Friday, September 12, 2014

प्राचीन ज्ञान से विमुख होना समाज के लिए कष्टकर-भर्तृहरि नीति शतक

 अंग्रेजों ने भारत में जिस शिक्षा पद्धति को स्थापित किया उसका प्रचलन निर्बाध गति से हमारे देश में अब भी जारी है।  इस पद्धति को अपनाये रखने का कारण यह है कि इसके आधार पर विद्याध्यन करने के पश्चात् जो उपाधियां प्राप्त होती हैं उसी से निजी तथा सरकारी क्षेत्रों में नौकरियां करने का अवसर आधुनिक गुलामों को मिलता है।  यह अलग बात है कि हमारे शैक्षणिक क्षेत्र के विद्वान आज भी देश में व्याप्त बेरोजगारी की समस्या को देखते हुए शिक्षा को अधिक रोजगारोन्मुखी बनाने की मांग करते हैं।
      पहले तकनीकी और विज्ञान के क्षेत्र में शिक्षा करने वालों को भी नौकरी ढूंढने के अभियान में लगना पड़ता था पर उदारीकरण ने ऐसी स्थिति बना दी है कि तकनीकी महाविद्यालायों मेें अध्ययन करने के दौरान ही नौकरी देने वाले शिविर लगाकर छात्रों का भावी गुलाम कें रूप में चयन किया जाने लगा है। आजकल  किसी भी शैक्षणिक संस्थान की प्रतिष्ठा इस बात पर निर्भर करती है कि उसने  अपने यहां अध्ययनरत कितने अधिक छात्रों को गुलामी का अवसर का लाभ उठाने की सुविधा प्रदान की।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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पुरा विद्वत्तासीदुषशमवतां क्लेशहेतयेगता कालेनासौ विषयसुखसिद्धयै विषयिणाम्।
इदानीं सम्प्रेक्ष्य क्षितितलभुजः शास्त्रविमुखनहो कष्ट साऽपि प्रतिदिनमधोऽधः प्रविशत।।
     हिन्दी भावार्थ-पहले लोग मानसिक रूप से दृढ़ होने के लिये विद्याध्ययन करते थे। कालांतर में विषयों में आसक्त होने पर सुख प्राप्त करने के लिये उसका अनुकरण किया। अब तो लोग शास्त्रों से विमुख हो गये हैं। वह उनका नाम भी नहीं सुनना चाहते थे। राजाओं ने भी शास्त्रों में मुंह फेर लिया है। इस तरह यह प्रथ्वी रसातल में जा रही है वह चिंत्ता का विषय है।
      आमतौर से हमारे यहां के धार्मिक विद्वान शास्त्रों से विमुख होने की शिकायत करते हैं पर यह कोई नयी बात नहीं है। हमारे समाज में भले ही प्राचीन ग्रंथो को मान्यता प्राप्त है पर उसमें स्वाध्याय करने का मन सहजता से नहीं लगता। यही कारण है कि जो उनका अध्ययन करते हैं वह उसका व्यवसायिक उपयोग करते समाज में गुरु पद पर प्रतिष्ठित हों जाते हैं।  लोग फुर्सत के समय उनके प्रवचन सुनकर मनोरंजन के रूप में आनंद उठाते हैं।
        दरअसल प्राचीन ग्रंथों का अध्यात्मिक अध्ययन प्रारंभ में विषतुल्य प्रतीत होता है पर कालांतर में उसके आधार पर इस मायावी संसार के नाटकीय दृश्य देखकर उनका विश्लेषण करने की सुविधा मिलती है जो अत्यंत मनोरंजक होती है।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन में भाव के त्याग का अत्यंत महत्व प्रतिपादित करने के साथ ही यह भी बताया गया है कि भोग का सुख क्षणिक होने के साथ कालांतर में उसका  प्रभाव विकार के रूप में प्रकट होता है।  अज्ञान के अभाव में लोग भोग के स्वरूप को ही जीवन का आनंद समझते हैं।  इतना ही नहीं लोगों में सबसे बड़ा भोगी बनने की होड़ लगी है।  यही कारण है कि देश में दैहिक, मानसिक तथा वैचारिक रोगियों की संख्या बढ़ी है।
      आज के समय हम प्राचीन शिक्षा पद्धति की बात तो कर ही नहीं सकते।  कारण यह है कि भारत में मानव श्रम अधिक मात्रा में है और उसका निर्यात भी होता है।  हम जिन लोगों को विदेशों में नोक्री करते देखते हैं वह मानव श्रम के निर्यात का ही रूप है।  अंग्रेजी भाषा का इसलिये अपनाये रखा गया है ताकि श्रम निर्यात करने की सुविधा बनी रहे।  ऐसे में शिक्षा के पाठयक्रम में भारतीय ग्रंथों को समाहित करने का विचार प्रकट करने पर सामान्य व्यक्ति भी हंसेगा तब अंग्रेजी शिक्षा से उच्च पद पर लोगों से समर्थन की आशा करना भी व्यर्थ है।
      यह अलग बात है कि समाज में नैतिक, भावनात्मक तथा वैचारिक पतन का रोना सभी होते हैं। हमारे प्राचीन ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों ने अपने परिश्रम से जीवन के सत्य की खोज कर प्रस्तुत कर दी है।  नया कोई सत्य दृष्टिागोचर नहीं होता।  ऐसे में जिन लोगों को ज्ञान के आधार पर जीवन का आंनद उठाना है उन्हें प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करते रहना चाहिये।

