल ।।
छत्रसाल का समाज कुंठाओं का समाज नही था वे महामति श्री प्राणनाथ जी के अंगभूत थे। अंततः ब्रम्हविद् राष्ट्र, चिंतन, समाज उन्नयन, छत्रसाल जी के विराट समाज के मूल खंभ थे। उनके सामाजिक परिवेश में प्रेम, सदभाव, सहयोग, एक आत्मीयता प्रबल भाव था।
इतिहासी अनुभव, बुद्धि विवेक के बेहरो एवं गप्पी गुरूओं की दुर्गधों ने छत्रसाल की प्रचण्डता को बोना करने का असफल प्रयत्न किया है। इसमें उनका हांथ ज्यादा प्रतीत होता है जो महाबली छत्रसाल जी के हांथों से पराजित होते रहें है। छत्रसाल जी का अनुशीलन इतना प्रखर एवं प्रकाशमान है कि उनके सामने सभी विधाएं नतमस्तक हैं। उनका अध्यात्मिक चिंतन उस समय से शुरू होता है जब वे लगभग 22 वर्ष के थे। उसी समय उनके जीवन में एक अनोखी घटना घटी भादों की अमास्या की काली रात थी मूसलाधार पानी बरस रहा था। दामिनी कडक रही थी छत्रसाल जी गहरी नींद सो रहे थे। एकाएक उनके कक्ष में प्रकाश फैल गया एक शुभ्र भेशधारी निर्मल छवि सामने प्रकट हुई। जाग उठे छत्रसाल भय का लेश नही।
निर्मल छवि में हलचल हुई। मैं तुम्हे दूसरी बार मिल रहा हॅू इसके पूर्व जंगल में मिला था। तुम्हें पूरे भारत का सम्राट बनाने की रोटी खिलाना चाहता था। तुमने चैथायी ही खायी आज एक सिक्का दे रहा हॅू बारह वर्ष बाद फिर मिलूंगा, तुम्हारा ही होकर रहूंगा, छवि अदृश्य हो गई, सिक्का हांथ में रह गया। छत्रसाल को बचपन की जंगल की घटना की याद ताजा हो गई। सिक्के पर बनी छवि को चूमा और गले में धारण कर लिया। इसी दिन से छत्रसाल के मन में एक परम सत्य को खोजने की अभिलाषा उद्गद हो गई। गरजती तोपे, हिन हिनाते घोडे, चिघाडते हांथी, चमचमाती तलवारे छत्रसाल की सत्य की खोज की भावनाओं को दृढ करती रही। इसी प्रकार 12 वर्ष बीत गए और एक छतरपुर जिले के मऊसहानिया धुबेला ग्राम के पास तिदुनी द्वार पर एक महात्मा के दर्शन हुए। महात्मा बोले छत्रसाल अब तुम मेरे वश में हो कही नही जा सकते। छत्रसाल को किसी का बंधन स्वीकार नही करता और बोले की मुझे मेरे पास 12 वर्ष पूर्व से उपलब्ध सिक्के की छवि वाला पुरूष ही अपने वश में कर सकता है। महात्मा जी ने अपनी झोली से निकालकर उस छवि वाले हजारों सिक्के के दर्शन करा दिए जो भांदो की रात को छत्रसाल को दृश्यमान हुए थे। छत्रसाल का उमंग का परावार नही रहा राज महल आकर बोले आज परमात्मा मेरे द्वार पर आए हैं भाग्यशाली दर्शन कर लें। छत्रसाल ने महराज दत्तात्रय की परम्परा का निर्वहन करते हुए उन महात्मा जी से दीक्षा ग्रहण कर ली। हालाकि अनेकों क्षेत्र में उनके गुरू थे। शस्त्रों के अनुसार 6 गुरू होते हैं। छत्रसाल ने अपने अंतिम गुरू को सर्वस्व समर्पण कर दिया और बोलेः-
छत्रसाल ने बांधा, निजनाम शरण को आया। तीनों एक संगसाधुन को, जिनको धाम में वासा ।।
