Thursday, April 10, 2014

कॉम्प्यूटर सामान्य ज्ञान

● डॉ. डगलस इंजेलबार्ट (Dr. Douglas Engelbart) ने 1964 माउस का आविष्कार किया।
● प्रथम वेब साइट के निर्माण का श्रेय टिम बर्नस ली (Tim Berners Lee) को है। इन्हें World Wide Web का संस्थापक कहा जाता है।
● बिल गेट्‌स (Bill Gates) तथा पाल एलेन (Paul Allen) ने मिलकर 1975 में माइक्रोसाफ्ट कॉरपोरेशन की स्थापना की।
● बिल गेट्‌स की प्रसिद्ध पुस्तक 'The Road Ahead' 1995 में लिखी गई। वर्तमान में वे "Bill and Melinda Gates Foundation" द्वारा सामाजिक कार्यों में लगे है।
● भारत के सबीर भाटिया (Sabeer Bhatia) ने फ्री ईमेल सेवा हॉटमेल (Hotmail) को जन्म दिया।
● ब्लू टूथ एक बेतार तकनीक (Wireless Technology) है जिसके द्वारा मोबाइल फोन के जरिये कम दूरी में कम्प्यूटर और विभिन्न उपकरणों को जोड़ा जाता है।
● बैंकों में एटीएम (Automatic Teller Machine) वैन (WAN) का एक उदाहरण है।
● WiFi का अर्थ है Wireless Fidelity इसका प्रयोग बेतार तकनीक द्वारा कम्प्यूटर के दो उपकरणों के बीच संबंध स्थापित करने के लिए किया जाता है।
● WAP (Wireless Access Point) एक युक्ति है जो विभिन्न संचार माध्यमों को जोड़कर एक बेतार नेटवर्क बनाता है।
● कम्प्यूटर के Standby Mode में मॉनीटर तथा हार्ड डिस्क ऑफ हो जाता है ताकि कम उर्जा खपत हो। किसी भी बटन को दबाने या माउस क्लिक करने से कम्प्यूटर Standby Mode से बाहर आ जाता है।
● ऑप्टिकल माउस (Optical Mouse) में माउस पैड की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि इसमें कोई घूमने वाला भाग नहीं होता।
● Hyper Text एक डाक्यूमेंट है जो उस वेब पेज को दूसरे डाक्यूमेंट के साथ जोड़ता है।
● Blog शब्द Weblog से बना है। Blog किसी व्यक्ति द्वारा निर्मित वेब साइट है जहां वह अपने विचार, अनुभव या जानकारी रख सकता है। इस वेब साइट को पढ़ने वाले अन्य व्यक्ति भी इस विषय पर अपनी टिप्पणी दे सकते हैं।
● Beta Release किसी साफ्टवेयर या तकनीक की उपयोगिता को परखने के लिए निर्माण के दौरान उसे बाजार में जारी करने को कहा जाता है।
● पॉप अप (Pop-up) वेब ब्राउजिंग के दौरान स्वयं खुलने वाला विज्ञापन का विण्डो है।
● की-बोर्ड की संरचना के निर्माण का श्रेय क्रिस्टोफर लॉथम सोल्स (Christopher Latham Sholes) को जाता है।
● डिजिटल काम्पैक्ट डिस्क (DCD) का आविष्कार 1965 में जेम्स रसेल (James Russell) ने किया।
● बॉब नोयी (Bob Noyee) तथा गार्डन मूरे (Gordon Moore) ने सम्मिलित रूप से इंटेल (Intel) नामक कम्पनी की स्थापना की।
● मोटरोला (Motorola) के डॉ. मार्टिन कूपन (Dr. Martin Cooper) ने मोबाइल फोन का आविष्कार किया।
● जीएसएम (GSM-Global System For Mobile Communication) मोबाइल फोन के लिए प्रयुक्त एक लोकप्रिय मानक है।
● सीडीएमए (CDMA-Code Division Multiple Access) मोबाइल नेटवर्क स्थापित करने की व्यवस्था है।
● कलकुलेटर तथा कम्प्यूटर में अंतर यह है कि कम्प्यूटर को एक साथ कई निर्देश या निर्देशों का समूह दिया जा सकता है तथा यह एक साथ कई कार्य कर सकता है। इसके विपरीत कलकुलेटर को एक साथ एक ही निर्देश दिया जा सकता है।
● प्रथम व्यावसायिक इंटीग्रेटेड चिप का निर्माण फेयर चाइल्ड सेमीकण्डक्टर कॉरपोरेशन (Fair Child Semiconductor Corporation) ने 1961 में किया।
● मॉनीटर का आकार मॉनीटर के विकर्ण (Diagonal) की लम्बाई में मापा जाता है।
● फ्लापी डिस्क का आविष्कार IBM के वैज्ञानिक एलान शुगार्ट (Alan Shugart) ने 1971 में किया।
● मानव मस्तिष्क और कम्प्यूटर में सबसे बड़ा अंतर यह है कि कम्प्यूटर की स्वयं की सोचने की क्षमता नहीं होती।
● होम थियेटर एक पर्सनल कम्प्यूटर है जिसका प्रयोग मनोरंजन के लिए किया जाता है। इसमें वीडियो प्लेयर, आडियो/वीडियो रिकार्डर, टेलीविजन गेम्स, इंटरनेट जैसी अनेक सुविधाएं रहती हैं।
● कम्प्यूटर प्लेटफार्म का तात्पर्य कम्प्यूटर में प्रयुक्त आपरेटिंग सिस्टम से है जो अन्य प्रोग्रामों के क्रियान्वयन के लिए आधार तैयार करता है। एक प्लेटफार्म में चलने वाले प्रोग्राम सामान्यत: दूसरे प्लेटफार्म में नहीं चलते हैं।
● अमेरिका के विंटेन कर्फ (Vinten Cerf) को इंटरनेट का जन्मदाता (Father of the Internet) कहा जाता है।
● नेटीकेट (Netiquette-Net+etiquette) इंटरनेट प्रयोग के समय किये जाने वाले अपेक्षित व्यवहारों और नियमों का समूह है।
● इंटरनेट का संचालन किसी संस्था या सरकार या प्रशासन के नियंत्रण से मुक्त है।
● जीपीआरएस (GPRS-General Pocket Radio Service) वायरलेस द्वारा मोबाइल फोन से इंटरनेट सुविधा के प्रयोग की तकनीक है।
● हाइपर टेक्स्ट (Hyper Text) एक व्यवस्था है जिसके तहत टेक्स्ट, रेखाचित्र व प्रोग्राम आदि को आपस में लिंक किया जा सकता है। इसका विकास टेड नेल्सन (Ted Nelson) ने 1960 में किया।
● WAP-Wireless Application Protocol मोबाइल फोन द्वारा इंटरनेट के इस्तेमाल के दौरान प्रयोग किये जाने वाले नियमों का समूह है।
● इंटरनेट फोन कम्प्यूटर और इंटरनेट का प्रयोग कर टेलीफोन कॉल स्थापित करने की प्रक्रिया है। 
● इंटरनेट तथा कम्प्यूटर का प्रयोग कर किये गये अवैध कार्य, जैसे-सुरक्षित फाइलों को देखना और नष्ट करना, वेब पेज में परिवर्तन करना, क्रेडिट कार्ड का गलत इस्तेमाल करना, वायरस जारी करना आदि साइबर (Cyber Crime) कहलाता है।
● इकॉन (ICANN-Internet Corporation for Assigned Names and Numbers) इंटरनेट पर प्रत्येक कम्प्यूटर के लिए एक विशेष पता देने के उद्देश्य से 1998 में गठित एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है।
● इमोटीकॉन (Emoticon-emotion+icon) एक या अधिक संकेतों का समुच्चय है जिसके द्वारा इंटरनेट पर किसी विशेष भावना को व्यक्त किया जाता है।
जैसे-:-) का मतलब मुस्कुराता चेहरा है।
:-( का मतलब दुखी चेहरा है।
● एक्स्टानेट (Extranet) एक व्यक्तिगत नेटवर्क है जो व्यवसाय के लिए इंटरनेट तकनीक और सार्वजनिक संचार व्यवस्था का प्रयोग करता है।
● हैकर (Hacker) एक व्यक्ति है जो इंटरनेट पर इलेक्टानिक सुरक्षा व्यवस्था को भेदकर मनोरंजन या उत्सुकतावश गुप्त सूचनाएं प्राप्त करता है।
● ब्रिटेन के एलान टूरिंग (Alan Turing) सर्वप्रथम कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) की विचारधारा रखी। पर इस क्षेत्र में अपने योगदान के कारण जान मैकार्थी (John Mc Carthy) को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Father of Artificial Intelligence) का जनक कहा जाता है।
● डेस्कटॉप पब्लिशिंग (DTP) का विकास मैकिन्टोस (Macintosh) कम्पनी द्वारा किया गया।
● इंटरनेट पर मुफ्त में उपलब्ध विश्व के सबसे बड़े इनसाक्लोपीडिया विकिपीडिया (Wikipedia) की स्थापना जिमी वेल्स (Jimmy Wales) ने किया।
● बंग्लोर स्थित इंफोसिस टेक्नोलॉजी (Infosys Technology) का प्रारंभ एन. नारायणमूर्ति द्वारा 1981 में किया गया।
● वर्तमान में विश्व का सबसे तेज सुपर कम्प्यूटर IBM का रोड रनर (Road runner) है जो 1000 ट्रिलियन गणनाएं प्रति सेकेण्ड कर सकता है।
● भारत का सबसे तेज सुपर कम्प्यूटर एका (Eka) है जिसका विकास टाटा ग्रुप के पुणे स्थित सीआरएल (Computational Research Laboratory) द्वारा किया गया है। यह 117.9 ट्रिलियन गणनाएं प्रति सेकेण्ड कर सकता है।
● विलियन हिगिनबॉथम (William Higgin Botham) ने 1958 में कम्प्यूटर के प्रथम वीडियो गेम का निर्माण किया।
● माया II (Maya II) एक DNA कम्प्यूटर है जिसमें सिलिकॉन चिप की जगह DNA धागे का प्रयोग किया गया है।
● माया (Maya) एक शक्तिशाली त्रिआयामी साफ्टवेयर है जिसका प्रयोग चलचित्रों और विडियो गेम में विशेष प्रभाव डालने के लिए किया जाता है।
● एलन टूरिंग (Alan Turing) को आधुनिक कम्प्यूटर विज्ञान का जनक माना जाता है।
 

भारत के राष्ट्रीय प्रतीक(चिन्ह) एवं भाषा



1. भारत का राष्ट्रीय पशु – टाइगर
बाघ भारत के वन्य जीवन के धन का प्रतीक है।
2. भारत का राष्ट्रीय पक्षी – मयूर
मयूर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है यह सौंदर्य अनुग्रह जैसे गुणों का प्रतीक है।
3. भारत का राष्ट्रीय जलचर – गंगा डॉल्फिन
गंगा डॉल्फिन पवित्र के रूप में गंगा की पवित्रता का प्रतिनिधित्व करने के लिए कहा जाता है। क्योकि यह शुद्ध और ताजा पानी में ही जीवित रह सकते हैं।
4. भारत का राष्ट्रीय फल – आम
आम राष्ट्रीय फल है। और अत्यंत ही मीठा होता है। आम की अति प्राचीन काल से भारत में खेती की जाती है। इसकी 100 से अधिक किस्में हैं।
5. भारत का राष्ट्रीय पुष्प – कमल
वैज्ञानिक तौर पर Nelumbo Nucifera के रूप में जाना जाता है। कमल भारत का राष्ट्रीय फूल है और यह एक पवित्र फूल है। धन ज्ञान और आत्मज्ञान भूल का प्रतीक है। यह कीचड़ में खिलकर भी स्वच्छ होता है। जो दिल और मन की पवित्रता का प्रतीक है।
6. भारत का राष्ट्रीय पेड़ – बरगद
भारत का राष्ट्रीय पेड़ बरगद है। यह एक विशाल पेड़ है। जो अपने आस पास के वृक्ष और राहगीर को छाया प्रधान करता और हिन्दुओ में इसे पूजा जाता है।
7. भारत के राष्ट्र पिता – महात्मा गांधी
सबसे पहले सुभाष चंद्र बोस द्वारा “राष्ट्र के पिता” के रूप में 4 जून १,९४४ में रंगून से आजाद हिंद रेडियो पर संबोधित किये गए बाद में भारत सरकार द्वारा मान्यता दी गई।
8. भारतीय राष्ट्रीय ध्वज  – तिरंगा
राष्ट्रीय ध्वज क्षैतिज तिरंगा शीर्ष पर  गहरा भगवा (केसरी) और नीचे गहरे हरे रंग  होता है। मध्य में सफेद  जिसपर अशोक चक्र होता है। इसके इसकी लम्बाई चौडाई का अनुपात ३:२ होता है।
9. भारत का राष्ट्रीय खेल – हॉकी
हॉकी में भारत का आठ ओलंपिक स्वर्ण पदक के साथ एक प्रभावशाली रिकॉर्ड है। आधिकारिक तौर पर हॉकी राष्ट्रीय खेल है।
10. भारत का राष्ट्रीय गान – जन – गण – मन…….
जन – गण – मन गीत मूल रूप से बंगाली में रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित है। इसके हिन्दी संस्करण को  राष्ट्रीय गान के तौर पर अपनाया गया है।
11. राष्ट्रीय कैलेंडर – शक संवत
राष्ट्रीय कैलेंडर शक युग चैत्र के साथ अपनी पहली महीने के रूप में और 365 दिनों की एक सामान्य वर्ष के आधार पर 22 मार्च 1957 से अपनाया गया यह ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ में प्रयोग किया जाता है।
12. भारत का राष्ट्रीय गीत – वंदे मातरम्
गीत वंदे मातरम् बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा संस्कृत एवं बंगला में 1882 में रचित प्रेरणा किया जो के स्रोत है।  इस गीत ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी गीत के पहले दो छंद को भारत गणराज्य के राष्ट्रीय गीत का आधिकारिक दर्जा दिया गया जो संस्कृत में है।
13. भारत के राष्ट्रीय प्रतीक
भारत का राष्ट्रीय प्रतीक सारनाथ में अशोक के बौद्ध शेर राजधानी (अशोक स्तम्भ का उपरी) है।  इसमें चार एशियाई शेर एक दूसरे के विपरीत दिशा में चारो दिशाओ की सुरक्षात्मक मुद्रा में है। सारनाथ भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश में बनारस के पास है। भारत के प्रतीक के नीचे आदर्श वाक्य देवनागरी स्क्रिप्ट में “सत्यमेव जयते” उदित हैं – जिसका मतलब “सत्य की सदा ही जीत होती है”
14. भारतीय राष्ट्रीय नदी – गंगा नदी
गंगा भारत की सबसे लंबी नदी है। गंगा नदी पृथ्वी पर सबसे पवित्र नदी के रूप में हिंदुओं द्वारा प्रतिष्ठित है। किसी और नदी के मुकाबले दुनिया में सबसे भारी आबादी गंगा नदी के पास बसी है।
15. भारत की राज भाषा – हिंदी
हिंदी भारत देश की राज भाषा है। और विश्व में दूसरे नंबर की सब से ज्यादा लोगो दुआर बोली जाने वाली भाषा है।
16. भारत का राष्ट्रीय अवतार – भारत माता
भारत माता या भारतअम्बा/ Bhāratāmbā (संस्कृत से हिन्दी भारत अंबा से अम्बा ‘मां’/माता) एक देवी माँ के रूप में भारत के राष्ट्रीय अवतार के रूप में वह आम तौर पर एक नारंगी या केसरिया साड़ी पहने एक औरत को एक झंडा पकड़े और कभी कभी एक शेर के साथ दर्शाया जाता है।
(भारत देश के इन प्रतीक(चिन्ह) और भाषा के बारे में जितना लिखा जाये कम है। हर एक के बारे में लिखने के लिए तो पूरी-पूरी किताबे लिखी जा सकती है।)

प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान एव अभयारण्य

 क्रम  राष्ट्रीय उद्यान एव अभयारण्य प्रदेश प्राप्य वन जीव
1 बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान , शहडोल मध्य प्रदेश बाघ , तेंदुआ , चीतल , सांभर,नीलगाय, जंगली सूअर
2 बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान , मैसूर कर्नाटक हाथी , चीता, तेंदुआ , चीतल ,सांभर, हिरण
3 वन्नरघट्टा राष्ट्रीय उद्यान, बैंगलूर कर्नाटक हाथी , चीतल , भालू , हिरण, पक्षी
4 बोरीविली राष्ट्रीय उद्यान, मुम्बई महाराष्ट्र तेंदुआ , सांभर, जंगली सूअर, हिरण, लंगूर
5 कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान , नैनीताल उत्तराखंड हाथी, चीता, बघेरा, नीलगाय, भालू , चीतल , सांभर, हिरण, जंगली सूअर आदि
6 दुधवा राष्ट्रीय उद्यान , लखीमपुर-खीरी उत्तर प्रदेश चीता, तेंदुआ, नीलगाय, चीतल, सांभर, हिरण, आदि
7 इरविकुलम राजमल्ले राष्ट्रीय उद्यान, इदुक्की केरल हाथी, गौर, चीता, सांभर, नीलगाय, तेंदुआ , लंगूर, जंगली सूअर आदि
8 गिर राष्ट्रीय उद्यान गुजरात एशियाई शेर, तेंदुआ, चीतल, सांभर, चौसिंगा, जंगली सूअर, चिंकारा आदि
9 कान्हा किसली राष्ट्रीयउद्यान , मंडला एवं बालाघाट मध्य प्रदेश बाघ , तेंदुआ , चीतल , सांभर,नीलगाय, जंगली सूअर, गौर, बारहसिंगा आदि
10 काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान , जोरहाट असम एक सींग वाला गैंडा, गौर, चीता, जंगली सूअर, जंगली भैंसा, बघेरा, आदि
11 खंगचंदाजेंदा राष्ट्रीय उद्यान, गंगटोक सिक्किम बघेरा, लाल पांडा, जंगली गधा, पहाड़ी भालू, हिरण, भेड़ आदि
12 नागरहोल राष्ट्रीय उद्यान , कुर्ग कर्नाटक हाथी, चीता, तेंदुआ, चीतल, सांभर, भालू , तीतर, चकोर आदि
13 नवेगाँव राष्ट्रीय उद्यान, भंडारे महाराष्ट्र चीता, तेंदुआ, भालू, जंगली भैंसा, चीतल, सांभर, आदि
14 रोहला राष्ट्रीय उद्यान, कुल्लू हिमाचल प्रदेश पहाड़ी तेंदुआ, भूरा भालू, कस्तूरी हिरण, पहाड़ी मुर्गे, पहाड़ी कबूतर आदि
15 शिवपुरी(माधव) राष्ट्रीय उद्यान, मध्य प्रदेश चीता,चीतल, तेंदुआ, बघेरा, लकड़बग्घा, भालू, सांभर, चौसिंगा, नीलगाय,आदि
16 ताड़ोबा राष्ट्रीय उद्यान, चन्द्रपुर महाराष्ट्र चीता, तेंदुआ, भालू, गौर, सांभर, नीलगाय, चीतल, चिंकारा आदि
17 दाचीगम राष्ट्रीय उद्यान , श्रीनगर जम्मू और कश्मीर तेंदुआ, काला भालू, लाल भालू, हिरण, हंगुल आदि
18 डम्पा टाइगर रिजर्व , आईजोल मिज़ोरम हाथी , चीता
19 गरम पानी अभयारण्य, दिफ असम हाथी, जंगली भैंसा, बघेरा, लंगूर,
20 केवलादेव घाना पक्षी विहार , भरतपुर राजस्थान चीतल, सांभर, काला हिरण, जंगली सूअर, साइबेरियन सारस, मुर्ग़ाबी, हरियल आदि
21 गौतम बुद्ध अभयारण्य, गया बिहार चीता, तेंदुआ, बघेरा, सांभर, हिरण, चीतल, आदि
22 इन्टांकी अभयारण्य, कोहिमा नागालैंड हाथी, गौर, जंगली सूअर, चीता, तेंदुआ, हिरण, पक्षी एवं सांप आदि
23 कावला अभयारण्य, आदिलाबाद आंध्र प्रदेश चीता, तेंदुआ, चीतल, सांभर, जंगली सूअर, गौर, भालू आदि
24 मालापट्टी पक्षी विहार, नैल्लोर आंध्र प्रदेश फाख़्ता, मुर्ग़ाबी, हरियल, बत्तख़ , जलकाक आदि
25 मानस अभयारण्य , बारपेट असम हाथी , चीता, एक सींग का गैंडा, बघेरा, गौर, जंगली सूअर, भालू , सांभर आदि
26 मुदुमलाई अभयारण्य, नीलगिरी तमिलनाडु हाथी, चीता, तेंदुआ , चीतल , सांभर, गौर, हिरण, जंगली कुत्ते आदि
27 नामडाफा अभयारण्य, तिरप अरुणाचल प्रदेश चीता, तेंदुआ, बघेरा, हाथी, गौर, जंगली भैंसा, हिरण, सांप आदि
28 पलामू अभयारण्य, डालटेनगंज झारखण्ड हाथी, तेंदुआ, बघेरा, जंगलीसूअर, चीतल, सांभर, हिरण, गौर, आदि
29 रणथम्भौर टाइगर प्रोजेक्ट , सवाई माधोपुर राजस्थान बाघ, चीता, तेंदुआ, शेर, लकड़बग्घा, सांभर आदि
30 सरिस्का अभयारण्य , अलवर राजस्थान चीता, तेंदुआ, लकड़बग्घा, चीतल, सांभर, नीलगाय, चिंकारा, चौसिंगा, जंगली बिल्ली आदि
31 सिमिलीपाल अभयारण्य, मयूरगंज उड़ीसा हाथी , चीता, तेंदुआ, बघेरा,गौर, चीतल आदि
32 सुन्दरवन टाइगर रिजर्व , चौबीस परगना पश्चिम बंगाल चीता, हिरण, जंगली सूअर, मगर आदि

राजस्थान की प्रशासनिक इकाईयाँ



प्रशासनिक इकाईयाँ
स्वतत्रंता के पश्चात् 1956 में राजस्थान राज्य के गठन के प्रक्रिया पूर्ण हुई। वर्तमानमें राज्य को प्रशासनिक दृष्टि से सात संभागों , 33 जिलों और 249 तहसीलों में विभक्तकिया गया है।
1. जयपुर संभाग 
जयपुर , दौसा , सीकर , अलवर एवं झुन्झुँनूजिले।
2. जोधपुर संभाग
जोधपुर , जालौर , पाली , बाड़मेर , सिरोही एवं जैसलमेर जिले।
3. भरतपुर संभाग
भरतपुर , धौलपुर , करौली एवंसवाई माधोपुर जिले।
4. अजमेर संभाग
अजमेर , भीलवाड़ा , टोंक एवं नागौर जिले।
5. कोटा संभाग
कोटा , बूंदी , बारां एवं झालावाड़ जिले।
6. बीकानेरसंभाग
बीकानेर , गंगानगर , हनुमानगढ़एवं चूरू जिले।
7. उदयपुर संभाग
उदयपुर , राजसमंद , डूंगरपुर , बाँसवाड़ा , चित्तौड़गढ़ एवं प्रतापगढ़ जिले।

PART-- 1

1 राजस्‍थान का प्रवेश द्वार किसे कहा जाता है
भरतपुर
2 महुआ के पेङ पाये जाते है
अदयपुर व चितैङगढ
3 राजस्‍थान में छप्‍पनिया अकाल किस वर्ष पङा
1956 वि स
4 राजस्‍थान में मानसून वर्षा किस दिशा मे बढती है
दक्षिण पश्चिम से उत्‍तर पूर्व
5 राजस्‍थान में गुरू शिखर चोटी की उचाई कितनी है
1722 मीटर
6 राजस्‍थान में किस शहर को सन सिटी के नाम से जाना जाता है
जोधपुर को
7 राजस्‍थान की आकति है
विषमकोण चतुर्भुज
8 राजस्‍थान के किस जिले का क्षेत्रफल सबसे ज्‍यादा है
जैसलमेर
9 राज्‍य की कुल स्‍थलीय सीमा की लम्‍बाई है
5920 किमी
10 राजस्‍थान का सबसे पूर्वी जिला है
धौलपुर
11 राजस्‍थान का सागवान कौनसा वक्ष कहलाता है
रोहिङा
12 राजस्‍थान के किसा क्षेत्र में सागौन के वन पाये जाते है
दक्षिणी
13 जून माह में सूर्य किस जिले में लम्‍बत चमकता है
बॉसवाङा
14 राजस्‍थान में पूर्ण मरूस्‍थल वाले जिलें हैंा
जैसलमेर, बाडमेर
15 राजस्‍‍थान के कौनसे भाग में सर्वाधिक वर्षा होती है
दक्षिणी-पूर्वी
16 राजस्‍थान में सर्वाधिक तहसीलोंकी संख्‍या किस जिले में है
जयपुर
17 राजस्‍थान में सर्वप्रथम सूर्योदय किस जिले में होता है
धौलपुर
18 उङिया पठार किस जिले में स्थित है
सिरोही
19 राजस्‍थान में किन वनोंका अभाव है
शंकुधारी वन
20 राजस्‍थान के क्षेत्रफल का कितना भू-भाग रेगिस्‍तानी है
लगभग दो-तिहाई
21 राजस्‍थान के पश्चिम भाग में पाये जाने वाला सर्वाधिक विषैला सर्प
पीवणा सर्प
22 राजस्‍थान के पूर्णतया वनस्‍पतिरहित क्षेत्र
समगॉव (जैसलमेर)
23 राजस्‍थान के किस जिले में सूर्यकिरणों का तिरछापन सर्वाधिक होता है
श्रीगंगानगर
24 राजस्‍थान का क्षेतफल इजरायल से कितना गुना है
17 गुना बङा है
25 राजस्‍थान की 1070 किमी लम्‍बी पाकिस्‍तान से लगीसिमा रेखा का नाम
रेडक्लिफ रेखा
26 कर्क रेखा राजस्‍थान केकिस जिले से छूती हुई गुजरती है
डूंगरपुर व बॉसवाङा से होकर
27 राजस्‍थान में जनसंख्‍या की द़ष्टि से सबसे बङा जिला
जयपुर
28 थार के रेगिस्‍तान के कुल क्षेत्रफल का कितना प्रतिशत राजस्‍थान में है
58 प्रतिशत
29 राजस्‍थान के रेगिस्‍तान में रेत के विशाल लहरदार टीले को क्‍या कहते है
धोरे
30 राजस्‍थान का एकमात्र जीवाश्‍म पार्क स्थित है
आकलगॉव (जैसलमेर)



      PART -- 2


1. मारवाड का प्रताप किसे माना जाता हैं?- चन्द्रसेन
2. राजस्थान में किसान आन्दोलन का जनक माना जाता है? विजय सिंह पथिक
3. उत्तर भारत का एकमात्र रावण मंदिर कहाँ है ? जोधपुर
4. राजस्थान की मीरा बाई की जन्मभूमि है मेडता सिटी
5. राजस्थान में भक्ति आन्दोलन प्रारम्भ करने का श्रेय किसे जाता है घन्नाजी
6. राजस्थान के किस लोकदेवताने मुस्लिम आक्रमणकारी महमूद गजनवी के साथ युद्व किया था -गोगा जी
7. ढोल नृत्य किस क्षैत्र में किया जाता है जालौर
8. राजस्थान का शासन सचिवालय कहॉ स्थित है ? जयपुर
9. राजस्थान संगीत नाटक अकादमी कहाँ स्थित है ? जोधपुर
10. एशिया की सबसे बडी ऊन की मण्डी कहा लगती हैं ? बीकानेर
11. राजस्थान का सबसे प्राचीन संगठित उद्योग हैं ? सूती वस्त्रउद्योग
12. राष्ट्रीय सरसों अनुसंधान केंन्द्र कहाँ स्थित हैं ? सेवर (भरतपुर)
13. एनाल्स एण्ड एण्टीक्यूटिज आफ राजस्थान के रचियता हैं कर्नल जेम्स टॉड
14. हम्मीरो रासो किस भाषा का ग्रंथ हैं ? संस्कृत
15.
राजस्थान का प्रथम साईन्स एवं मेडिकल विश्वविद्यालय कहाँ हैं ? जयपुर 

राजस्‍थान का भौगोलिक स्‍वरूप

राजस्‍थान सामान्‍य ज्ञान - राजस्‍थान का भौगोलिक स्‍वरूप
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राजस्‍थान के प्राक़तिक विभाग
1 पूर्वी राजस्‍थान – जयपुर, दौसा, अलवर, धौलपुर, सवाई माधोपुर, भरतपुर, टोंक, सीकर, अजमेर व करौली
2 दक्षिण-पूर्वी राजस्‍थान – कोटा, बारां, बूंदी एवं झालावाङ
3 दक्षिण राजस्‍थान – उदयपुर, राजसमंद, भीलवाङा, चितौङगढ, डूंगरपुर व बांसवाङा
4 पश्चिमी राजस्‍थान – जैसलमेर, नारौग, जोधपुर, बाङमेर, जालौर, सिरोही व पाली
5 उत्‍तरी राजस्‍थान – बीकानेर, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ व चुरू

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राजस्‍थान की प्रमुख नदियों का वर्गीकरण
1 अरब सागर की ओर बहने वाली नदियां – लूणी, माही, सोम, जाखम, साबरमती व प बनास
2 गंगा-यमुना दोआब की ओर बहने वाली नदियां – चम्‍बल, बनास, काली सिन्‍ध, कोठारी, खारी, मेज, मोरेल, बाणगंगा और गम्‍भीर
3 आन्‍तरिक प्रवाह वाली नदियां – घग्‍घर, सोता-साहिबी, काकणी, मेढां, खण्‍डेर, कांटली नदी

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राज्‍य की प्रमुख नदियों की लम्‍बाई

1 माही नदी – 576 किमी
2 लूणी नदी – 320 किमी
3 चम्‍बल नदी – 966 किमी
4 बाणगंगा नदी – 380 किमी
5 कोठारी नदी – 145 किमी

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राजस्‍थान की झीलों का वर्गीकरण

1 मीठे पानी की झीलें – जयसमंद, राजसमंद, पिछोला, आनासागर, फतेहसागर, उदयसागर, उम्‍मेदसागर, फांयसागर, गैब सागर, सिलीसेढ, कोलायत, पुष्‍कर, बालसमन्‍द, नक्‍की व नवलखा आदि
2 खारे पानी की झीलें – सांभर, पचपद्रा, डीडवाना, फलौदी, कावोद, लूणकरणसर, कछेर व तालछापर

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राजस्‍थान में वर्षा जल संग्रहण के उपाय

1 टांका – ये सामान्‍यत चूना, ईंट, पत्‍थर से मकानों के तलघर में बने हुए छोटे हौज होते है, यह पानी पीने के काम लिया जाता है
2 खङीन – मरूस्‍थली भागों में यह एक मंद ढाल वाला ढालू मैदान होता है, पानी सूखने के बाद इसकी दलदली मिट्टी मे रबी की फसल बोई जाती है
3 बाबङियां – बावङियों का निर्माण गांवों या शहरों के समीप किया जाता है जिनमें वर्षा का पानी इकट्ठा होता रहता है,
4 नाडी – ये छोटे-छोटे कच्‍चे तालाब होते हे तथा गांव के बाहर निचले किनारे पर बनाये जाते है
5 सागर व तालाब – इनके जल का उपयोग सिंचाई के लिए किया जाता है

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राजस्‍थान के प्रमुख जल प्रपात
1 चूलिया जल प्रपात – चम्‍बल नदी
2 भीमताल जल प्रपात – मांगली नदी

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राजस्‍थान की नदियों के उपनाम
1 चम्‍बल नदी – उप नाम कामधेनु, चर्मण्‍वती
2 बाणगंगा – अर्जुन की गंगा
3 बनास – वन की आशा
4 घग्‍घर – म़त नदी
5 माही – बागङ की गंगा

राजस्थान के लोकवाद्य



मानव जीवन संगीत से हमेशा से जुड़ा रहा है। संगीत मानव के विकास के साथ पग-पग पर उपस्थित रहा है। विषण्ण ह्मदय को आह्मलादित एवं निराश मन को प्रतिपल प्रफुल्लित रखने वाले संगीत का अविभाज्य अंग है- विविध-वाद्य यंत्र। इन वाद्यों ने संगीत की प्रभावोत्पादकता को परिवर्धित किया और उसकी संगीतिकता में चार चाँद लगाए हैं। भांति-भाँति के वाद्ययंत्रों के सहयोगी स्वर से संगीत की आर्कषण शक्ति भी विवर्किद्धत हो जाती है।
भारतीय संगीत में मारवाड़ में मारवाड़ के विविध पारंपरिक लोक-वाद्य अपना अनूठा स्थान रखते हैं। मधुरता, सरसता एवं विविधता के कारण आज इन वाद्यों ने राष्ट्रीय ही नहीं, अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान कायम की है। कोई भी संगीत का राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय समारोह या महोत्सव ऐसा नहीं हुआ, जिसमें मरु प्रदेश के इन लोकवाद्यों को प्रतिनिधत्व न मिला है।
मारवाडी लोक-वाद्यों को संगीत की दृष्टि से पॉच भागों में विभाजित किया जा सकता है- यथातत, बितत, सुषिर, अनुब व धन। ताथ वाद्यों में दो प्रकार के वाद्य आते हैं- अनुब व धन।
अनुब में चमडे से मढे वे वाद्य आते हैं, जो डंडे के आधात से बजते हैं। इनमें नगाडा, घूंसा, ढोल, बंब, चंग आदि मुख्य हैं।
लोहा, पीतल व कांसे के बने वाधों को धन वाध कहा जाता है, जिनमें झांझ, मजीरा, करताल, मोरचंगण श्रीमंडल आदि प्रमुख हैं।
तार के वाधों में भी दो भेद हैं- तत और वितत। तत वाद्यों में तार वाले वे साज आते हैं, जो अंगुलियों या मिजराब से बजाते हैं। इनमें जंतर, रवाज, सुरमंडल, चौतारा व इकतारा है। वितत में गज से बजने वाले वाद्य सारंगी, सुकिंरदा, रावणहत्था, चिकारा आदि प्रमुख हैं। सुषिर वाद्यों में फूंक से बजने वाले वाद्य, यथा-सतारा, मुरली, अलगोजा, बांकिया, नागफणी आदि।

उपरोक्त वाद्यों का संक्षिप्त परिचयात्मक विवरण इस प्रकार है-

ताल वाद्य - राजस्थान के ताल वाद्यों में अनुब वाद्यों की बनावट तीन प्रकार की है यथा -
  • वाद्य जिसके एक तरु खाल मढी जाती है तथा दूसरी ओर का भाग खुला रहता है। इन वाद्यों में खंजरी, चंग, डफ आदि प्रमुख हैं।
  • वे वाद्य जिनका घेरा लकडी या लोहे की चादर का बना होता है एवं इनके दाऍ-बाऍ भाग खाल से मढे जाते हैं। जैसे मादल, ढोल, डेरु डमरु आदि।
  • वे वाद्य जिनका ऊपरी भाग खाल से मढा जाता है तथा कटोरीनुमा नीचे का भाग बंद रहता है। इनमें नगाडा, धूंसौं, दमामा, माटा आदि वाद्य आते हैं। इन वाद्यों की बनावट वादन पद्वदि इस प्रकार है -
  • कमटटामक बंब - इसका आकार लोहे की बड़ी कङाही जैसा होता है, जो लोहे की पटियों को जोङ्कर बनाया जाता है। इसका ऊपरी भाग भैंस के चमड़े से मढा जाता है। खाल को चमड़े की तांतों से खींचकर पेंदे में लगी गोल गिङ्गिड़ी लोहे का गोल घेरा से कसा जाता है। अनुब व घन वाद्यों में यह सबसे बडा व भारी होता है। प्राचीन काल में यह रणक्षेत्र एवं दुर्ग की प्राचीर पर बजाया जाता था। इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले लिए लकड़ी के छोटे गाडूलिए का उपयोग किया जाता है। इसे बजाने के लिए वादक लकड़ी के दो डंडे का प्रयोग करते हैं। वर्तमान में इसका प्रचलन लगभग समाप्त हो गया है। इसके वादन के साथ नृत्य व गायन दोनों होते हैं।
  • कुंडी - यह आदिवासी जनजाति का प्रिय वाद्य है, जो पाली, सिरोही एवं मेवा के आदिवासी क्षेत्रों में बजाया जाता है। मिट्टी के छोटे पात्र के उपरी भाग पर बकरे की खाल मढी रहती है। इसका ऊपरी भाग चार-छः इंच तक होता है। कुंडी के उपरी भाग पर एक रस्सी या चमड़े की पटटी लगी रहती है, जिसे वादक गले में डालकर खड़ा होकर बजाता है। वादन के लिए लकड़ी के दो छोटे गुटकों का प्रयोग किया जाता है। आदिवासी नृत्यों के साथ इसका वादन होता है।
  • खंजरी - लकड़ी का छोटा-सा घेरा जिसके एक ओर खाल मढ़ी रहती है। एक हाथ में घेरा तथा दूसरे हाथ से वादन किया जाता है। केवल अंगुलियों और हथेली का भाग काम में लिया जाता है। घेरे पर मढी खाल गोह या बकरी की होती है। कालबेलिया जोगी, गायन व नृत्य में इसका प्रयोग करते हैं। वाद्य के घेरे बडे-छोटे भी होते है। घेरे पर झांझों को भी लगाया जाता है।
  • चंग - एक लकड़ी का गोल घेरा, जो भे या बकरी की खाल से मढ़ा जाता है। एक हाथ में घेरे को थामा जाता है, दूसरे खुले हाथ से बजाया जाता है। थामने वाले हाथ का प्रयोग भी वादन में होता है। एक हाथ से घेरे के किनारे पर तथा दूसरे से मध्यभाग में आघात किया जाता है। इस वाद्य को समान्यतः होलिकोत्सव पर बजाया जाता है।
  • डमरु - यह मुख्य रुप से मदारियों व जादूगरों द्वारा बजाया जाता है। डमरु के मध्य भाग में डोरी बंघी रहती है, जिसके दोनो किनारों पर पत्थर के छोटे टुकड़े बंधे रहते हैं। कलाई के संचालन से ये टुकड़े डमरु के दोनो ओर मढ़ी खाल पर आघात करते हैं।
  •  - लोहे के गोल घेरे पर बकरे की खाल चढी रहती है। यह खाल घेरे पर मढ़ी नहीं जाती, बल्कि चमड़े की बद्धियों से नीचे की तरफ कसी रहती है। इसका वादन चंग की तरफ होता है। अंतर केवल इतना होता है कि चमडे की बद्धियों को ढ़ील व तनाव देकर ऊँचा-नीचा किया जा सकता है।
  • डेरु - यह बङा उमरु जैसा वाद्य है। इसके दोनों ओर चमङा मढ़ा रहता है, जो खोल से काफी ऊपर मेंडल से जुङा रहता है। यह एक पतली और मुड़ी हुई लकड़ी से बजाया जाता है। इस पर एक ही हाथ से आघात किया जाता है तथा दूसरे हाथ से डोरी को दबाकर खाल को कसा या ढीला किया जाता है। इस वाद्य का चुरु, बीकानेर तथा नागौर में अधिक प्रचलन है। मुख्य रुप से माताजी, भैरु जी व गेगा जी की स्तुति पर यह गायी जाती है।
  • ढाक - यह भी डमरु और डेरु से मिलता-जुलता वाद्य है, लेकिन गोलाई व लंबाई डेरु से अधिक होती है। मुख्य रुप से यह वाद्य गु जाति द्वारा गोढां (बगङावतों की लोककथा) गाते समय बजाया जाता है। झालावाङा, कोटा व बूँदी में इस वाद्य का अधिक प्रचलन है। वादक बैठकर दोनो पैरों के पंजो पर रखकर एक भाग पतली डंडी द्वारा तथा दूसरा भाग हाथ की थाप से बजाते है।
  • ढ़ोल - इसका धेरा लोहे की सीघी व पतली परतों को आपस में जोङ्कर बनाया जाता है। परतों (पट्टियों) को आपस में जोङ्ने के लिये लोहे व तांबे की कीलें एक के बाद एक लगाई जाती है। धेरे के दोनो मुँह बकरे की खाल से ढ़के जाते हैं। मढ़े हुए चमड़े को कसरन के लिए डोरी का प्रयोग किया जाता है। ढोल को चढ़ाने और उतारने के लिए डोरी में लोहे या पीतल के छल्ले लगे रहते हैं। ढोल का नर भाग डंडे से तथा मादा भाग हाथ से बजाया जाता है। यह वाद्य संपूर्ण राजस्थान में त्योहार व मांगलिक अवसरों पर बजाया जाता है। राजस्थान में ढोली, मिरासी, सरगरा आदि जातियों के लोग ढोल बजाने का कार्य करते हैं। ढोल विभित्र अवसरों पर अलग-अलग ढंग से बजाया जाता है, यथा- कटक या बाहरु ढोल, घोङ्चिड़ी रौ ढोल, खुङ्का रौ ढोल आदि।
  • ढोलक - यह आम, बीजा, शीशम, सागौन और नीम की लकड़ी से बनता है। लकड़ी को पोला करके दोनों मुखों पर बकरे की खाल डोरियों से कसी रहती है। डोरी में छल्ले रहते हैं, जो ढोलक का स्वर मिलाने में काम आते हैं। यह गायन व नृत्य के साथ बजायी जाती है। यह एक प्रमुख लय वाद्य है।
  • तासा - तासा लोहे या मिट्टी की परात के आकार का होता है। इस पर बकरे की खाल मढ़ी जाती है, जो चमड़े की पटिटयों से कसी रहती है। गले में लटका कर दो पहली लकड़ी की चपटियों से इसे बजाया जाता है।
  • धूंसौ - इसका घेरा आम व फरास की लकड़ी से बनता है। प्राचीन समय में रणक्षेत्र के वाद्य समूह में इसका वादन किया जाता था। कहीं-कहीं बडे-बडे मंदिरों में भी इकसा वादन होता है। इसका ऊपरी भाग भैंस की खाल से मढ. दिया जाता है। इसकों लकड़ी के दो बडे-डंडे से बजाया जाता है।
  • नगाङा - समान प्रकार के दो लोहे के बड़े कटोरे, जिनका ऊपरी भाग भैंस की खाल से मढा जाता है। प्राचीन काल में घोड़े, हाथी या ऊँट पर रख कर राजा की सवारी के आगे बजाया जाता था। यह मुख्य-मुख्य से मंदिरों में बजने वाला वाद्य है। इन पर लकड़ी के दो डंडों से आघात करके ध्वनि उत्पत्र करते हैं।
  • नटों की ढोलक - बेलनाकृत काष्ठ की खोल पर मढा हुआ वाद्य। नट व मादा की पुडियों को दो मोटे डंडे से आधातित किया जाता है। कभी-कभी मादा के लिए हाथ तथा नर के लिए डंडे का प्रयोग किया जात है, जो वक्रता लिए होता है। इसके साथ मुख्यतः बांकिया का वादन भी होता है।
  • पाबूजी के मोटे - मिट्टी के दो बड़े मटकों के मुंह पर चमङा चढाया जाता है। चमड़े को मटके के मुँह की किनारी से चिपकाकर ऊपर डोरी बांध दी जाती है। दोनों माटों को अलग-अलग व्यक्ति बजाते हैं। दोनों माटों में एक नर व एक मादा होता है, तदनुसार दोनों के स्वर भी अलग होते हैं। माटों पर पाबूजी व माता जी के पावड़े गाए जाते है। इनका वादन हथेली व अंगुलियों से किया जाता है। मुख्य रुप से यह वाद्य जयपुर, बीकानेर व नागौर क्षेत्र में बजाया जाता है।
  • भीलों की मादल - मिट्टी का बेलनाकार घेरा, जो कुम्हारों द्वारा बनाया जाता है। घेरे के दोनो मुखों पर हिरण या बकरें की खाल चढाई जाती है। खाल को घेरे से चिपकाकर डोरी से कस दी जाती है, इसमें छल्ले नही लगते। इसका एक भाग हाथ से व दूसरा भाग डंडे से बजाया जाता है। यह वाद्य भील व गरासिया आदिवासी जातियों द्वारा गायन, नृत्य व गवरी लोकनाट्य के साथ बजाया जाता है।
  • रावलों की मादल - काष्ठ खोलकर मढा हुआ वाद्य। राजस्थानी लोकवाद्यों में यही एक ऐसा वाद्य है, जिसपर पखावज की भांति गट्टों का प्रयोग होता है। दोनों ओर की चमड़े की पुङ्यों पर आटा लगाकर, स्वर मिलाया जाता है। नर व मादा भाग हाथ से बजाए जाते हैं। यह वाद्य केवल चारणों के रावल (चाचक) के पास उपलब्ध है।
धन वाद्य - यह वाद्य प्रायः ताल के लिए प्रयोग किए जाते हैं। प्रमुख वाद्यों की बनावट व आकार-प्रकार इस प्रकार है -
  • करताल - आयताकार लकड़ी के बीच में झांझों का फंसाया जाता है। हाथ के अंगूठे में एक तथा अन्य अंगुलियों के साथ पकड़ लिया जाता है और इन्हें परस्पर आधारित करके लय रुपों में बजाया जाता है। मुख्य रुप से भक्ति एवं धार्मिक संगीत में बजाया जाता है। मुख्य रुप से भक्ति एवं धार्मिक संगीत में इसका प्रयोग होता है।
  •       खङ्ताल - शीशम, रोहिङा या खैर की लकड़ी के चार अंगुल चौड़े दस अंगुल लंबे चिकने व पतले चार टुकड़े। यह दोनो हाथों से बजायी जाती है तथा एक हाथ में दो अफकड़े रहते हैं। इसके वादन में कट-कट की ध्वनी निकलती है। लयात्मक धन वाद्य जो मुख्य रुप से जोधपुर, बाडमेंर व जैसलमेंर क्षेत्रों में मांगणयार लंगा जाति के लोग बजाते हैं।
  •      धुरालियो - बांस की आठ-दस अंगुल लंबी व पतली खपच्ची का बना वाद्य। बजाते समय बॉस की खपच्ची को सावधानी पूर्वक छीलकर बीच के पतले भाग से जीभी निकाली जाती है। जीभी के पिछले भाग पर धागा बंधा रहता है। जीभी को दांतों के बीच रखकर मुखरंध्र से वायु देते हुए दूसरे हाथ से धागे को तनाव व ढील (धीरे-धीरे झटके) द्वारा ध्वनि उत्पत्र की जाती है। यहा वाद्य कालबेलिया तथा गरेसिया जाति द्वारा बजाया जाने वाला वाद्य यंत्र है।
  •     झालर - यह मोटी घंटा धातु की गोल थाली सी होती है। इसे डंडे से आघादित किया जाता है। यह आरती के समय मंदिरों में बजाई जाती है।
  •      झांझ - कांसे, तांबे व जस्ते के मिश्रण से बने दो चक्राकार चपटे टुकङों के मध्य भाग में छेद होता है। मध्य भाग के गड्डे के छेद में छोरी लगी रहती है। डोरी में लगे कपड़े के गुटको को हाथ में पकङ्कर परस्पर आधातित करके वादन किया जाता है। यह गायन व नृत्य के साथ बजायी जाती है।
  •      मंजीरा - दो छोटी गहरी गोल मिश्रित धतु की बनी पट्टियॉ। इनका मध्य भाग प्याली के आकार का होता है। मध्य भाग के गड्ढे के छेद में डोरी लगी रहती है। ये दोनों हाथ से बजाए जाते हैं, दोनों हाथ में एक-एक मंजीरा रहता है। परस्पर आघात करने पर ध्वनि निकलती है। मुख्य रुप से भक्ति एवं धर्मिक संगीत में इसका प्रयोग होता है। काम जाति की महिलाएँ मंजीरों की ताल व लय के साथ तेरह ताल जोडती है।
  •      श्री मंडल - कांसे के आठ या दस गोलाकार चपटे टुकङों। रस्सी द्वारा यह टुकड़े अलग-अलग समानान्तर लकडी के स्टैण्ड पर बंधे होते हैं। श्रीमंडल के सभी टुकडे के स्वर अलग-अलग होते हैं। पतली लकड़ी को दो डंडी से आघात करके वादन किया जाता है। राजस्थानी लोक वाद्यों में इसे जलतरंग कहा जा सकता है।
  •      मोरचंग - लोहे के फ्रेम में पक्के लाहे की जीभी होती है। दांतों के बीच दबाकर, मुखरंध्र से वायु देते हुए जीभी को अंगुली से आघादित करते हैं। वादन से लयात्मक स्वर निकलते हैं। यह वाद्य चरवाहों, घुमक्कङों एवं आदिवासियों में विशेष रुप से प्रचलित वाद्य है।
  •      भपंग - तूंबे के पैंदे पर पतली खाल मढी रहती है। खाल के मध्य में छेद करके तांत का तार निकाला जाता है। तांत के ऊपरी सिरे पर लकड़ी का गुटका लगता है। तांबे को बायीं बगल में दबाकर, तार को बाएँ हाथ से तनाव देते हुए दाहिने हाथ की नखवी से प्रहार करने पर लयात्मक ध्वनि निकलती है।
  •      भैरु जी के घुंघरु - बड़े गोलाकार घुंघरु, जो चमड़े की पट्टी पर बंधे रहते हैं। यह पट्टी कमर पर बाँधी जाती है। राजस्थान में इसका प्रयोग भैरु जी के भोपों द्वारा होता है, जो कमर को हिलाकर इन घुंघरुओं से अनुरंजित ध्वनि निकालते हैं तथा साथ में गाते हैं।
  • सुषिर वाद्य - राजस्थान में सुषिर वाद्य काष्ठ व पीतल के बने होते हैं। जिसमें प्रमुख वाद्यों का परिचयात्मक विवरण इस प्रकार है -
  •      अलगोजा - बांस के दस-बारह अंगुल लंबे टुकड़े, जिनके निचले सिरे पर चार छेद होते हैं। दोनों बांसुरियों को मुंह में लेकर दोनों हाथों से बजाई जाती है, एक हाथ में एक-एक बांसुरी रहती है। दोनों बांसुरियों के तीन छेदों पर अंगुलियाँ रहती हैं। यह वाद्य चारवाहों द्वारा कोटा, बूंदी, भरतपुर व अलवर क्षेत्रों में बजाया जाता है।
  •    करणा - पीतल का बना दस-बारह फुट लंबा वाद्य, जो प्राचीन काल में विजय घोष में प्रयुक्त होता था। कुछ मंदिरों में भी इसका वादन होता है। पिछले भाग से होंठ लगाकर फूँक देने पर घ्वनि निकलती है। जोधपरु के मेहरानगढ़ संग्रहालय में रखा करणा वाद्य सर्वाधिक लंबा है।
  •    तुरही - पीतल का बना आठ-दस फुट लंबा वाद्य, जिसका मुख छोटा व आकृति नोंकदार होती है। होंठ लगाकर फुँकने पर तीखी ध्वनि निकलती है। प्राचीन काल में दुर्ग एवं युद्व स्थलों में इसका वादन होता था।
  •   नड़ - कगोर की लगभग एक मीटर लंबी पोली लकड़ी, जिसके निचले सिरे पर चार छेद होते हैं। इसका वादन काफी कठिन है। वादक लंबी सांस खींखकर फेफङों में भरता है, बाद में न में फूँककर इसका वादन होता है। फूँक ठीक उसी प्राकर दी जाती है, जिस प्रकार कांच की शीशी बजायी जाती है। वादन के साथ गायन भी किया जाता है। वा वाद्य जैसलमेर में मुख्य रुप से बजाया जाता है।
  •   नागफणी - सर्पाकार पीतल का सुषिर वाद्य। वाद्य के मुंह पर होठों द्वारा ताकत से फूँक देने पर इसका वादन होता है। साधुओं का यह एक धार्मिक वाद्य है तथा इसमें से घोरात्मक ध्वनि निकलती है।
  •   पूंगी/बीण - तांबे के निचले भाग में बाँस या लकड़ी की दो जड़ी हुई नलियाँ लगी रहती हैं। दोनो नलियों में सरकंडे के पत्ते की रीठ लगाई जाती है। तांबे के ऊपरी सिरे को होठों के बीच रखकर फूँक द्वारा अनुध्वनित किया जाता है।
  •   बांकिया - पीतल का बना तुरही जैसा ही वाद्य, लेकिन इसका अग्र भाग गोल फाबेदार है। होठों के बीच रखरकर फूंक देने पर तुड-तुड ध्वनि निकलती है। यह वाद्य मांगलिक पर्वो पर बजाया जाता है। इसमें स्वरों की संख्या सीमित होती है।
  • मयंक - एक बकरे की संपूर्ण खाल से बना वाद्य, जिसके दो तरु छेद रहते हैं। एक छेद पर नली लगी रहती है, वादक उसे मुंह में लेकर आवश्यकतानुसार हवा भरता है। दूसरे भाग पर दस-बारह अंगुल लंबी लकड़ी की चपटी नली होती है। नली के ऊपरी भाग पर छः तथा नीचे एक छेद होता है। बगल में लेकर धीरे-धीर दबाने से इसका वादन होता है। जोगी जाति के लोग इस पर भजन व कथा गाते हैं।
  •     मुरला/मुरली - दो नालियों को एक लंबित तंबू में लगाकर लगातार स्वांस वादित इस वाद्य यंत्र के तीन भेद हैं: - आगौर, मानसुरी और टांकी। छोटी व पतली तूंबी पर निर्मित टांकी मुरला या मुरली कहलाती है। श्रीकरीम व अल्लादीन लंगा, इस वाद्य के ख्याति प्राप्त कलाकार हैं। बाड़में क्षेत्र में इस वाद्य का अधिक प्रचलन है। इस पर देशी राग-रागनियों की विभिन्न धुने बजायी जाती है।
  •      सतारा - दो बांसुरियों को एक साथ निरंतर स्वांस प्रक्रिया द्वारा बजाया जाता है। एक बांसुरी केवल श्रुति के लिए तथा दूसरी को स्वरात्मक रचना के लिए काम में लिया जाता है। फिर घी ऊब सूख लकड़ी में छेद करके इसे तैयार किया जाता है। दोनों बांसुरियों एक सी लंबाई होने पर पाबा जोड़ी, एक लंबी और एक छोटी होने पर डोढ़ा जोङा एवं अलगोजा नाम से भी जाना जाता है। यह पूर्ण संगीत वाद्य है तथा मुख्य रुप से चरवाहों द्वारा इसका वादन होता है। यह वाद्य मुख्यतया जोधपुर तथा बाड़मेर में बजाया जाता है।
  •     सिंगा - सींग के आकार का पीपत की चछर का बना वाद्य। पिछले भाग में होंठ लगाकर फूँक देने पर बजता है। वस्तुतः यह सींग की अनुक्रम पर बना वाद्य है, जिसका वादन जोगी व साधुओं द्वारा किया जाता है।
  •    सुरगाई-सुरनाई - दीरी का यह वाद्य ऊपर से पहला व आगे से फाबेदार होता है। इसके अनेक रुप राजस्थान मे मिलते हैं। आदिवासी क्षेत्रों में लक्का व अन्य क्षेत्रों में नफीरी व टोटो भी होते हैं। इसपर खजूर या सरकंडे की पत्ती की रीढ लगाई जाती है। जिसे होंठों के बीच रखकर फूँक द्वारा

राजस्थान के मध्यकालीन प्रमुख ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक स्थल

अचलगढ़
आब के निकट अवस्थित अचलगढ पर्व-मध्यकाल में परमारां की राजधानी रहा है। यहाँ अचलेश्वर महादेव का प्राचीन मन्दिर है। कुम्भा द्वारा निर्मित कुम्भस्वामी का मन्दिर यहीं अवस्थित है। अचलेश्वर  महादेव मन्दिर के सामन चारण कवि दुरसा आढा की बनवाई स्वयं की पीतल की मूर्ति है। अचलेश्वर पहाड़ी पर अचलगढ़ दुर्ग स्थित है, जिसे राणा कुम्भा ने ही बनवाया था।

अजमेर
आधुनिक राजस्थान के मध्य में स्थित अजमेर नगर की स्थापना 12 वीं शताब्दी में चौहान शासक अजयदव ने की थी। यहाँ के मुख्य स्मारकों में कुतुबद्दीन ऐबक द्वारा निर्मित ढ़ाई दिन का     झौपड़ा, सूफी संत ख्वाजा मुइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह, सोनीजी की नसियाँ (जैन मन्दिर, जिस पर सान का काम किया हुआ है) , अजयराज द्वारा निर्मित तारागढ़ दुर्ग, अकबर द्वारा बनवाया गया किला (मैग्जीन) आदि प्रमुख स्मारक हैं। यह मैग्नीज फोर्ट वर्तमान में संग्रहालय के रूप में है। यह स्मरण रह कि ख्वाजा साहिब की दरगाह साम्प्रदायिक सद्भाव का जीवत नमूना है। यहाँ चौहान शासक अर्णा राज (आनाजी) द्वारा निर्मित आनासागर झील बनी हुई है। इस झील के किनार पर जहाँगीर ने दौलतबाग (सुभाष उद्यान) और शाहजहाँ ने बारहदरी का निर्माण करवाया था।

अलवर
18 वीं शताब्दी ने रावराजा प्रतापसिंह ने अलवर राज्य की स्थापना की थी। अलवर का किला, जो बाला किला के नाम से जाना जाता है, 16 वीं शताब्दी में एक अफगान अधिकारी हसन खां मेवाती ने बनवाया था। अलवर में मूसी महारानी की छतरी है, जो राजा बख्तावरसिंह की पत्नी रानी मसी की स्मृति में निर्मित है। यह छतरी अपनी कलात्मकता के लिए प्रसिद्ध है। अलवर का राजकीय
संग्रहालय दर्शनीय है, जहाँ अलवर शैली के चित्र सुरक्षित है।

आबू
अरावली पर्वतमाला के मध्य स्थित आबू सिरोही के निकट स्थित है। अरावली पर्वतमाला का सबसे ऊँचा भाग ‘गुरू शिखर’ है। महाभारत में आब की गणना तीर्थ स्थानां में की गई है। आब अपने देलवाड़ा जैन मन्दिरों के लिए विख्यात है। यहाँ का विमलशाह द्वारा निर्मित आदिनाथ मन्दिर तथा वास्तुपाल- तेजपाल द्वारा निर्मित नमिनाथ का मन्दिर उल्लेखनीय है। आबू के दलवाड़ा के जैन मन्दिर अपनी नक्काशी, सुन्दर मीनाकारी एवं पच्चीकारी के लिए भारतभर में प्रसिद्ध है। इन मन्दिरां का निर्माण 11वीं एव 13वी शताब्दी में किया गया था। ये मन्दिर श्वेत संगमरमर से निर्मित है। यहाँ श्वेत पत्थर पर इतनी बारीक खुदाई की गई है,  जो  अन्यत्र दुर्लभ है। आब पर्वत का अग्नि कुल के राजपूतों की उत्पत्ति का स्थान बताया गया है।

आमेर
जयपुर से सात मील उत्तर-पर्व में स्थित आमेर ढूँढाड़ राज्य की जयपुर बसन से पर्व तक राजधानी था। दिल्ली-अजमेर मार्ग पर स्थित हान के कारण आमेर का मध्यकाल में बहुत महत्त्व रहा है। कछवाहा वंश की राजधानी आमेर के वैभव का युग मुगल काल से प्रारम्भ होता है। आमेर का किला दुर्ग स्थापत्य कला उत्कृष्ट नमूना है। यहाँ के भव्य प्रासाद एवं मन्दिर हिन्दू एव फारसी शैली के मिश्रित रूप हैं। इसमें बने दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास (शीशमहल) आदि की कलात्मकता प्रशसनीय है। इस किले में जगतशिरामणि मंदिर और शिलादेवी मन्दिर बने हुए है। इनका निर्माण मानसिंह के समय हुआ था। मानसिंह शिलादेवी की मूर्ति को बगाल से जीतकर लाया था। आमेर पर्यटन के लिए प्रसिद्ध है।

उदयपुर
महाराणा उदयसिंह ने 16 वीं शताब्दी मे इस शहर की स्थापना की थी। यहाँ के महल विशाल परिसर में अपनी कलात्मकता के लिए प्रसिद्ध है। राजमहलां के पास ही 17 वीं शताब्दी का निर्मित जगदीश मन्दिर है। यहाँ की पिछौला झील एव फतह सागर झील मध्यकालीन जल प्रबन्धन के प्रशंसनीय प्रमाण है। उदयपुर को झीलां की नगरी कहा जाता है। आधुनिक काल की माती मगरी पर महाराणा प्रताप की भव्य मूर्ति है, जिसन स्मारक का रूप ग्रहण कर लिया है। महाराणा संग्रामसिंह द्वितीय द्वारा निर्मित सहलियां की बाड़ी तथा महाराणा सज्जनसिंह द्वारा बनवाया गुलाब बाग शहर की शोभा बढ़ाने के लिए पर्याप्त है।

ऋषभदेव (केसरियाजी)
उदयपुर की खरवाड़ा तहसील में स्थित यह स्थान ऋषभदव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। जैन एवं आदिवासी भील अनुयायी इसे समान रूप से पजते हैं। भील इन्हें कालाजी कहत हैं, क्योंकि ऋषभदेव की प्रतिमा काले पत्थर की बनी हुई है। मूर्ति पर श्रद्धालु केसर चढ़ाते हैं और इसका लेप करते हैं, इसलिए इसे केसरियानाथ जी का मंदिर भी कहत हैं। यहाँ प्रतिवर्ष मेला भरता है।

ओसियाँ
जाधपुर जिले में स्थित ओसियाँ पर्वमध्यकालीन मन्दिरों के लिए विख्यात है। यहाँ के जैन एव हिन्दू मन्दिर 9वीं से 12वीं शताब्दियां के मध्य निर्मित है। यहाँ के जैन मन्दिर स्थापत्य के उत्कृष्ट नमून हैं। महावीर स्वामी के मंदिर के तारण द्वार एव स्तम्भों पर जैन धर्म से सम्बन्धित शिल्प अंकन दर्शनीय है। यहाँ के सूर्य मंदिर, सचियामाता का मंदिर आदि उस युग के कला वैभव का स्मरण करात हैं।

करौली
यदुवशी शासक अर्जु नसिंह ने करौली की स्थापना की थी। करौली में महाराजा गापालपाल द्वारा बनवाए गए रंगमहल एवं दीवान-ए-आम खबसूरत है। यहाँ की सूफी संत कबीरशाह की दरगाह भी स्थापत्य कला का सुन्दर नमूना है। करौली का मदनमोहन जी का मन्दिर प्रसिद्ध है।

किराडू
बाड़मेर से 32 किमी. दूर स्थित किराडू पर्व- मध्यकालीन मन्दिरां के लिए विख्यात है। यहाँ का सोमेश्वर मन्दिर शिल्पकला के लिए विख्यात है। यह स्थल राजस्थान के खजुराहा के नाम से भी प्रसिद्ध है। यहाँ कामशास्त्र की भाव भगिमा युक्त मूर्तियाँ शिल्पकला की दृष्टि से बे जो ड़ है।

किशनगढ़
अजमेर जिले में जयपुर मार्ग पर स्थित किशनगढ़ की स्थापना 1611 ई. में जाधपुर के शासक उदयसिंह के पुत्र किशनसिंह ने की थी। किशनगढ़ अपनी विशिष्ट चित्रकला शैली के लिए प्रसिद्ध है।

केशवरायपाटन
बूँदी जिले में चम्बल नदी के किनारे स्थित केशवरायपाटन में बूंदी नरश शत्रुशाल द्वारा 17वीं शताब्दी का निर्मित विशाल केशव (विष्णु) मन्दिर है। यहाँ पर जैनियों का तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ का प्रसिद्ध मन्दिर है।

कोटा
कोटा की स्थापना 13 वीं शताब्दी में बूंदी के शासक समरसी के पुत्र जैतसी ने की थी। उसन कोटा के स्थानीय शासक काटिया भील को परास्त कर उसके नाम से कोटा की स्थापना की। शाहजहाँ के फरमान से सत्रहवी शताब्दी के प्रारम्भ में बूंदी से अलग हाकर कोटा स्वतन्त्र राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। 1857 की क्रांति के दौरान कोटा राज्य के क्रातिकारियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। कोटा के क्षार बाग की छतरियाँ राजपत स्थापत्य कला के सुन्दर नमूने है। यहाँ का महाराव माधोसिंह संग्रहालय एवं राजकीय ब्रज विलास संग्रहालय कोटा चित्र शैली एव यहाँ के शासकों की कलात्मक अभिरुचि का प्रदर्शित करत है। कोटा में भगवान मथुराधीश का मंदिर वैष्णव सम्प्रदाय का प्रमुख तीर्थ है एव वल्लभ सम्प्रदाय की पीठ है। कोटा का दशहरा मेला भारत प्रसिद्ध है।

कौलवी
झालावाड़ जिले में डग कस्बे के समीप स्थित कौलवी की गुफाएँ बौद्ध विहारों के लिए प्रसिद्ध है। ये विहार 5वी से 7वीं शताब्दी के मध्य निर्मित माने जात है। ये गुफाए एक पहाड़ी पर स्थित हैं चट्टानं काटकर बनायी गई हैं।

खानवा
भरतपुर जिले में स्थित खानवा मेवाड़ के महाराणा सांगा और बाबर के मध्य हुए युद्ध (1527) के लिए विख्यात है। खानवा के युद्ध में सांगा की हार ने राजपूतां को दिल्ली की गद्दी पर बैठने का स्वप्न नष्ट कर दिया और मुगल वश की स्थापना का मजबत कर दिया।

गलियाकोट
डूंगरपुर जिले में माही नदी के किनार स्थित गलियाकाट वर्तमान में दाऊदी बाहरा सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र है। यहाँ संत सैय्यद फख़रुद्दीन की दरगाह स्थित है, जहाँ प्रतिवर्ष इनकी याद में उर्स का मेला भरता है।

गोगामेड़ी
हनुमानगढ़ जिले के नोहर तहसील में स्थित गागामेड़ी लाक देवता गोगाजी का प्रमुख तीर्थ स्थल है, जहाँ प्रतिवर्ष उनके सम्मान में एक पशु मेले का आयाजन होता है। राजस्थान में गोगाजी सर्पों के लोकदवता के रूप में प्रसिद्ध है। हिन्द इन्हें गागाजी तथा मुसलमान गागा पीर के नाम से पजत हैं।

चावण्ड
उदयपुर से ऋषभदेव जाने वाली सड़क पर अरावली पहाड़ियां के मध्य ‘चावण्ड’ गाँव बसा हुआ है। महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी के युद्ध के पश्चात् चावण्ड का अपनी राजधानी बनाया था। प्रताप की मृत्यु भी 1597 में चावण्ड में हुई थी।

चित्तौड़गढ
यह नगर अपने दुर्ग के नाम से अधिक जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि चित्तौड़गढ़ दुर्ग का निर्माण चित्रागद मौर्य ने करवाया था। समय-समय पर चित्तौड़ दुर्ग का विस्तार होता रहा है। चित्तौड़ दुर्ग को दुर्गों का सिरमौर कहा गया है। इसके बार में कहावत है -‘गढ़ तो चित्तौड़गढ, बाकी सब गढैया’। चित्तौड़ के शासकों ने तुर्को  एव मुगलां से इतिहास प्रसिद्ध संघर्ष किया। चित्तौड़गढ़ दुर्ग में राणा कुम्भा द्वारा बनवाये अनेक स्मारक हैं, जिनमें विजय स्तम्भ, कुम्भश्याम मन्दिर, श्रृंगार चँवरी, कुम्भा का महल आदि शामिल हैं। दुर्ग में रानी पद्मिनी का महल, जैन तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित कीर्ति स्तम्भ, जयमल-पत्ता के महल, मीरा मन्दिर, रैदास की छतरी, तुलजा भवानी मन्दिर आदि अपन कलात्मक एव ऐतिहासिक महत्व के कारण प्रसिद्ध हैं।

जयपुर
भारत का पेरिस एवं गुलाबी नगर नाम से प्रसिद्ध जयपुर की स्थापना 1727 में सवाई जयसिंह के द्वारा की गई थी। कछवाहा राजाआं की इस राजधानी का महत्व अपने स्थापना काल से ही रहा है। यहाँ के स्थापत्य में राजपूत एव मुगल स्थापत्य का मिश्रण दखा जो सकता है। यहाँ का सिटी पैलेस जयपुर के राजपरिवार का निवास स्थल रहा है। सिटी पैलेस के पास ही गोविन्ददेव जी का मन्दिर है, जो सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित है। सवाई जयसिंह द्वारा स्थापित वैधशाला ‘जन्तर-मन्तर’ का विशष महत्व है। यहाँ स्थापित सम्राट यंत्र विश्व की सबसे बड़ी सौर घड़ी मानी जाती है। नाहरगढ़ किला, हवामहल, रामनिवास बाग, अल्बर्ट हॉल संग्रहालय आदि दर्शनीय एव ऐतिहासिक स्थल हैं।

जालौर
ऐसा माना जाता है कि जालौर (जाबालिपुर) प्राचीनकाल में महर्षि जाबालि की तपाभूमि था। जालौर के प्रसिद्ध शासक कान्हड़दव ने अलाउद्दीन खिलजी से लम्बे समय तक लोहा लिया था। जालौर के सुवर्णगिरि दुर्ग का निर्माण परमार राजपतोंं ने करवाया था। दुर्ग में वैष्णव एव जैन मंदिर तथा सूफी संत मलिकशाह का मकबरा है।

जैसलमेर
भाटी राजपतों की राजधानी जैसलमेर की स्थापना 12 वीं शताब्दी में महारावल जैसल ने की थी। जैसलमेर दुर्ग पीले पत्थरां से निर्मित्त हाने के कारण ‘सानार किला’ कहलाता है। दुर्ग में अनेक वैष्णव एवं जैन मन्दिर बन हैं, जो अपनी शिल्पकला की उत्कृष्टता के कारण विख्यात है। जैसलमेर का जिनभद्र ज्ञान भण्डार प्राचीन ताड़पत्रों एवं पाण्डुलिपियां तथा कई भाषाआं के ग्रंथों के लिए प्रसिद्ध है। जैसलमेर की हवेलियां की वजह से विशेष पहचान है। यहाँ की पटवों की हवेलियाँ, सालिमसिंह की हवेली तथा नथमल की हवेली अपने झरोखों, दरवाजों व जालियों की नक्काशीयुक्त शिल्प के लिए पहचानी जाती हैं। जैसलमेर शासकों के निवास बादल निवास व जवाहर विलास शिल्पकला के ‘बेजाड़ नमून है। रावत गढ़सी सिंह द्वारा निर्मित्त मध्यकालीन गढ़सीसर सरोवर अपन कलात्मक प्रवेश द्वार एव छतरियों के लिए प्रसिद्ध है।

 जो धपुर
इस नगर की स्थापना 1459 में राव  जो धा ने की थी।  जो धपुर के मेहरानगढ़ दुर्ग का निर्माण राव जाधा ने शुरू किया, जिसमें कालान्तर में विस्तार हाता रहा है। इस दुर्ग को मयूर ध्वज के नाम से भी जाना जाता है। इस दुर्ग में फूल महल, माती महल, चामुण्डा दवी का मन्दिर दर्शनीय हैं। दुर्ग के पास ही जसवन्त थड़ा है, जो महाराजा जसवन्त सिंह द्वितीय की स्मृति में बनवाया गया था। यहाँ आधुनिक काल का उम्मेद भवन (छीतर पैलेस) अपनी विशालता एव कलात्मकता के लिए प्रसिद्ध है। जाधपुर सूर्य नगरी के नाम से विख्यात है।

झालरापाटन
झालावाड़ शहर से 4 मील दर स्थित झालरापाटन कस्बा कोटा राज्य के प्रधानमंत्री झाला जालिमसिंह ने बसाया था। यहाँ पहले 108 मन्दिर थे, जिनकी झालरां एव घण्टियां के कारण कस्बे का नाम झालरापाटन रखा गया। यहाँ का मध्यकालीन सूर्य मन्दिर प्रसिद्ध है,  जो  वर्तमान में सात सहलियां के मन्दिर के नाम से प्रख्यात है। यहाँ का शांतिनाथ का जैन मन्दिर विशाल एव भव्य है,  जो  11वीं शताब्दी का निर्मित है।

टोंक
17 वी शताब्दी में एक ब्राह्मण ने 12 ग्रामों को मिलाकर टोंक की स्थापना की। 19 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में अमीर खा पिण्डारी ने टांक रियासत की स्थापना की। टोंक की सुनहरी कोठी पच्चीकारी एवं मीनाकारी के लिए प्रसिद्ध है। टोंक के अरबी एवं फारसी शाध संस्थान, जो आधुनिक काल का है, में हस्तलिखित उर्दू , अरबी-फारसी ग्रंथां का विशाल संग्रह है।

डूँगरपुर
रावल वीर सिंह ने 14 वीं शताब्दी में डूँगरपुर की स्थापना की थी। डूँगरपुर को बागड़ राज्य की राजधानी होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। डूँगरपुर अपने मध्यकालीन मन्दिरों, हरे रग के पत्थर की मूर्तियों आदि के कारण प्रसिद्ध रहा है। यहाँ का गप सागर जलाशय अपन स्थापत्य के कारण आकर्षित करता है। यहाँ का उदयविलास पैलेस सफेद संगमरमर एव नीले पत्थर से बना है, जो नक्काशी तथा झरोखां से सुसज्जित है। आदिवासियों से बाहुल्य डूँगरपुर में परम्परागत जन-जीवन की झांकी दखन का मिलती है।

डीग
भरतपुर जिले में डीग जाट नरेशां के भव्य महलों के लिए विख्यात है। भरतपुर शासक सूरजमल जाट ने 18वी शताब्दी में यहाँ सुन्दर राजप्रासाद बनवाये। डीग कस्बे के चारों ओर मिट्टी का बना किला है, जिसे गापालगढ़ कहते है।

नागौर
नागौर का प्राचीन नाम अहिछत्रपुर था। यहाँ समय-समय पर नागवंश, परमारवश एव मुगल वंश का शासन रहा। अपन विशालकाय परकोटां व प्रभावशाली द्वारों के कारण नागौर राजपतों के अद्भुत नगरों में से एक है। ऐतिहासिक नागौर किले में शानदार महल, मन्दिर एव भव्य इमारतं है। नागौर का दुर्ग दोहरे परकोटे से घिरा हुआ है। यह किला राव अमरसिंह राठौड़ की शौर्य गाथाओं के कारण इतिहास प्रसिद्ध है। नागौर के ऐतिहासिक झंडा तालाब पर बनी 16 कलात्मक खम्भों से निर्मित्त अमरसिंह राठौड़ की छतरी एव कलात्मक बावड़ी दर्शनीय है। यहाँ सूफी संत हमीदुद्दीन नागौरी की दरगाह हिन्दू-मुस्लिम सद्भाव के रूप में पहचानी जाती है। नागौर का पशु मेला राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा पशु मेला है।

नाथद्वारा
राजसमंद जिले में बनास नदी के किनार बसे नाथद्वारा पूरे दश में श्रीनाथजी के वैष्णव मन्दिर के लिए प्रसिद्ध है। पुष्टिमार्गीय वैष्णवों का यह प्रमुख तीर्थस्थल है। यहाँ कृष्ण की उपासना उसके बालरूप में की जाती है। औरंगजेब की कट्टर धार्मिक नीति के कारण श्रीनाथजी की मूर्ति मथुरा से सिहाड़ ग्राम (वर्तमान नाथद्वारा) लाई गई, जो महाराणा राजसिंह के प्रयासों से नाथद्वारा में प्रतिष्ठापित की गई। चढ़ावे की दृष्टि से यह राजस्थान का सबसे सम्पन्न तीर्थस्थल है। पिछवाई पेंटिंग और मीनाकारी के लिए नाथद्वारा प्रसिद्ध है।

पुष्कर
अजमेर के निकट पुष्कर हिन्दुआं का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है। पद्म पुराण में भी इसकी महिमा का बखान किया गया है। पुष्करताल के घाटां पर स्नान करना अत्यन्त पुण्य का काम समझा जाता है। तीर्थराज पुष्कर में प्राचीनतम चतुर्मु खी ब्रह्मा मन्दिर है। यहाँ के अन्य प्रसिद्ध मन्दिरों में रंगनाथ मन्दिर, सावित्री मन्दिर, वराह मन्दिर आदि धार्मिक महत्त्व के हैं। पुष्कर में प्रतिवर्ष कार्तिक महीने में मेले का आयोजन हाता है। यह मेला ने केवल विभिन्न पशुओं की खरीद-फराख्त का माध्यम है बल्कि विदेशी पर्यटकों का आकर्षण केन्द्र माना जाता है। वर्तमान में पुष्कर को
अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व प्राप्त है।

बूंदी
राव दवा ने 13वीं शताब्दी में बूंदी राज्य की स्थापना की थी। बूंदी के तारागढ़ दुर्ग का निर्माण राव राजा बरसिंह ने 14वीं शताब्दी में शुरू करवाया था। बूंदी के शासक शत्रुसाल हाड़ा मुगल उत्तराधिकार यद्ध के दौरान धरमत की लड़ाई (1658) में मारा गया। यहाँ के दर्शनीय स्थलों में नवल सागर, चौरासी खम्भों की छतरी, रानीजी की बावड़ी, जैत सागर , फूल सागर आदि है। बूंदी
अपनी विशिष्ट चित्रकला शैली के लिए विख्यात है। बूंदी एक ऐसा शहर है, जिसके पास समृद्ध विरासत है और आज भी मध्यकालीन शहर की झलक देता है।

बयाना
भरतपुर जिले में स्थित बयाना का उल्लेख 13वी-14वीं शताब्दी के इब्नेबतूता, जियाउद्दीन बरनी जैसे लेखकां ने भी किया है। आगरा के निकट होन के कारण बयाना का सामरिक महत्त्व था। मध्यकाल में बयाना नील की खेती के लिए प्रसिद्ध था। बयाना से बड़ी संख्या में गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राएं मिली हैं, जो तत्कालीन इतिहास पर प्रकाश डालती हैं। राणा सांगा एव बाबर के मध्य खानवा की लड़ाई हुई थी,  जो  बयाना के निकट ही है।

बाड़ोली
चित्तौड़गढ़ जिले में रावतभाटा के निकट बाड़ोली हिन्द मन्दिरां के लिए प्रसिद्ध है। ये मन्दिर गणश, विष्णु, शिव, महिशासुर मर्दिनी आदि को समर्पित है। इन मन्दिरों से लोगां का सबसे पहले परिचय कर्नल जेम्स टॉड ने कराया था।

बीकानेर
राव बीका द्वारा 15 वीं शताब्दी में इस शहर की स्थापना की गई थी। यहाँ के 16 वी शताब्दी के शासक रायसिंह ने बीकानर के जूनागढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया। यह दुर्ग अपन स्थापत्य कला एव चित्रकारी के लिए प्रसिद्ध है। बीकानर शहर प्राचीर से घिरा हुआ हैं, जिसमें पाँच  दरवाजे बने हुए है। लाल और सफेद पत्थरों से निर्मित्त रतन बिहारी जी का मन्दिर, लालगढ़ पैलेस, पार्श्वनाथ का ऐतिहासिक जैन मन्दिर आदि कलात्मक एवं दर्शनीय हैं। बीकानर का अनूप पुस्तकालय पाण्डुलिपियों एव पुस्तकों के लिए प्रसिद्ध है।

भरतपुर
राजस्थान का पूर्वी प्रवेश द्वार भरतपुर की स्थापना 18वी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जाट शासक बदनसिंह ने की थी। उसके उत्तराधिकारी सूरजमल ने भरतपुर राज्य का विस्तार किया और इसे शानदार महलां से अलकृत किया। मिट्टी की मोटी दाहरी प्राचीरों से घिरा भरतपुर का किला अपनी अभद्यता के कारण लाहागढ़ दुर्ग’ के नाम से प्रख्यात है। भरतपुर सांस्कृतिक दृष्टि से पर्वी राजस्थान का एक समृद्ध नगर है। यहाँ के दर्शनीय स्थलों में गंगा मन्दिर, लक्ष्मण मन्दिर, जामा मस्जिद, केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान आदि हैं।

भीनमाल
जालौर जिले में स्थित भीनमाल का सम्बन्ध प्राचीन इतिहास से रहा है। संस्कृत के प्रख्यात कवि माघ ने अपन ग्रंथ शिशुपाल वध की रचना यही की थी। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भीनमाल की यात्रा की थी।

मण्डावा
झुँझुनूं में मण्डावा शखावाटी अंचल का सबसे महत्वपर्ण कस्बा है। यहाँ बड़ी संख्या में पयटक आत है। इस कस्बे के चारां ओर रेगिस्तानी टीलें है। यहाँ स्थित सेठां की हवेलियाँ, उनका स्थापत्य तथा उनमें बन भित्ति चित्र पर्यटन एव कला की दृष्टि से महत्वपर्ण है। गायनका की हवेली, लाडियां की हवेली आदि हवेली चित्रां के लिए प्रसिद्ध है।

मण्डौर
जाधपुर के पास स्थित मण्डौर पर्व में मारवाड़ की राजधानी रहा है। मण्डौर दुर्ग के अन्दर विष्णु और जैन मन्दिरों के खण्डहर हैं। यहाँ स्थित मण्डौर उद्यान में मण्डौर संग्रहालय, जनाना महल तथा राजाआं के देवल (स्मारक) बन हुए हैं। इस उद्यान में राजा अजीतसिंह तथा राजा अभयसिंह ने दवताआं की साल (बरामदा) का निर्माण करवाया था।

महनसर
झुंझुनू में महनसर पाद्दारों की सोने की दुकान के लिए प्रसिद्ध है,  जो  हरचंद पोद्दार ने बनवाई थी। यहाँ के भित्ति चित्रों में मुख्यतः श्रीराम और कृष्ण की लीलाआं का सुन्दर अंकन हुआ है। यह दुकान, जो मूलतः एक इमारत है पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र है। महनसर में सेठों की अनक हवेलियाँ है, जो भित्ति चित्रां एव हवेली स्थायत्य के लिए प्रसिद्ध है। महनसर की एक अन्य इमारत उल्लेखनीय है, जिसे तोलाराम जी का कमरा कहा जाता है। इस दा मंजिला इमारत को देखन के लिए लोग दूर-दूर से आत है। शेखावाटी अंचल के लाकगीतां में इस इमारत की सुन्दरता का वर्णन मिलता है।

रणकपुर
पाली जिले में स्थित रणकपुर जैन मन्दिरों के लिए विख्यात है। यहाँ का मुख्य मन्दिर प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव) का है। इनकी चतुर्मु खी प्रतिमा होन के कारण इसे चौमुखा मन्दिर भी कहत है। इस मन्दिर का निर्माण महाराणा कुम्भा के शासनकाल में सेठ धरणशाह ने 15 वीं शताब्दी में करवाया था। इस मन्दिर में 1444 स्तम्भ हैं। इस मन्दिर का शिल्पी दपाक था। इस मन्दिर में राजस्थान की जैन कला एव धार्मिक परम्परा का अपर्व प्रदर्शन हुआ है। एक कला मर्मज्ञ की टिप्पणी है कि ऐसा जटिल एव कलापूर्ण मन्दिर मेर देखन में नहीं आया।

रामदेवरा
जैसलमेर जिले की पोकरण तहसील में अवस्थित ‘रामदवरा’ लाक संत रामदवजी का समाधि स्थल है। यहाँ रामदेवजी का भव्य मन्दिर बना हुआ है। यहाँ भाद्रपद शुक्ला द्वितीय से एकादशी तक मेला भरता है, जिसमें भारत के कौने-कौने से श्रद्धालु आते है। यह मेला साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए प्रसिद्ध है।

सवाई माधोपुर
इस शहर की स्थापना जयपुर के शासक सवाई माधोसिंह ने की थी। यहाँ का रणथम्भौर का किला हम्मीर चौहान की वीरता का साक्षी रहा है। रणथम्भौर में 1301 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान राजपत स्त्रियों द्वारा किया गया जौहर राजस्थान के पहले साके के रूप में विख्यात है। दुर्ग में त्रिनेत्र गणशजी का मदिर स्थित है। रणथम्भौर दुर्ग की प्रमुख विशषता है कि इस किले में बैठकर दूर-दूर तक दखा जो सकता है परन्तु शत्रु किले का निकट आने पर ही दख सकता है। यहाँ का रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान (बाघ अभयारण्य) पर्यटकां के लिए आकर्षण का केन्द्र है।

हल्दीघाटी
राजसमंद जिले में स्थित ‘हल्दीघाटी’ गांव महाराणा प्रताप और अकबर की सेना के मध्य लडें युद्ध (18 जून, 1576) के लिए प्रसिद्ध है। यह युद्ध अनिर्णायक रहा, परन्तु अकबर जैसा साम्राज्यवादी शासक भी प्रताप की संघर्श एव स्वतन्त्रता की प्रवृत्ति पर अंकुष नहीं लगा सका। युद्धस्थली का राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया है किंतु दुर्भाग्य से इसके मूल स्वरूप को यथावत् रखन में प्रशासन असफल रहा है। इतिहास के जागरूक छात्रों का चाहिये कि वे स्मारकों के संरक्षण में सहयाग प्रदान करं।

राजस्थान की प्रमुख बोलियाँ

भारत के अन्य राज्यों की तरह राजस्थान में कई बोलियाँ बोली जाती हैं। वैसे तो समग्र राजस्थान में हिन्दी बोली का प्रचलन है लेकिन लोक-भाषाएँ जन सामान्य पर ज़्यादा प्रभाव डालती हैं। जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने राजस्थानी बोलियों के पारस्परिक संयोग एवं सम्बन्धों के विषय में वर्गीकरण किया है। ग्रियर्सन का वर्गीकरण इस प्रकार है :-
  • पश्चिमी राजस्थान में बोली जाने वाली बोलियाँ - मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढारकी, बीकानेरी, बाँगड़ी, शेखावटी, खेराड़ी, मोड़वाडी, देवड़ावाटी आदि।
  • उत्तर-पूर्वी राजस्थानी बोलियाँ - अहीरवाटी और मेवाती।
  • मध्य-पूर्वी राजस्थानी बोलियाँ - ढूँढाड़ी, तोरावाटी, जैपुरी, काटेड़ा, राजावाटी, अजमेरी, किशनगढ़, नागर चोल, हड़ौती।
  • दक्षिण-पूर्वी राजस्थान - रांगड़ी और सोंधवाड़ी
  • दक्षिण राजस्थानी बोलियाँ - निमाड़ी आदि।

बोलियाँ जहाँ बोली जाती हैं

मारवाड़ी


राजस्थान के पश्चिमी भाग में मुख्य रूप से मारवाड़ी बोली सर्वाधिक प्रयोग की जाती है। यह जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर और शेखावटी में बोली जाती है। यह शुद्ध रूप से जोधपुर क्षेत्र की बोली है।बाड़मेर, पाली, नागौर और जालौर ज़िलों में इस बोली का व्यापक प्रभाव है। मारवाड़ी बोली की कई उप-बोलियाँ भी हैं जिनमें ठटकी, थाली, बीकानेरी, बांगड़ी, शेखावटी, मेवाड़ी, खैराड़ी, सिरोही, गौड़वाडी, नागौरी, देवड़ावाटी आदि प्रमुख हैं। साहित्यिक मारवाड़ी को डिंगल कहते हैं। डिंगल साहित्यिक दृष्टि से सम्पन्न बोली है।

मेवाड़ी

यह बोली दक्षिणी राजस्थान के उदयपुर, भीलवाड़ा और चित्तौड़गढ़ ज़िलों में मुख्य रूप से बोली जाती है। इस बोली में मारवाड़ी के अनेक शब्दों का प्रयोग होता है। केवल ए और औ की ध्वनि के शब्द अधिक प्रयुक्त होते हैं।

बाँगड़ी

यह बोली डूंगरपूर व बाँसवाड़ा तथा दक्षिणी-पश्चिमी उदयपुर के पहाड़ी क्षेत्रों में बोली जाती हैं। गुजरात की सीमा के समीप के क्षेत्रों में गुजराती-बाँगड़ी बोली का अधिक प्रचलन है। इस बोली की भाषागत विशेषताओं में च, छ, का, स, का है का प्रभाव अधिक है और भूतकाल की सहायक क्रिया 'था' के स्थान पर 'हतो' का प्रयोग किया जाता है।

धड़ौती

इस बोली का प्रयोग झालावाड़, कोटा, बूँदी ज़िलों तथा उदयपुर के पूर्वी भाग में अधिक होता है।

मेवाती

यह बोली राजस्थान के पूर्वी ज़िलों मुख्यतः अलवर, भरतपुर, धौलपुर और सवाई माधोपुर की करौली तहसील के पूर्वी भागों में बोली जाती है। ज़िलों के अन्य शेष भागों में ब्रजभाषा और बांगड़ी का मिश्रित रूप प्रचलन में है। मेवाती में कर्मकारक में 'लू' विभक्ति एवं भूतकाल में 'हा', 'हो', 'ही' सहायक क्रिया का प्रयोग होता है।

बृज

उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे भरतपुर, धौलपुर, दिल्ली और अलवर ज़िलों में यह बोली अधिक प्रचलित है।

मालवी

झालावाड़, कोटा और प्रतापगढ़ ज़िलों में मालवी बोली का प्रचलन है। यह भाग मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र के समीप है।

रांगड़ी

राजपूतों में प्रचलित मारवाड़ी और मालवी के सम्मिश्रण से बनी यह बोली राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी भाग में बोली जाती है।

ढूँढाती

राजस्थान के मध्य-पूर्व भाग में मुख्य रूप से जयपुर, किशनगढ़, अजमेर, टौंक के समीपवर्ती क्षेत्रों में ढूँढ़ाड़ी भाषा बोली जाती है। इसका प्रमुख उप-बोलियों में हाड़ौती, किशनगढ़ी, तोरावाटी, राजावाटी, अजमेरी, चौरासी, नागर, चौल आदि प्रमुख हैं। इस बोली में वर्तमान काल में 'छी', 'द्वौ', 'है' आदि शब्दों का प्रयोग अधिक होता है।