Monday, September 8, 2014

राजस्थानी भाषा री बोल्यां रा ठिकाणां

 राजस्थानी भाषा में 73 बोल्यां है । ऐ बोल्यां राजस्थान रै अलावा देश अर विदेश में भी बोलीजै । आं  73  बोल्यां  में सूं मोटा-मोट 11 बोल्यां जादा अर बडै छेतर में बोलीजै । आओ आपां राजस्थानी भाषा री आं बोल्यां अर उण रा छेतरां नै भी जाणां -गोखां कै किसी बोली कठै - कठै बोलीजै :-

राजस्थानी भाषा री... मोटी-मोटी बोल्यां
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1-मारवाडी
2-शेखावाटी
3-बागडी
4-वागडी
5-मेवाती
6-हाडोती
7-ढुंढाडी
8-मेवाडी
9-भीली
10-पहाडी़
11-खानाबदोसी

आं बोल्यां री भोत सारी उप  बोल्यां भी है । जकी कोस - कोस माथै खिंड्योडी़ है ।

आओ जाणां आं बोल्यां रा ठोड़-ठिकाणां
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1-मारवाडी-
आ बोली वैदिक छेतर "मरुधन्व " जको महाभारत बगत में "मरुकान्तर" राज बोलीजती । ओ सारो छेतर समुन्दर रै नीचळी रेणका अर डूंगरां री बेकळा सूं ढकीज्योडो़ हो यानी रेत रो समन्दर ! यानी मरुथळ/मरुधस्थल/मरुधरा । राजस्थान रो आथूणलो पास्सो [ पश्चिमी ]  "मरुधन्व " अर "मरुकान्तर" हो । ईं छेतर री भाषा  यानी मरुस्थल री भाषा । रिगवेद में भी ओ मरु  छेतर ई बतायोडो़ है सो ईं छेत्र री भाषा मरुभाषा\मरुवाणी अर आज री मारवाडी़ है ।
मारवाडी़ राजस्थान री ई नीं दुनियां री जूनी बोल्यां में सूं एक है । इण में भाषा रा सगळा गुण मौजूद है । साहित्य,व्याकरण,सबद कोश,छन्द सास्तर,रस सास्तर आद सो क्यूं इण भाषा रै आंटै में है । राजस्थानी भाषा रो घणखरो साहित्य इणीज भाषा में रचीज्योडो़ थको है । आज री गुजराती इणीज भाषा सूं उपज्योडी़ एक रूप है । मारवाडी़ आज भी पाकिस्तान रै एक बडै हिस्सै [ सिंध सूं लेय’र पंजाब री सींवां ताईं ]  में बोलीजै । पाकिस्तान रा
गजराबाद,अमरकोट,कराची,गूजरांवाला,खेमकरण,सिंध,हैदराबाद रै इलाकां में  आज भी ब्यांव-रीत-नीत-पैरवास मारवाडी़ चालै । इण समूळै इलाकै में आज भी मारवाडी़ लोक गीत गूंजता रैवै । मारवाडी़ ओडियो-वीडियो कैसटां/सीड्यां खूब बणै अर बिकै । चावा लोक गीतां में मूमल,मरवण,जलालो,मटयारो, सावणीं तीज,चनेसर, करहो, पटयारी, पणिहारी,आमरलो,रायधण,घोंसलो,राणों काच्छबो, आद है ।
                  पाकिस्तान में "अंजुमन मारवाडी सोअरा " नांव री संस्था है जकी लगोलग राजस्थानी कवि सम्मेलन करावै । बाग अली सोक जैसलमेरी , यार मोहम्मद चौहान’ताहिर’ ,हम्मीद जैसलमेरी ,मोहम्मद रमजान ’नसीर ’ ,मास्टर अब्दुल" हम्मीद" जैसलमेरी, औरंगजेब जिया,असरफ़ अली "अफ़सोस" , कुरबान अली चौहान, महमूद दार "कश्मीरी", युनुस नीर,युनुस राही,लियाकत अली "दीपक" , अब्दुल मज़ीद"चिणगारी",बशीर अहमद "बशीर", मोहम्मद हनीफ़"काळू" ,सरदार अली चौहान फ़ारुक आज़म "फ़रीद", रज़ब अली"गम" अर फ़िरोज़ अली "फ़िरोज़" अठै रा नामी राजस्थानी साहित्यकार है ।
                   आज रै राजस्थान में जोधपुर ,बीकानेर ,जैसलमेर , बाड़मेर ] पाली,सिरोही ,नागौर, हनुमानगढ़, श्री गंगानगर जिलां में  सै्कडै़ दीठ सैंकडै़ अर चुरू,झुंझुनू,सीकर अर अजमेर ज़िलां  में रिपियै में बारै आन्ना  मारवाडी बोली ई बोलीजै । राजस्थान रै श्री गंगानगर,हनुमानगढ ज़िला अर पंजाब रा अबोहर फ़ाजिल्का हरियाणां रै सिरसा , हिसार छेतर में जकी बागडी़ बोली है बा मारवाडी़ सूं ई उपजी थकी है । इं बोली में का की को री जाग्यां करता रै सागै ई णीं,णां णों लगाई जै--म्हाणों, थांणों.उणां