इसी दिन से छत्रसाल ने सत्ता का उदभव प्रारंभ हो गया। इसी उम्र में आचार्य शंकर, स्वामी विवेकानन्द, महात्मा बुद्ध, तीर्थाकर महावीर और सदगुरू श्री देवचन्द्र जी को भी परम सत्य का बौध प्राप्त हुआ था। जिस धाम का वासा छत्रसाल ने अपने पद में किया है वह बैकुंठ नही, साकेत नही, गोलोक नही, शून्य निरंजन नही है। वह गीता का परमधाम है। न तद्भाष्यते सूर्यो श्षशांको न पावकः। यद्गत्वा न निर्वतन्ते तद्धाम धाम परमं मम ।।
इसी परम धाम को प्राप्त करने का प्रयास ही हिन्दू धर्म एवं संस्कृत का परस्कृत स्वरूप है। यही परम मोक्ष है। छत्रसाल जी इस रस में ऐसे डूबे की उसी की प्रेमल तरंग बन गए। उस धराधाम की स्वयं एक विभूति सिद्ध हुए। उनमें सकुंडला शक्ति का प्रगटन हो गया। वे वेदों के श्षास्वतीशमः बन गए। जिनके लिए हरिवंश पुराण के भविष्य खण्ड अध्याय चार में यह उल्लेख है कि:-
अभाविनो भविष्यन्ति मुनियो ब्रम्ह रूपिणः। उत्पन्ना ए कलियुगे प्रधान पुरूषान्ययः ।।
छत्रसाल ही वे ब्रम्ह ऋषि हैं जिनके आगमन का उल्लेख वेदव्यास जी ने 5 हजार वर्ष पूर्व किया। गुरू साक्षात् परंब्रम्हा तस्मै श्रीगुरूवे नमः ऐसे प्रधान पुरूष के आश्रय में वे श्री कृष्ण के साथ बृज ने योग माया मण्डली रास ने एवं जागृति ज्ञान की लीला भूमि कलियुग में कोणांक के सूर्य मंदिर की 12 हजार रश्मियों की तरह प्रकाशमान हुए है। अपनी अध्यात्मिक रचनाओं में वे प्रश्न करते हैं क्यों ब्रम्हाण यहां ऊपजो, कैसे 14 लोक। कैसे माया विस्तारी। कैसे दुख, सुख शोक।
उन्होंने परमधाम वरण करने के पूर्व विनय करते हुए कहा -
श्री धाम धनी विनी करो तोसो। केवल बुद्धि कृपा कर मोसो।
करो कृपा राज कृपा निधान। वरनो सुधा भवन शुभस्थान।।
जो परमात्मा को याद नही करते उनके लिए वे कहते हैं -
धाम धनी सुमरे नही करके मन विश्वास। ते मर मर ऐसे गए ज्यो पटपर की घास।।
उन्होंने पूरण ब्रम्ह ब्रम्ह से न्यारे पद में उन्होंने अपने आराध्य की पहचान कराई। बायी आंख मेरी बेर बेर फरके मैं पति वृत सखी भाव भक्ति का प्रदर्शन करते हैं।
कराल कलयुग की करालता का विध्वंस करने के लिए वे कहते हैं -
लेनी देवचन्द्र की वाणी, तारम तम की तरना। श्री जी साहेब के राख चरन उर, अधन वचन को है हरना।। छत्रसाल कलीकालय मारो। धाम धनी सो कव मिलना।। कृष्ण की लीला पर उन्होंने कहा कि - रस सो लीजे मरद दीजे ग्वालन दही खवायो। बडे प्रीत रस रीत परस्पर, सखी साकुण्डल गओ।।
शस्त्रों की भविष्यवाणियों को पुष्ट करते हुए छत्रसाल परना (पन्ना) का परमधाम से संबंध जोडते हैं -
ते ब्रज में होय होय रासमें, इत कीनो घरवेष। ते भरत खण्ड मध्य देष, परना नगर सुभदेष।।
ते जित नित जुगल विराजत, प्राणनाथ निजनाम। ते दरसन पाए वचनसों, पावत पूरन घाम ।।
छत्रसाल अपने एक अन्य पंचम सम्बोधित पद में उनको लताडते है जो अपने को ही सबसे बडा मानकर दूसरों की गिला करते हैं -
जो जागे भागे जग धाते, तेई परम सभागे। पंचम इश्क निशंक जिनके गिल्ला करे अभागे।।
छत्रसाल जी का अध्यात्मिक ज्ञान इतना प्रखर है कि कोई शास्त्र और शस्त्र के वे महावली थे। उनकी अध्यात्मिक विधाओं पर निरंतर शोध की आवश्यकता है। छत्रसाल के समय हिन्दू धर्म एवं संस्कृति पर निरंतर घात प्रतिघात होते रहते थे। अतः धर्म रक्षा उनका प्रधान दायित्व था। महामति प्राणनाथ दिग्विजय करते हुए धर्म गुरू के रूप में पन्ना आते हैं। उन्हें उदयपुर, खडकारी, आमेर, बुंदी, जेसलमेर, रामपुर आदि के राजाओं को हिन्दू धर्म रक्षा के लिए उठ खडे होने का आव्हान किया था। उन्होंने राजाओं, मठधीशों, महंतों को कर्णावती, हरिद्वार, काशी, मथुरा, आवंतीका के मंदिर के ध्वंश का ध्यान दिलाते हुए एक साथ खडे होकर मदांध तत्कालीन सत्ता से युद्ध करने का आव्हान किया था। कहा था कि तीनों लोकों में भारत श्रेष्ठ है भारत में हिन्दू धर्म श्रेष्ठ है इसकी रक्षा, प्रतिष्ठा तुम्हारा मुख्य दायित्व है किन्तु केवल छत्रसाल ही आगे आए। कीरंतन नामक ग्रंथ में महामति श्री प्राणनाथ इस बात का उल्लेख करते हुए कहते है -
बात सुनी रे बुन्देरे छत्रसाल ने आगे आए खडा लेकर तलवार।
सेवा लई सारी सिर खैच के साइंये किया सेनापति सरदार।।
छत्रसाल की इस देश धर्म की सेवा के सफर में महामति ने समृद्धि हीरा, वीरता, अजयता, महाराजाधिराज का वरदान प्रदान किया। आज भी दशहरे के दिन उस सेवा और शौय का प्रतीत पान का बीरा और तलवार का प्रदान स्वरूप खेजडा मंदिर में प्रतिवर्ष आयोजित होता है। छत्रसाल विशाल सेना के साथ महामति प्राणनाथ जी के नेतृत्व में बुन्देलखण्ड की एकता का सबल राज्य स्थापित किया जो धर्म राज्य निरूपित हुआ।
छत्रसाल ने सेवा और साधना के 36 विभागों को सुचारू रूप से संचालित करने के व्यापक प्रबंधन किए। उन विभागों में जीवन के सभी वस्तुओं का निर्माण स्वश्रम से किया जाता रहा है। स्वःश्रम कार्य से निर्मित पन्ना नगर का श्री प्राणनाथ मंदिर आज भी अपनी भव्यता और दिव्यता के लिए विश्वविख्यात है। छत्रसाल ने धर्म प्रचार का कार्य के दौरान बरगढ, दतिया, काशी के अनेक विद्वानों को तारतम्य की दीक्षा दी। उन्होंने सम्राट अशोक की तरह परिष्कृत हिन्दू प्रणामी धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए नेपाल, गुजरात, पंजाब, बिहार, महाराष्ट्र आदि में धर्म गुरूओं को भेजा। छत्रसाल की सुनियोजित इस योजना में सम्पूर्ण भारत, नेपाल, भूटान, मारीशस, अमेरिका, कनाडा, इग्लेण्ड, साउथ अफ्रीका के प्रणामी मंदिरों प्रतिष्ठानों मं एक करोड लोग कम से कम दो बार महामति प्राणनाथा के साथ महाराजा छात्रसाल की जय बोलते है ।
छत्रसाल एक राजा ही नहीं योद्धा, साहित्यकार, भक्त प्रशासक व स्वयं परमात्मा के अंगभूत है । वे अक्षरब्रम्ह परमात्मा के उद्गाता एवं अक्षरातपरत पर पराधाम के दिव्य कहा है। आईए छत्रसाल की जय बोलते हुए हिन्दुस्तान की एकता के लिए हिन्दुत्व की गौरवयमी एकता को दृढता ऐ दृझ करे । और अपने आत्म कल्याण के लिए छत्रसाल की यह बात धयन में रखे ।
बेटा काम न आवही धन नही आवे काम।
छत्रसाल गोसे गहो धाम धनी को नाम ।।















































































