Saturday, April 12, 2014

कबीर के दोहे

आय हैं सो जाएंगे, राजा रंक फकीर।
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बंधे जात जंजीर ।।
आया था किस काम को, तु सोया चादर तान ।
सुरत सम्भाल ए गाफिल, अपना आप पहचान।।
आहार करे मन भावता, इंदी किए स्वाद।
नाक तलक पूरन भरे, तो का कहिए प्रसाद।।
आस पराई राख्त, खाया घर का खेत।
औरन को प्त बोधता, मुख में पड़ रेत।।
आग जो लागी समुद्र में, धुआं न प्रकट होय।
सो जाने जो जरमुआ, जाकी लाई होय।।
आशा का ईंधन करो, मनषा करो बभूत ।
जोगी फेरी यों फिरो, तब वन आवे सूत ।।
आस पराई राखता, खाया घर का खेत।
और्न को पथ बोधता, मुख में डारे रेत।1।
आवत गारी एक है, उलटन होय अनेक।
कह कबीर नहिं उलटिये, वही एक की एक ।2।
आहार करे मनभावता, इंद्री की स्वाद ।
नाक तलक पूरन भरे, तो कहिए कौन प्रसाद।3।
आपा भेटियां हरि मिलै, हरि मेट् या सब जाइ।
अकथ कहाणी प्रेम की, कह्या न कोउ पत्याइ।4।
आगे  अंधा कूप में, दूजे लिया बुलाय।
दोनों बूडछे बापुरे, निकसे कौन उपाय।5।
आशा वासा सन्त का, ब्रह्मा लखै न वेद।
षट दर्शन खटपट करै, बिरला पावै भेद।6।
आज काल के लोग हैं, मिलि कै बिछुरी जाहिं ।
लाहा कारण आपने, सौगन्ध राम कि खाहिं।7।
आशा तजि माया तजै, मोह तजै अरू मान ।
हरष शोक निन्दा तजै, कहैं कबीर सन्त जान ।8।
आसन तो अकान्त करैं, कामिनी संगत दूर।
शीतल  सन्त शिरोमणि , उनका ऐसा नूर ।9।
आज काल दिन पांच में, बरस पांच जुग पंच।
जब तब साधू तारसी, और सकल पर पंच ।10।
आब गया आदर गया, नैनन गया सनेह।
यह तीनों तब ही गये,जबहिं कहा कुछ देह।11।
आशा करै बैकुण्ठ की, दुरमति तीनों काल।
शुक्र कही बलि ना करीं, ताते गयो पताल।12।
आरत है गुरू भक्ति करूं, सब कारज सिध होय।
करम जाल भौजाल में, भक्त फंसे नहिं कोय ।13।
आज काल के बीच मे, जंगल होगा वास।
ऊपर ऊपर हल फिरै, ढोर चरेंगे घास।14।
आछे दिन पाछे गये, गुरू सों किया न हैत।
अब पछितावा क्या करे, चिड़िया चुग गई खेत।15।
आज कहै मैं कल भजूं, काल फिर काल।
आज काल के करत ही, औसर जासी चाल।16।
आंखि न देखे बावरा, शब्द  सुनै नहिं कान।
सिर के केस उज्ज्वल भये, अबहु निपट अजान।17।
आस पास जोधा खड़े, सबै बजावै गाल।
मंझ महल से ले चला, ऐसा परबत काल।18।
इस तन का दीवा करौ, बीती मेल्यूं जीवउं।
लोही सींचो तेल ज्यूं, कब मुख देख पठिउं।19।
इहि उदर के कारणे, जग पाच्यो निस जाम।
स्वामी-पणौ जो सिरि चढ़यो, सिर यो न एको काम।20।
इन्द्रिय मन निग्रह करन, हिरदा कोमल होय।
सदा शुद्ध आचरण में, रह विचार में सोय ।21।
इत पर धर उत है धरा, बनिजन आये हाथ ।
करम करीना बेचि के, उठि करि चालो काट ।22।
उज्जवल पहरे कापड़ा, पान-सुपरी खाय।
एक हरि के नाम बिन, बांधा यमपुर जाय ।23।
उतते कोई न आवई, पासू पुछू धाय।
इतने ही सब जात है, भार लदाय लदाय ।24।
उज्जवल देखि न धीजिये, वग ज्यूं माडै ध्यान।
धीर बौठि चपेटसी, यूं ले बूडै ग्यान।25।
उजला कपड़ा पहिरि करि, पान सुपारी खाहिं ।
एकै हरि के नाव बिन, बांधे जमपुरि जाहिं ।26।
उड़गण और सुधाकरा, बसत नीर के संग ।
यों साधू संसार में, कबीर फड़त न फंद ।27।
उदर समाता मांगि ले, ताको नाहिं दोष।
कहैं कबीर अधिर गहै, ताकि गति न मोष ।28।
उदर समाता अन्न ले, तनहिं समाता चीर।
अधिकहिं संग्रह ना करे, तिसका नाम फकीर।29।
उलटे सुलटे बचन के शीष न मानै दुख।
कहैं कबीर संसार में, सो कहिये गुरूमुख ।30।
ऊंचे पानी न टिक, नीचे ही ठहराय।
नीचा हो सो भरिए पिए, ऊंचा प्यासा जाय।31।
ऊंचे कुल में जामिया, करनी ऊंच न होय।