2-शेखावाटी-
शेखावत राजवंश रा संस्थपक राव शेखा जी रो समूळो राज छेतर शेखावाटी बजै ।इण छेतर में बोलीजण आळी बोली शेखावाटी बजै । शेखावाटी बोली रो जलम मारवाडी़ अर ढुंढाडी़ रै मेळ सूं होयो थको है । आ घणीं जूनी भाषा नी है । इण बोली रो छेतर सीकर , चुरू [कीं चेतर ] , झुन्झुनू ज़िलां में है । इण बोली में का,की,को नै रा ,री,रो अर है नै सै , से नै सैं बोलै

3-बागडी=
बागडी़ रो मतलब बागड़ में रैवण आळा लोग  । बागडीं ई आं री बोली । बागड़ रो मतलब जंगळ ! राजस्थान रा हनुमानगढ़ अर श्री गंगा नगर जिलां सूं लेय’र पंजाब रा अबोहर-फ़ाजिल्का - भटिण्डा छेतर अनै हरियाणां रा  हिसार अर सिरसा छेतर में कदै ई "लक्खी वन" नांव रो लूंठो जंगळ हो । जंगळ पार उतराधै रा लोग अठै  रा लोगां नै बागडी़ [जंगळी ]अर आं री बोली नै बागडी़ [जंगळी] कैंवंता । धीरै धीरै ओ नांव पकग्यो ! आज भी अठै रै सिक्खां नै उतराधै रा लोग बागडी़ सिख अर बाणियां नै जंगळी बाणियां कैवै । रिगवेद री बगत अर महाभारत री बगत भी ओ छेतर नामी हो । उण बगत हरियाणै आळो पास्सो "कुरू-जांगळ" अर ईनलो पास्सो " मरु-जांगळ" बजतो । इणीज छेतर में जोधपुर रा राजकुंवर बीका जी आप रो राज थरपियो । बीकानेर राज रो परतीक वाक्य भी " जय जंगळधर पातसा " है " इण छेतर रो चावो लोक गीत है " जंगळ मंगळ देस म्हानै प्यारो लागै सा ।" ईन बोली में का , की को नै गा , गी , गो बोलै ।

4-वागडी=
राजस्थान अर गुजरात री सींवां जोड़ता राजस्थान रा बांसवाडा़ अर डूंगरपुर जिला वागडी़ रा जूना ठिकाणां है । वागडी़ बोली मारवाडी़ अर गुजराती री भेलप सूं उपजी थकी है । ईं बोली में का,की ,को नै ना नी नूं  अर ह अनै च नै स बोलै ।  इण बोली माथै गुजराती रो खासा असर है !


5-मेवाती=
मेवाती राजस्थानी री खास बोली है ! आ मेव अर गुर्जर लोगां री बोली है जका कदै ई कश्मीर,हिमाचल,पंजाब,राजस्थान,गुजरात,सिंध समेत समूळै उत्तरी भारत माथै राज करता । आ बोली कोई बगत महाराष्ट्र.गोआ.पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान अर रूस तांईं रा पसुपालक वर्ग री बोली ही अर बै गुर्जर ई हा ! राजपूत अर जाट जेडा़ छत्री ईणीं मे सूं फ़ंट्या बताईजै ।
आ बोली आगूणैं [ पूर्वी] राजस्थान रै अलवर जिलै अर राजस्थान रै लागती हरियाणां अनै दिल्ली री सींवां आळा छेतरां में बोलीजै । गूजरी इण रो एक भेद है। आ मेव लोगां री मूळ बोली है । दुनियांमें जठै भी मेव रैवै चाहे पछै बै मुसळमान [ धरम बदळ ] हिन्दू या  और कोई धरम रा होवै बै मेवाती बोली ई बोलै । जका गुजरमध्यकाल में मुसळमान बण्या बै आज मेव मुसळमान बजै ।
डा.सुनीति कुमार चटर्जी कथै "कसमीर री गूजरी बोली अर तमिलनाडू री सौराश्ट्री बोली राजस्थानी री ई एक बोली है ।" डा.देव कोठारी आगै बधता कथै-"हिमालय री तराई, कसमीर अर पंजाब में बसियोडा़ गुर्जर -अहीरां री बोली गूजरी-राजस्थानी री ई बोली है । डा.शक्ति कुमार शर्मा कथै-" रिगवेद में बखाणीजै जको ,गुजरकरण नांव रो  राजा हो बो इणीं छेतर रो राजा हो । बण इण छेतर रै पुष्कर में लूंठो जिग करवायो हो ।" डा. जोर्ज ग्रियर्सन कथै-" राजपूत जात्यांगुर्जरां सूं उपजी । गुर्जरां रो खिंडाव आबू परबत सूं होयो हो । अठै ई बां नै छेतर अर राज बंट्या । गुर्जर जोधा ई राज्य पुत्तर- राज पुत्तर- राजपूत कथीज्या ।" इण छेतर रा बिरामण गुर्जर बिरामण [ गुर्जर गोड़] गुर्जर प्रतिहार, गुर्जर पोरवाळ अर अर इंदा आद नामी है । गुर्जरां री उपसाख "सपादलख"बजै  । योगराज थानी कथै-" हरियाणवी बोली , पंजाबी,हिमाचली, अर कसमीरी री बजाय राजस्थानी रै सांकडै़ बेस्सी है ।"

6-हाडोती=
हाडा़ राजवंश रै राजावां रो राज छेतर हाडौ़ती छेतर अर इण छेतर री बोली हाडौती कथीजै । हाडौ़ती बोली राजस्थानी री दूसरी लूंठी अनै जूनी बोली है जिण में भाषा होवण रा सगळा लखण है । हाडौ़ती में अपार लोक साहित्य,लोक गीत,कोथ-कैबा,रासा,पड़-पवाडा़ आद मौजूद है ।
इण भाषा में अणथाग जूनों अर नूओं साहित्य, व्याकरण,सबद कोश,छन्द सास्तर,रस सास्तर आद सो क्यूं  आंटै में है । कोटा,बूंदी,बारां,झाल्लावाड़ जिला समूळा अर कीं हिस्सो सवाई माधोपुर रो हाडौ़ती रा ठिकाणां है ।

7-ढुंढाडी़ =
ढुंढाड़ छेतर राजस्थान रो ई नी देस रो नामी छेतर है । ओ बो छेतर है जठै पांदव "अग्यातवास " पूरो करयो । अठै रो लोहागर जी [ लोहार्गल ] तीरथ  बा जाग्यां है जठै पांडवां रो सराप पूरो होवण री परख होवै । पांडवां नै वरदान हो कै जकै दिन थारा हथियार पाणीं में गळ जासी उण दिन आपरो 14 साल रो बनवास पूरो हो जासी । पांदवां रा हथियार इणीं लोहागर जी रै तळाब में गळ्या । भीम रो ब्यांव भी इणीं इलाकै में होयो । बर्बरीक री नस किरसन जी अठै ई काटी । इण इलाकै में महाभारत काळ रा कई ऐनाण है । ओ छेतर आडावळ परबत माळा रो छेहलो छेतर है । अठै सूं डूंगर निवडै़ अर मरुथळ सरू होवै । इण इलाकै में मोटा-मोटा माटी रा डूंगर है जकां नै ढूंढ  कैवै ! नांव पड़्यो ढूंढ / ढुंढाड़ । अठै रा लोग ढुंढाडी़ अर आं री बोली भी ढूंढाडी़ । छेतर ई जद इत्तो जूनो है तो बोली तो आपै ई जूनी होयगी । ढुंढाडी़ में भी अपारार जूनों साहित्य रचीज्यो । ढुंढा़डी़ बोली रा ठिकाणां है-जयपुर,दौसा,टोंक  समूळा अनै सवाई माधोपुर अर सीकर  रा कीं इलाका । अठै है,हा, ही री जाग्यां छै,छा.छी बोलीजै ।


8-मेवाडी=
आ बोली मेवाड़ धरा माथै बोलीजै ! मेवाडी़ राजस्थानी री ठरकै आळी बोली है । ईण बोली में भी अकूत राजस्थानी साहित्य रचीज्यो थको है । मेवाड़ धरा राजस्थानी संस्कृति-कळा रो  गढ़ है ! आखै  भारत नै वीरता-बळिदान-त्याग-स्वराज आज़ादी रो पाठ सिखावण आळी इण धरा री परापर राजास्थान अर राजस्थानी भाषा री धरोहर है । उदयपुर , चित्तोड़गढ़, प्रतापगढ़, राजनगर, भीलवाडा़ , ज़िला समूळ अर कीं हिस्सो अजमेर रो मेवाडी़ बोली रा ठावा ठिकाणां है ।

9-भीली=
भीली बोली राजस्थान रै दिखणाद [ दक्षिण ] में बोलीजै । सोभा लाल पाठक रै मुजब-" मेवाड़ अर वागड़ रो हिस्सो, हाडौ़ती रो कीं हिस्सो , आथूणों मध्यप्रदेस [पश्चिमी]  रा झबुआ,रतलाम, धार,खरगोन , अर गुजरात रा  पंचमहल ,भरूच,गोधरा,बडौ़दा आद जिलां भीली बोली रा छेतर है । जोधसिंह कथै- " भीली बोली राजस्थानी अर गुजराती सूं मिलै । डा.ग्रियर्सन कथै भीली राजस्थानी अर गुजराती री कडी़ है । प्रो.सुनीति कुमार चटर्जी कथै-" व्याकरण री दीठ सूं भीली नै राजस्थानी भाषा में राखणी चाईजै ।" राजस्थानी भाषा रो असर मराठी अर कोंकणी माथै भी मिलै । राजस्थान रो " गवरी निरत " राजस्थान ,गुजरात , मध्य प्रदेस अर महाराष्ट्र में इकसार चावो है !

10-पहाडी़=
पहाडी़ बोली हिमालय री समूळी तराई में बोलीजै । उत्तराखंड,हिमाचल, कसमीर अर नेपाल ईं रा ठिकाणां है । डा.देव कोठारी  अर डा. जीवण खरकवाल कथै-"
नेपाल, गढ़वाल, कुमाऊ,अल्मोडा,सिमला, पिथोरागढ़ ,पोडी़ ,चमोली ,देहरादून  छेतर में  नाथ जाति रा  लोग जकी पहाडी़ बोली बोलै उण में राजस्थानी रो पुट है । गोरखा अर गुर्जर एक ई है ।परबतिया , गोरखा्ली , खस अर राजस्थानी भाषा री भेळप सूं ई राजस्थानी बणीं ।"

11-खानाबदोसी=
आ बोली राजस्थान रा खानाबदोस/यायावर लोग जका बिणज-बोपार सारू मुसाफ़री करता अर पछै बाअंडै ई बसग्या -बां री बोली है । खानाबदोस लोगां री "लाभाणीं " बोली बरार,मुम्बई, मध्यप्रांत, पंजाब , उत्तरप्रदेस आद  में बोलीजै । "रोमा" बोली  रोमां लोगां [ जिप्सी ] री बोली है जकी नै राजस्थान सूं गयोडा़ बिणजारा बोलै । आ बोली योरोप री न्यारी-न्यारी बसत्यां में बोलीजै । ईण बोली मे 100  में सूं 40 सबद राजस्थानी रा अर   60 ग्रीस ,फ़्रैंच , अर दूजी य्रोपीय भाषावां रा है  पण व्याकरण राजस्थानी ई है । डा. ब्रज मोहन जावलिया " रोमां बोली " रो सबद कोश त्यार करियो है जको राजस्थानी रो रूप है । ऐ रोमां लोग रूस ,चैकोस्लवाकिया ,चेचैन्यां , स्केण्डिनेविया ,जरमनी , फ़्रांस ,स्पेन ,अमेरिका  आद देसां में  बसै अर राजस्थानी बोलै । ताजुबेकिस्तान री भाषा तो पोरी तरिया राजस्थानी ई है । बठै री भाषा री एक बानगी देखो देखाण-" एक राजो थो । बीं कै दो राणियां थी ।

=====राजस्थानी री कीं और बोल्यां =======

"पिंडारी ",  [मुम्बई, अर मध्यभारत ] , " भाम्टी " [मध्यभारत ] ,"बेलदारी" [ राजस्थान -महाराष्ट्र ] ,ओड़की [राजस्थान ,पंजाब ,म्द्रास, गुजरात ,सिंध ,उत्तराखंद ,] ," लाडी " [ महाराष्ट्र, बरार ] , " गंवारिया" या " कंकेरी " [ उत्तर प्रदेस रो झांसी ,, अजमेर ] , "सांसी " [ राजस्थान , पंजाब ,, पाकिस्तान ] "गारोडी़ " [ बेलगांव ] , "म्यानवाळा "[ बेलगांव ]  . " कंजरी" ," नटी," , " डोम"  , " थळी " [सुजानगढ-रतनगढ {चूरू }], " बीकानेरी "[ बीकानेर ], "मगरेची" [ कोलायत ], " भंडाणीं"  [ लूणकरण्सर-काळू-महाजन ]" खेराडी़ ", " गोडवाडी़" , "देवडा़वाडी़ " , "अहीरवाटी", " तोरावाटी" , "जयपुरी " , " कठेडी़" , "राजावाटी" , "अजमेरी" ," किशनगढी़"[ अजमेर] ," शाहपुरी" [ भीलवाडा़],  "रांगडी़" , " सोडवाडी़" , "निमाडी़" , "पस्तो" [पाकिस्तान-अफ़गानिस्तान], " , "रोमां’ , "बिणजारी" ,"लभाणीं" , "टमटा" , "गूजरी ," सौराष्ट्री" अर हरियाणवी आद  भी राजस्थानी री बोल्यां है । 

टिचकारयां चालै, बुचकारयां थमै

टिचकारयां चालै, बुचकारयां थमै
मोहम्मद अमीन छींपा रो जलम 1 अगस्त, 1963 नै भादरा तहसील रै गांव मळसीसर मांय हुयो। ग्राम्य लोक समाज रा सांतरा चितेरा। आपरी रचनावां पत्र-पत्रिकावां में छपती रैवै। आज आपरो ओ लेख-
बांचो
-मोहम्मद अमीन छींपा

राजस्थानी भासा में मिठास घणो। मरूधर रै कण-कण में मिठास। अठै अंतस री आवाज मिनख भी समझै अर जीव-जिनावर भी। मिनख रै अंतस रो भाव जीव-जिनावर अर जीव-जिनावर री वेळा-कुवेळा निकळी बोली नै मिनख समझै। सुण'र अंदाजो भरै। समै अर काळ सूं जो
ड़ै। सूण-कसूण सूं जोड़ै
कित्ती निराळी बात कै टिचकारयां पसु चालै तो बुचकारयां थमै। पीठ पर थापी मारयां भैंस पावसै तो अड्यो-अड्यो बोल्यां घणो हेज करै। धिराणी रै कनै आवै। चिमठी सूं दुहारकी बणै। छी-छी बोल्यां पाणी पीवै। हीयो-हीयो बोल्यां गाय हेज करै। जै-जै बोल्यां ऊंट बैठै तो तुवक-तुवक करयां पाणी री चरड़क भरै। और्रक-और्रक बोल्यां टोडारू आवै तो कर्रक-कर्रक करयां झोटो। पूस-पूस बोल्यां मिनकी आवै तो छिर-छिर बोल्यां पाछी जावै। चै-चै बोल्यां छाळी आवै तो ठिरर-ठिरर बोल्यां भेड जावै। डरिक-डरिक बोल्यां खागड़ दड़ूकै तो हीयो-हीयो बोल्यां गाय।
जिनावरां री बोली रा ई लूंठा अर निराळा नांव। गाय रांभै तो भैंस रिड़कै। छाळी मिमियावै तो ऊंट अर डाग अरड़ावै। कुत्तो भूंसै। कूकरियां यानी कूरियां सारू कैबा चालै- 'अठारियो अटकै, उनीसीयो पटकै अर बीसीयै रै मूँडै मांय चुसियो लटकै ।' पंजां में अठारा, अन्नीस अर बीस नूरियां रै आधार पर न्यारा-न्यारा नांव। आधी रात नै मोर किरळायोड़ा अर कुत्ता कूके़डा माड़ा मानीजै। कैवै- आज तो मोरिया कोजा कूकै। भाइयो, कै तो धरणी धूजसी कै कोई बूढो-ठेरो जा'सी। दूहो है-
रातां बोलै कागला, दिन में बोलै स्याळ। कै नगरी रो राजा मरै, कै पड़ैलो काळ।।

स्याळ रातां बोलै तो जमानो रसै। कागलो दिन में बोलै तो घणो सुहावै। मंडेरी माथै बोलै तो घरां बटाऊ आवण रो सुगन मानै। बै'ण आपरै बीरै नै बेगो आवण रो सनेसो कागलै नै देवै। परदेसी पीव नै बुलावण सारू सोनै री चांच मढावण रा कोल करीजै। जे ऐ कुबेळा बोलै तो आंरी बोली रा अरथ साव उल्टा हो ज्यावै।
ल्यो बांचो एक हांसणियो-
एकर एक सै'र रो पढे़ड छोरो गाँव में आपरै काकै कनै मिलण गयो। आगलै दिन छोरो आपरै काकै री डाग नै खेळ पर पाणी प्याण गयो। आगै एक आदमी आपरी डाग प्यावै हो। तुवक-तुवक रै साथै डाग पाणी रा लांबा चरड़का मारै ही। बो छोरो बोल्यो- अरे भाई साहब, आपने जो अभी अपने वाली ऊंटनी के लिए बोला है, वो मेरे वाली के लिए भी बोलना। ये पानी नहीं पी रही है। गांव रो मिनख ईं बात पर हांस्यो अर बोल्यो- तूं पढ्यो पढ्यो ई है लाडी, गुण्यो कोनी।
आज रो ओखाणो

लगाई कुत्ती सिकार नीं मारै।

लगाई कुत्तिया शिकार नहीं मारती।

दबाव देकर किसी से कार्य करवाना संभव नहीं। मनोयोग और रूचि से किया काम ही फलता-फूलता है।

Major Dialects of Hindi

Like other major languages of the world, Hindi also has several dialects. These dialects are spread over the entire Hindi speaking region usually termed as Hindi Belt and constitute around 295 million native speakers of Hindi (Dialects and Standard Hindi). The region where  Hindi is spoken are Indian states of Bihar, Chhattisgarh, Delhi, Haryana, Himachal Pradesh, Jharkhand, Madhya Pradesh, Rajasthan, Uttar Pradesh and Uttarakhand.
The large number of speakers makes, Hindi as the 4th position language in the world as per the largest number of its speakers. Hindi is also spoken in almost entire India as the second language of many Indians and it has influenced other languages of India. Because of such a large number of its native speakers, it is suggested that Hindi must be one of the official language of United Nations. In this regard, Indian government is pro-actively working on this matter.
There are many dialect of Hindi which may include major dialects termed as Proper Hindi. In this post, I would like keep the post simple to understand and show you only the  major dialects of Hindi. These major dialects of Hindi are:
Braj Bhasha (ब्रज भाषा)
Braj Bhasha, consists of two terms Braj - a region and Bhasha - Language,  is a major dialect of Hindi which is spoken in the northwestern part of state of Uttar Pradesh, the eastern part of state of Rajasthan and the southern part of state of Haryana . The speakers of this dialect belong to the region which is historically known as Braj (ब्रज also known as Vraj) in the Hindu epics of Mahabharata and is considered as the birth place of Hindu God, Krishna. This dialect is also known asDehaati Zabaan (देहाती ज़बान, ‘country tongue’) and was a prominent dialect before 19th century. This dialect is very important in its contribution to the literature as most of the Hindi literature from the in the medieval period including Bhakti Kal (Devotion era c. 1375 to 1700).  The famous poets of Hindi like Surdas, Bhai Gurdas and Amir Khusro wrote in Braj Bhasha.
Khari boli (खड़ी बोली)
Khari boli, consists of two terms Khari – Standing, Boli – Dialect, Language, is the important dialect of Hindi which is spoken in Delhi, its surrounding area in the state of Uttar Pradesh as well as the western region of  state of Uttarakhand. At present, Khariboli dialect has taken its place as the predominant standard dialect of Hindi. As per the schols, it is believed to be developed between the period of 900-1200 CE. Hindi literature which are composed after 18th century are in Khari Boli.
Haryanvi (हरियाणवी )
Haryanvi is another major dialect of Hindi which is similar to the Standard Hindi. It is widely spoken in the northern state of Haryana as well as Delhi. As it seem, this dialect got its name from the state and this term is also used for the people from the Haryana. This dialect finds some similarity with another dialect of Hindi such as Braj Bhasha.
Bundeli (बुन्देली )
Bundeli is a dialect of Hindi which is spoken in the region of Bundelkhand region in the state of Madhya Pradesh as well as in southern parts of Uttar Pradesh. Bundelkhandi and Braj Bhasha find similarity with Braj Bhasha.
Awadhi (अवधी)
Awadhi,  which is also known with alternate names of Abadhi, Abadi, Abohi, Ambodhi, Avadhi and Baiswari, is another dialect of Hindi which is spoken in the historical region of Awadh (Oudh) of Uttar Pradesh and so comes its came to be Awadhi. It is also spoken in Uttarvarsh and also finds its speakers in the states of Bihar, Madhya Pradesh, Delhi as well as neighboring country, Nepal.  The Hindi spoken in Fiji is also influenced by Awadhi.
Bagheli (बघेली or बाघेली)
Bagheli is a dialect of Hindi which is spoken in the Baghelkhand region of central India. The Bagheli speakers are found mainly in six districts of Madhya Pradesh especially Rewa, Satna, Sidhi, Shahdol, Umaria and Anuppur.
Kannauji (क़न्नौजी)
Kannauji is a dialect of Hindi which is spoken in the parts of tstate of Kannauj(क़न्नौज) in the state of Uttar Pradesh as well as some other parts of the same state. Some consider Kannauji a seperate language of its own which is closely related to Hindi. Kannauji also has its two dialects like Tirhari and Transitional Kanauji, which is between standard Kanauji and Awadhi. In total, it boosts about 6 million native speakers.
Chhattisgarhi (छत्तीसगढ़ी)
Chhattisgarhi is a dialect of Hindi which is also the official language in the Indian state of Chhattisgarh and also spoken in adjacent areas of Madhya Pradesh, Orissa, and Jharkhand. The region of Chhattisgarh  is also called Daksin Kosal in ancient time  and so the classical name of Chhattisgarhi is Kosali or Dakshin Kosali with historical significance. It has approximately 17.5 million speakers.

क्‍या और क्‍यों कांकड़ !


कांकड़ यानी गांव की सीमा. गांव की बाहरी सीमा कांकड़ कहलाती है. कांकड़ पर गांव की सीमा समाप्‍त हो जाती है और ठीक वहीं से दूसरे गांव की रोही शुरू हो जाती है. हर गांव की एक सीमा होती है जहां से उसके क्षेत्र की शुरुआत मानी जाती है इसी सीमा या लाइन को कांकड़ कहते हैं. थार के गांवों में इस सीमा का बहुत महत्‍व रहा है. अनेक रिवाज कांकड़ से जुड़े हैं. तो यही है कांकड़ और ग्रामीण भारत विशेषकर थार में उसका महत्‍व. हर गांव की कांकड़ अपने में अनेक विशेषताएं समेटे होती है. यही कारण है कि प्रत्‍येक गांव की कोई विशेषता होती है, एक पहचान होती है. उनके रीति रिवाज, संस्‍कृति, गुवाड़ें सब कुछ न कुछ अलग होती हैं. विविधिता होती है. गांव की मजबूत भींते और उनके गिरते लेवड़े अनेक कहानियां कहते हैं. इतिहास के सबसे बड़े मूक साक्षी हैं हमारे गांव. गांव को जानना है तो शुरुआत कांकड़ या शुरुआत से ही करनी होगी. यही ब्‍लाग रूपी इस पहल का उद्देश्‍य है.