सौरन कलश  सुरा, भरी, साधु निन्दा सोय।32।
ऊजड़ खेडे़ टेकीरी, धड़ि धड़ि गये कुम्हार।
रावन जैसा चलि गया, लंका का सरदार।33।
ऊंचा महल चुनाइया, सुबरदन कली ढुलाय।
वे मन्दिर खाले पड़े, रहै मसाना जाय।34।
ऊंचा मन्दिर मेड़िया, चला कली ढुलाय।
एकहिं गुरू के नाम बिन, जदि तदि परलय जाय।35।
ऊंचा दीसे धौहरा, भागे चीती पोल।
एक गुरू के नाम बिन, जम मरेंगे रोज।36।
ऊजल पीहने कापड़ा, पान-सुपारी खाय।
कबीर गुरू की भक्ति बिन, बांधा जमपुर जाय ।37।
एक कहूं तो है नहीं, दूजा कहूं तो गार।
है जैसा तैसा हो रहे, रहें कबीर विचार।38।
एक ते अनन्त अन्त एक हो जाय।
एक से परचे भया, एक मोह समाय।39।
एक ते जान अनन्त, अन्य एक हो आय।
एक से परचे भया, एक बाहे समाय।40।
एक दिन ऐसा होएगा, सब सूं पड़े बिछोइ।
राजा राणा छत्रपति, सावधान किन होइ।41।
एष ले बूढ़ी पृथमी, झूठे कुल की लार।
अलष बिसारयो भेष में, बूड़े काली धार।42।
एसी बाणी बोलिये, मन का आपा खोइ।
औरन को सीतल करै, आपौ सीतल होइ।43।
एक छाड़ि पय को गहैं, ज्यों रे गऊ कर बच्छ।
अवगुण छाड़ै गुण गहै, ऐसा साधु लच्छ।44।
एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।
कबीर सगंत साधु की, करै कोटि अपराध।45।
एक दिन ऐसा होयगा, सबसों परै बिछोह ।
राजा राना राव एक, साबधान क्यों नहिं होय।46।
एक दिन ऐसा होयगा, कोय काहु का नाहिं ।
घर की नारी को कहै, तन की नारी जाहिं ।47।
एक बंदुक के कारने, रोता सब संसार।
अनेक बून्द खाली गये, तिनका नहीं विचार।48।
ऐसी वाणी बोलेए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय।49।
ऐसा कोई न मिला, जासू कहूं निसंक।
जासो हिरदा की कहूं, सो फिर मारे डंक।50।
ऐसे सांच न मानई, तिलकी देखो जाय।
जारि बारि कोयला करे, जमते देखा सोय।51।
और देव नहिं चित्त बसै, मन गुरू चरण बसाय।
स्वल्पाहार भोजन करूं, तृष्णा दूर पराय।52।
और कर्म सब कर्म है, भक्ति कर्म निहकर्म।
कहैं कबीर पुकारि के, भक्ति करो तजि भर्म।53।
क्षमा बड़े न को उचित है, छोटे को उत्पात।
कहा विष्णु का घटि गया, जो भुगु मारीलात ।54।
कबीरा माला मनहि की, और संसारी भीख।
माला फेरे हरि मिले, गले रहट के देख।55।
कबीरा ते नर अन्ध है, गुरू को कहते और।
हरि रूठे गुरू ठौर है, गुरू रूठै नहीं ठौर।56।
कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान।
जम जब घर ले जायेगें, पड़ी रहेगी म्यान।57।
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब।58।
क्या भरोसा देह का, बिनस जात छिन मांह।
सांस-सांस सुमिरन करो और यतन कुछ नांह।59।
कुटिल वचन सबसे बुरा, जारि कर तन हार।
साधु वचन जल रूप, बरसे अमृत धार।60।
कबीरा जपना काठ की, क्या दिखलावे मोय।
हृदय नाम न जपेगा, यह जपनी क्या होय।61।
कहना सो कह दिया, अब कुछ कहा न जाय।
एक रहा दूजा गया, दरिया लहर समाय।62।
कली खोटा जग आंधरा, शब्द न माने कोय।
चाहे कहे सत आइना, जो जग बैरी होय।63।
कामी,क्रोधी, लालची, इनसे भक्ति न होय।
भक्ति करे कोई सूरमा, जाति वरन कुल खोय।64।
कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय।
टूट एक के कारने, स्वान घरै घर जाय ।65।
काया काठी काल घुन, जतन-जतन सो खाय।
काया वैध ईश बस, मर्म न काहू पाय।66।
कथा- कीर्तन कुल विषे, भवसागर की नाव ।
कहत कबीरा या जगत में नाहि और उपाव।67।
कबीरा यह तन जात है, सके तो ठौर लगा।
कै सेवा कर साधु की, कै गोविंद गुन गा।68।
कहता तो बहुत मिला, गहता मिला न कोय।
से कहता वह जान दे, जो नहिं गहता होय।69।

No comments: